[ डॉ. दीपक टेम्पे ]: चीन से निकले कोरोना वायरस ने संपूर्ण विश्व में तबाही मचा रखी है। इससे भारत भी नहीं बच पाया है। डॉक्टरों, स्वास्थ्य एवं सफाई कर्मियों और पुलिस के साथ आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों के अलावा अन्य सभी अपने घरों में बंद हैं। इस समय कोई खाना बनाने की निपुणता में जुट गया है तो कोई दूरदराज के रिश्तेदारों और साथियों से फोन के माध्यम से जुड़ रहा है या फिर पुस्तकें पढ़ रहा है। एक अनोखी चीज वातावरण में बदलाव के रूप में देखने को मिल रही है। तमाम लोगों ने ऐसा नीला आकाश बचपन में देखा था या फिर गांवों में। आज के माहौल में यह बात दोहराना महत्वपूर्ण है कि हम एक पंथनिरपेक्ष देश हैं और हमारे नेताओं ने हमें यही सीख दी कि किसी से भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए यह अति आवश्यक है कि उसके लोगों में एकजुटता बनी रहे और वे देश से प्यार करें।

स्विट्जरलैंड के नागरिकों में झलकता देशप्रेम

सालों पहले स्विट्जरलैंड यात्रा के दौरान सुबह टहलते हुए मेरी मुलाकात एक सरदारजी से हुई। मैंने उनसे बातचीत छेड़ी और यह जानना चाहा कि उन्हें इस देश की कौन सी चीज सबसे अच्छी लगी? उन्होंने कहा, साहब यहां के लोग अपने देश से बहुत प्यार करते हैं। हम भारतीयों ने देशप्रेम के कुछ मौके चुन लिए हैं, जैसे युद्ध के समय या 15 अगस्त-26 जनवरी अथवा जब क्रिकेट मैच हो तब। यह याद रखने की आवश्यकता है कि देशभक्ति एक ऐसा अहसास है जिसे प्रतिदिन महसूस करने की जरूरत है। हमारे प्रतिदिन के व्यवहार से देशप्रेम झलकना चाहिए। कचरा न फेंकना, सड़क पर न थूकना, नियमों का पालन करना भी देशभक्ति है, लेकिन कई लोग इन सबके प्रति बेपरवाह रहते हैं। ऐसे ही वे देश की एकजुटता को लेकर भी सजग नहीं रहते। कोरोना के कहर से पहले दिल्ली में दंगे हुए जिसमें संपत्ति के साथ जान का भी नुकसान हुआ। ये दंगे हमारी एकजुटता की कमी के कारण हुए।

कोरोना के दौरान भारत में डॉक्टरों और सफाईकर्मियों पर हमले

इधर डॉक्टरों और स्वास्थ्य एवं सफाईकर्मियों पर हमले की कई घटनाएं सामने आई हैं। चिकित्सा पेशे में 40 साल से ज्यादा समय बिताने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि शायद ही कोई डॉक्टर अपने मरीज का इलाज करते समय यह सोचता होगा कि उसका धर्म, जाति क्या है? चिकित्सीय आचार-विचार हमें यही सिखाते हैं और यही हिप्पोक्रेट्स शपथ का हिस्सा है। एक बार 5-6 साल की उम्र का साहिल नाम का बच्चा आइसीयू में दाखिल हुआ। उसके बचने की उम्मीद कम थी। इस कारण उसे वेंटीलेटर पर रखा गया था। उसके दाखिले के करीब एक महीने बाद मुझे यह पता चला कि उसका पूरा नाम साहिल खान है, लेकिन इससे मुझे और मेरी टीम की सोच पर कोई असर नहीं पड़ा। करीब एक साल में वह स्वस्थ होकर घर गया। आज वह 12 साल का है और किसी त्योहार पर बधाई देना नहीं भूलता। आप इस किस्से से मरीज और डॉक्टर के रिश्ते का अनुभव कर सकते हैं।

हम एकजुट होकर कोरोना संकट को मात दे सकते हैं

यदि हम एकजुट होकर एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते रहे तो न केवल कोरोना संकट को मात दे सकते हैं, बल्कि उसके बाद के आर्थिक संकटों का भी सफलता से सामना कर सकते हैं। यदि हम किस्म-किस्म की बीमारियों का आकलन करें तो पाएंगे कि कुछ बीमारियां गरीबों में ज्यादा प्रचलित हैं, जैसे टीबी, रूमेटिक हार्ट डिजीज। कुछ अमीरों में अधिक प्रचलित हैं जैसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज। कुछ बीमारियां किसी खास आयु या किसी एक जेंडर में ज्यादा होती हैं, लेकिन कोरोना वायरस किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता। वह अमीर-गरीब, जाति-धर्म में कोई अंतर नहीं करता। इसलिए यह और ज्यादा जरूरी है कि हम एकजुट होकर उससे लड़ें। यह बीमारी मनुष्य को सतर्क रहने के साथ एक तरह से उसे सुधरने की भी चेतावनी दे रही है। इसे सुना ही जाना चाहिए। आखिर अब नहीं तो कब?

( लेखक मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली में डीन रहे हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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