नई दिल्ली, अनंत विजय। वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी।

हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया।

हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं।

इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए।

भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं।

‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था।

सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है।

इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में।

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है।

ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है।

ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं।

अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए।

ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके। 

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