संतोष पाठक। दिल्ली देश की राजधानी है। दुनिया के विशाल लोकतांत्रिक देश की राजधानी होने का गौरव हासिल करने वाली दिल्ली की छोटी सी छोटी घटना भी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोर लेती है। तमाम समस्याओं के बीच यहां लगभग हर साल बारिश में जलजमाव का संकट स्थायी हो चला है। कुछ घंटों की बारिश में ही जन-जीवन प्रभावित हो जाता है। कुछ दिनों के लिए हो-हल्ला मचता है, जिम्मेदारियां तय करने की बातें की जाती हैं, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप करते नजर आते हैं और फिर कुछ दिनों बाद सब शांत हो जाता है।

आखिर इस समस्या के लिए जिम्मेदार कौन है?: महज घंटे भर की बारिश में ही दिल्ली की सड़कों पर एक फीट तक पानी कैसे भर जाता है? नालियों से गाद निकालने का काम समय पर करना किसकी जिम्मेदारी है? बारिश में जलभराव की समस्या न हो, यह देखने के लिए कोई विभाग है भी या नहीं? आखिर इस समस्या का कोई स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जाता है? देश की राजधानी होने के कारण प्रधानमंत्री और उनका पूरा मंत्रिमंडल दिल्ली में ही निवास करता है। साथ ही दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है।

दिल्ली पुलिस, कानून-व्यवस्था का मसला और भूमि यह सब केंद्र सरकार के हाथ में है, जबकि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि होने के नाते केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशन में अंतिम फैसला लेने की असीमित शक्ति दिल्ली के उपराज्यपाल के पास है। इनके अलावा अधिकांश अधिकार दिल्ली की निर्वाचित सरकार को मिले हुए हैं। दिल्ली सरकार के मुखिया होने के नाते दिल्ली के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के साथी अन्य मुद्दों पर अंतिम फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बाद दिल्ली में शासन की अंतिम इकाई है नगर निगम।

विभागों की बात करें तो दिल्ली को चलाने में लोक निर्माण विभाग और शहरी विकास मंत्रालय की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हर बारिश के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो जाता है। दिल्ली की विपक्षी पार्टी दिल्ली सरकार को घेरती है तो नगर निगम में विपक्ष की कुसि॔यों पर बैठने वाले निगम के सत्ताधारी दल पर निशाना साधते हैं। दिल्ली की सत्ता की सरंचना भी ऐसी है कि ज्यादातर लोग समझ ही नहीं पाते कि समस्या के लिए वास्तविक तौर पर जिम्मेदार कौन है?

समस्या के पीछे का खेल: दिल्ली में जलभराव की समस्या को सुलझाने का जिम्मा मुख्य तौर पर पांच विभागों यानी एजेंसियों- लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली राज्य औद्योगिक और अवसंरचना विकास निगम, बाढ़ व सिंचाई नियंत्रण विभाग और सभी नगर निगम के जिम्मे है, लेकिन दिल्ली की सड़कों और नालियों के रखरखाव में 17 सरकारी विभागों की भी भूमिका होती है। तीनों नगर निगमों पर लगभग 24 हजार किमी सड़कों की जिम्मेदारी है। इन सड़कों से लगे चार फीट तक चौड़ाई वाले नालियों की सफाई का जिम्मा नगर निगम के पास है। इन नालियों से गाद निकालना, कूड़े की सफाई करने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। लोक निर्माण विभाग- पीडब्लूडी के अंतर्गत 1,200 किमी की सड़क आती है जिससे सटे नालियों की सफाई की जिम्मेदारी इनकी है। बड़े-बड़े नालों से गाद निकालने की जिम्मेदारी बाढ़ व सिंचाई नियंत्रण विभाग की होती है। आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर साल ये सभी विभाग मिलकर कई लाख टन गाद नालियों से निकालते हैं और इस पर खर्च होने वाली कुल राशि 800 करोड़ रुपये से भी ज्यादा होती है।

जलजमाव की समस्या के लिए दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम भी जिम्मेदार है जो काफी पुराना हो चुका है। पिछली बार 1976 में दिल्ली का जल निकासी मास्टर प्लान तैयार किया गया था। पिछले 44 वर्षों में दिल्ली की जनसंख्या में पांच गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम की संरचना और क्षमता में बड़ा विस्तार नहीं हुआ है। देखा जाए तो यह 30 प्रतिशत तक घट गई है। कई नाले भर चुके हैं, और रही-सही कसर अनियमित कॉलोनियों ने निकाल दी है। सरकारी एजेंसियां कैसे काम कर रही हैं इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि यहां सैकड़ों ऐसी सड़के हैं जिन्हें नालियों या ड्रेनेज के साथ समन्वित तरीके से बनाया ही नहीं गया है।

समन्वित योजना की जरूरत: बारिश से जलजमाव की समस्या पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी सिविक एजेंसियों को बारिश के पानी के ड्रेनेज सिस्टम और जलभराव से निपटने के लिए एक समग्र योजना बनाने का आदेश दिया है। इस आदेश के मद्देनजर जलभराव की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, सभी नगर निगमों को आपस में बैठकर रणनीति तैयार करने के साथ-साथ बेहतर समन्वय स्थापित करते हुए मिल कर काम करना होगा। नालियों की सफाई के लिए एक समयबद्ध चार्ट बनाना होगा जिसका पालन सुनिश्चित करवाने की जिम्मेदारी तय करना होगी। यह नियम कठोरता से लागू करना होगा कि बारिश का मौसम आने से पहले हर हाल में नालियों की सफाई हो जाए, गाद को बाहर कर दिया जाए और उसे सड़कों से तुरंत हटा भी लिया जाए। साथ ही दम तोड़ चुके ड्रेनेज सिस्टम को वर्तमान आबादी के हिसाब से बनाने के लिए भी एक समग्र योजना बना कर तेजी से काम करना होगा।

[वरिष्ठ पत्रकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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