रमेश ठाकुर। राजनीति की थोड़ी सी समझ रखने वाले भली-भांति समझते हैं कि सियासी दलों में बड़े औहदों पर होने वाली नियुक्तियों के पीछे कई गहरे राज और मायने छिपे होते हैं, लेकिन समय की नजाकत देखकर राजदारी और मायने एक दिन बेपर्दा जरूर होते हैं। राजनीतिक दल समय के मुताबिक ही ऐसे फैसले लेते हैं। भारतीय जनता पार्टी में साढ़े सात माह कार्यकारी अध्यक्ष रहने के बाद जेपी नड्डा को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया गया है। राजनीतिक पंडित उनके मनोनयन के पीछे एक नहीं, बल्कि कई सारे मायने निकाल रहे हैं। शायद भविष्य के संभावित खतरों को देखकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसा बदलाव किया हो।

सब कुछ ठीक होता तो अमित शाह में क्या खराबी थी। सात-आठ माह से गृह मंत्रलय और पार्टी अध्यक्ष पद दोनों का निर्वाह बखूबी कर तो रहे थे।दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद संपन्न हुए कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। झारखंड विधानसभा चुनाव का परिणाम उदाहरण के तौर पर सामने है। इसके अलावा भाजपा के सामने एक और परेशानी विगत कुछ समय से खड़ी हो गई है। भाजपा ने कई दलों को जोड़कर एनडीए नाम का कुनबा बनाया था। बीते कुछ समय से एनडीए का हिस्सा रहे विभिन्न दल अब धीरे-धीरे अलग होते जा रहे हैं जिसमें शिवसेना भी शामिल है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले अब शिरोमणि अकाली दल ने भी एनडीए से नाता तोड़ लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी-शाह युग में भाजपा अपने घटक दलों के साथ तालमेल ठीक से नहीं बैठा पा रही है। उनके कई पुराने साथी एक-एक करके उनसे अलग हो रहे हैं।एक देसी कहावत है कि ‘मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू’। दिल्ली चुनाव की बिसात बिछी हुई है। हवा का रुख भाजपा के मुताबिक नहीं है। चुनावों में पार्टी की हार-जीत हमेशा मुखिया के सिर आती है।

जीत पर तो तालियां खूब बजती हैं, पर हार किसी भी मुखिया के सियासी करियर पर सवाल उठा देती है।वहीं इस वक्त देश में सीएए, एनपीआर और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मसलों पर सरकार विरोधी माहौल भी बना हुआ है। कुल मिलाकर भाजपा की स्थिति इन दिनों कुछ कमजोर हुई है? शायद इस स्थिति को भांपते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने आपस में मंत्रणा करके पार्टी के अध्यक्ष पद पर जेपी नड्डा को बैठाने का निर्णय लिया हो।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं)

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