[अभिषेक कुमार सिंह]। दावों को देखें तो लगता है कि बीते चार वर्षों के मुकाबले दिवाली पर इस बार प्रदूषण तुलनात्मक रूप से कम रहा, लेकिन क्षितिज में फैली जहरीली धुंध पर और सांसों में जाती प्रदूषित हवा को देखें तो महसूस होता है कि राहत की बातें सिर्फ एक धोखा हैं। यूं इस बार देश की राजधानी दिल्ली में सरकार ने जागरूरकता अभियान चलाने और लेजर शो के आयोजन से लेकर कई ऐसे प्रबंध किए थे, ताकि लोग दिवाली पर पटाखे चलाने से बाज आएं, लेकिन इस प्रकाश पर्व के अगले दिन एयर क्वॉलिटी इंडेक्स से जुड़े आंकड़े साफ कर रहे थे कि सांस लेने लायक साफ हवा अभी भी एक सपना ही है।

आंकड़ों में प्रदूषण का स्तर भले ही पिछले वर्षों के मुकाबले कुछ कम दिखाई दे रहा हो, लेकिन दिल्ली से सटे गाजियाबाद-नोएडा आदि शहरों का धुंधलाया आसमान यह गवाही दे रहा है कि पटाखों पर प्रतिबंध की बात हो या इस इलाके में लागू ग्रेडेड रेस्पांस एक्शन प्लान, ये सभी महज दिखावटी उपाय साबित हुए हैं।

सिर्फ पटाखे ही नहीं हैं प्रदूषण की वजह

पिछले साल दीपावली के नजदीक सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि या तो हरित पटाखे छोड़े जाएं या फिर त्योहारों के मौके पर शाम 8 से 10 तक ही पटाखे चलाए जाएं। इसके बाद मार्च, 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट देश भर में पटाखों के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें दलील दी गई थी कि इनकी वजह से प्रदूषण बढ़ता है तो अदालत ने कहा था कि लोग पटाखों के पीछे क्यों पड़े हैं जबकि इनसे ज्यादा प्रदूषण तो वाहनों और तमाम उद्योगों से होता है। जैसे कि शहरों की बात करें तो वहां होने वाले वायु प्रदूषण के लिए कारें ज्यादा जिम्मेदार हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में अदालत ने पटाखों और ऑटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण के बीच तुलनात्मक अध्ययन की बात कह कर एक ऐसी विसंगति पर अंगुली रखी थी जो देश में एक ओर रोजगार तो दूसरी तरफ प्रदूषण के मारक असर की चिंता से जुड़ी है। पटाखों पर बैन के कारण इस उद्योग से जुड़े रोजगार के खात्मे की आशंका के तहत अदालत की चिंता यह थी कि कहीं इस उपाय से देश में बेरोजगारी न बढ़ जाए। इसलिए प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखों को जिम्मेदार मानकर उसके असली कारकों की अनदेखी घातक सिद्ध हो सकती है। सवाल है कि अगर पटाखे शहरों में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह नहीं हैं तो क्या कार आदि वाहनों और उद्योग-धंधों से निकलने वाला जहरीला धुआं ही प्रदूषण का असली कारण है?

वाहन एवं उद्योग भी भर रहे हवा में जहर

ऐसे कई अध्ययन हुए हैं, जो साबित करते हैं कि दिखावे के पटाखे और खेतों में जलाई जाने वाली पराली (कृषि अवशेष) के अलावा कार के रूप में संपन्नता ने असल में हवा को जहर बनाने में ज्यादा योगदान दिया है। वर्ष 2019 की शुरुआत में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने एक रिपोर्ट में बताया था कि आबोहवा खराब करने की वजहों में 61 प्रतिशत हिस्सेदारी वाहनों और इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण की है। उस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में ही कार जैसे वाहनों की वजह से 39 प्रतिशत और इंडस्ट्री के कारण 22 प्रतिशत प्रदूषण हो रहा है। इनके अलावा धूल से 18 प्रतिशक प्रदूषण फैल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में निजी वाहनों की संख्या फिलवक्त सवा करोड़ से ऊपर है। यह संख्या सालाना करीब 10 लाख की दर से बढ़ रही है।

उल्लेखनीय यह है कि निजी वाहनों में सबसे बड़ी संख्या कारों की है जिसका उपभोक्ता शहरी मध्यवर्ग है। दिल्ली सरकार ने बताया था कि देश की राजधानी में वर्ष 2015 में साढ़े 6 हजार लोगों की मौत सांस संबंधी बीमारियों की वजह से हुई जिसके लिए यहां की प्रदूषित हवा सीधे तौर पर जिम्मेदार है। वैसे तो सम-विषम फॉर्मूला अपना कर, कार-फ्री डे का आयोजन करके और 15 साल से ज्यादा पुराने वाहनों को सख्ती के साथ सड़कों से हटाने जैसे उपाय यहां की सरकार कर चुकी है। इस साल एक बार फिर 4 नवंबर से यही व्यवस्था दिल्ली में लागू होने जा रही है, लेकिन जिस तरह से लोग कारों के पीछे भाग रहे हैं, उसके कारण ट्रैफिक जाम और स्मॉग (जहरीली धुंध) की समस्याएं यहां की सतत नियति बन चुकी हैं।

आकाल मौत का कारण बन रहा प्रदूषण

कारों की बढ़ती संख्या दो अहम सवाल खड़े करती है? पहला यह कि आखिर क्यों लोग अपनी पूंजी ऐसी मद में खर्च करते हैं जो आगे चलकर उन्हीं की जिंदगी हलकान करती है? और दूसरा यह कि कारों पर लगाम लगाने में सरकारें नाकाम क्यों हो रही हैं? मसला अकेले दिल्ली-मुंबई का नहीं है। कानपुर, इंदौर, लुधियाना, अहमदाबाद समेत ज्यादातर उत्तर-मध्य भारतीय शहरों में ट्रैफिक जाम और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण ने लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल कर दिया है। चूंकि वाहनों की संख्या बढ़ रही है इसलिए हवा में बढ़ता प्रदूषण लोगों में सांस की बीमारियां पैदा कर रहा है। इसके कारण आम लोगों की जिंदगी औसतन तीन साल तक कम हो रही है।

कुछ ही समय पहले इस बारे में एक अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थशास्त्रियों ने किया। उनके अध्ययन से पता चला कि हमारे देश के करीब 66 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां की हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पदार्थों (पार्टिकुलेट मैटर) का प्रदूषण सुरक्षित मानकों से ऊपर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) हाल के एक सर्वे में यह भी बता चुका है कि दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से पांच शहर भारत में हैं। डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा था कि वायु प्रदूषण भारत में अकाल मौतों की प्रमुख वजहों में से एक है। इससे संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल छह लाख बीस हजार लोगों की मौतें भारत में होती हैं।

सार्वजनिक परिवहन की सीमा

कार पर पूंजी लगाने वालों की मजबूरी यह है कि महंगी होती प्रॉपर्टी और आबादी के दबाव के मद्देनजर उन्होंने जिन उपनगरीय इलाकों में निवास को प्राथमिकता दी है, वहां से कार्यस्थल तक आना-जाना आसान नहीं है। दिल्ली से बाहर मेट्रो का इतना विस्तार नहीं हुआ है कि सभी लोग आसानी से दिल्ली पहुंच सकें। अन्य शहरों में तो अभी मेट्रो की शुरुआत ही हो रही है। मेट्रो की अपनी सीमाएं भी हैं, वह बस-कार की तरह शहर के हर कोने तक नहीं पहुंच सकता है। दिल्ली-एनसीआर में तो लोग मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए भी कारों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें इस वास्ते फीडर बसों का विकल्प नहीं मिल पाता है।

मेट्रो के बरक्स पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में बसें लोगों को ऐसी सहूलियत मुहैया नहीं करा पा रही हैं कि वे कार खरीद को तिलांजलि दे सकें। सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआइ) के प्रमुख साइंटिस्ट डॉ. एस वेलमुरगन के मुताबिक दिल्ली में 6,088 बसों के बेड़े में से औसतन 3,850 बसें ही रोजाना सड़कों पर निकल पाती हैं जो जरूरत के मुकाबले नाकाफी हैं। ऐसे में लोगों को खुद का वाहन एक सुविधाजनक विकल्प लगता है। हालांकि इसके पीछे सोशल स्टेटस भी एक बड़ी वजह है। कई बार लोग जरूरी नहीं होने पर भी कार खरीदते हैं और इसके लिए तरह-तरह की आपातकालीन जरूरतों का हवाला देते हैं।

समाधान के बजाय समस्या बनतीं कारें

हालांकि कारों को समस्या के रूप में देखने की नीति या समझ के विरोधियों का एक अलग मत भी है। वे कहते हैं कि समस्या कारें नहीं, बल्कि सड़कों एवं ट्रांसपोर्ट के दूसरे इंतजामों की है। हमारे देश में ज्यादातर सड़कें कारों के हिसाब से डिजाइन नहीं की गई हैं। पार्किंग के समुचित प्रबंध नहीं किए हैं। कानून में नए घर-मकानों के लिए यह जरूरी नहीं किया गया है कि उनमें कारों की पार्किंग के लिए अनिवार्य रूप से जगह हो। देश की राजधानी दिल्ली में सैकड़ों अवैध कॉलोनियां ऐसी हैं जहां कारें बाहर गली में खड़ी की जाती हैं। ऐसी ही समस्याओं के चलते कारें किसी समस्या का समाधान बनने के बजाय खुद में एक समस्या बन गई हैं।

जिंदगी पर भारी पड़ती जहरीली हवा

प्रदूषित हवा हमारी सेहत पर कितनी भारी पड़ रही है, इसका एक खुलासा इस साल मार्च में अमेरिका के हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआइ) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट-स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019 में किया गया गया था। उस रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक घर से बाहर रहने या घर में वायु प्रदूषण की वजह से 2017 में स्ट्रोक, मधुमेह, दिल का दौरा, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े की पुरानी बीमारियों से पूरी दुनिया में करीब 50 लाख लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि इनमें से 30 लाख मौतें सीधे तौर पर पीएम 2.5 से जुड़ी हैं। इनमें से करीब आधे लोगों की मौत भारत और चीन में हुई है।

साल 2017 में इन दोनों देशों में 12-12 लाख लोगों की मौत इस वजह से हुई थी। उस रिपोर्ट में दक्षिण एशिया को सबसे प्रदूषित क्षेत्र माना गया था जिसमें भारत, पाक, बांग्लादेश और नेपाल शामिल हैं। हालांकि चीन और भारत में प्रदूषण से होने वाली मौतों का आंकड़ा एक जैसा है, लेकिन संस्था का कहना था कि चीन ने प्रदूषण को कम करने में काफी हद तक सफलता हासिल कर ली है। गौरतलब है कि भारत में स्वास्थ्य संबंधी खतरों से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण और इसके बाद धूम्रपान है। खराब आबोहवा की वजह से दक्षिण एशिया में मौजूदा हालात में जन्म लेने वाले बच्चों की जिंदगी ढाई से तीन साल कम हो रही है।

जमीन पर असर नहीं छोड़ रहे उपाय

पर्यावरण और साफ आबोहवा की जरूरत को समझते हुए सरकारों और अदालतों ने इस मुद्दे को काफी अहमियत दे रखी है, लेकिन विडंबना यह है कि इनसे संबंधित सारे उपाय हकीकत की जमीन पर कामयाब नहीं हो रहे हैं। चंद सक्रिय लोगों, संगठनों और अदालती फैसलों के दबाव में सरकारें भी आनन-फानन कुछ कदम उठा लेती हैं, लेकिन चंद रोज में फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ जाता है। इसकी एक सच्चाई यह है कि विकास के नाम पर सरकारों ने औद्योगिक इकाइयों को जहरीला धुआं फैलाने की खुली छूट दे रखी है।

कहीं-कहीं तो अदालतों को भी ठेंगा दिखा दिया जाता है, जैसे हरियाणा के अरावली क्षेत्र में निर्माण कार्य जारी रखने के लिए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी करते हुए 119 साल पुराना कानून बदल डाला था। पीएलपीए (पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट 1900) में संशोधन के जरिये उसने अरावली और शिवालिक पहाड़ियों की 29,682 हेक्टेयर संरक्षित भूमि को विकास कार्यों के लिए खोल दिया था। हालांकि बाद में अदालत ने इस संशोधन पर रोक लगा दी, लेकिन कई अन्य राज्यों ने पर्यावरण के नियमों को धता बताते हुए औद्योगिक इकाइयों, बिल्डरों और खनन माफिया को मदद पहुंचाई है।

वायु प्रदूषण के कुछ और कारण भी जिम्मेदार हैं। जैसे आइआइटी कानपुर के एक अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण के लिए औद्योगिक इकाइयों और पराली जलाने जैसी सामयिक वजहों के अलावा गाड़ियों की बढ़ती संख्या, छोटे उद्योगों का डीजल जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों पर निर्भर होना और निर्माण कार्यों एवं टूटी सड़कों की वजह से हवा में धूल का उड़ना भी जिम्मेदार है। आज भी ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों में वायु प्रदूषणरोधी उपाय नहीं किए गए हैं। कुछ शहरों में पेट्रोलडीजल की जगह गैस के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है, लेकिन इसके अपेक्षित नतीजे अभी आने बाकी हैं।

[संस्था एफआइएस

ग्लोबल से संबद्ध]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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