रिजवान अंसारी। तमाम कोशिशों के बाद भी नक्सलवाद को अभी तक खत्म करने में कामयाबी नहीं मिल सकी है। हालिया बजट सत्र में ही केंद्रीय गृह मंत्रलय द्वारा दिए गए एक आंकड़े के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में देश में 2,168 नक्सली हमलों को अंजाम दिया गया है जिनमें 625 लोगों की जान गई है। 2008 में 223 जिले नक्सल प्रभावित थे, लेकिन तत्कालीन सरकार के प्रयासों से इनमें कमी आई और 2014 में यह संख्या 161 रह गई। 2017 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 रह गई।

गृह मंत्रलय की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि इनमें से भी 44 जिलों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है, जबकि आठ नए जिलों में नक्सली गतिविधियां देखी जा रही हैं। केरल में ऐसे तीन, ओडिशा में दो और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश में एक-एक जिले पाए गए हैं। लिहाजा नक्सल प्रभावित कुलों जिलों की संख्या अब 90 हो गई है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि जब एक तरफ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के सिमटने के दावे हो रहे हैं तो फिर ऐसे नए जिले यह क्यों पनप रहे हैं?

एक तरफ जहां इस समस्या की वजह आíथक और सामाजिक विषमता समझी जाती रही है, वहीं दूसरी ओर इसे अब एक राजनीतिक समस्या भी समझा जाने लगा है। नक्सल समस्या पर अक्सर राजनीतिक बयानबाजी होती रहती है, जबकि इस पर गंभीर बहस होनी चाहिए। दरअसल हमारी सरकारें भी संविधान की पांचवीं अनुसूची को सही ढंग से लागू करने पर संजीदा नहीं रही हैं। आजादी के 70 वर्षो बाद भी अब तक अनुसूचित क्षेत्रों को प्रशासित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना की बात की गई है, जो आदिवासियों को अपने क्षेत्रों में प्रशासन करने का अधिकार देता है। इस परिषद में अधिकतम 20 सदस्य होते हैं, जिनके तीन-चौथाई सदस्य वे होते हैं, जो संबंधित राज्य के विधानसभा में अनुसूचित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आदिवासियों को अधिकार नहीं मिलने के कारण भी इनमें असंतोष पनपता है और नक्सली इसी का फायदा उठाकर आदिवासियों को गुमराह करते हैं। इसी तरह 1996 के पेसा अधिनियम, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि और जनजातीय कानूनों को भी सही रूप में लागू करने की जरूरत है। पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि पंचायती राज मंत्रलय का एक कार्यक्रम है, जो देश के 272 पिछड़े जिलों में विकास की विषमता को खत्म करने के लिए बनाया गया है।

दरअसल हमें नक्सलवाद की असली वजहों को समझना होगा, तभी इस समस्या का समाधान निकल सकेगा। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसे मसलों पर जब तक युद्ध स्तर पर काम नहीं होगा, तब तक इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती। साथ ही सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी जारी रखनी होगी, क्योंकि नक्सली भी आतंकवादी से कम नहीं हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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