अवधेश कुमार। यह सही है कि विधानसभा चुनावों में राज्य से संबंधित मुद्दे, समस्याएं, उम्मीदवार, नेतृत्व आदि लोगों के मत निर्धारण में प्रमुख कारक होते हैं, किंतु राष्ट्रीय मुद्दे प्रबल हों तो वे भी व्यापक स्तर पर लोगों की मानसिकता प्रभावित करते हैं। कई बार स्थानीय-प्रादेशिक मुद्दे इनके प्रभाव में हाशिये पर चले जाते हैं। इस बार भी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर नहीं लड़े जा रहे हैं। जो लोग सामान्य मुद्दों यानी बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, सामाजिक-सांप्रदायिक समीकरण आदि तक ही अपना विश्लेषण सीमित रखते हैं, उनके निष्कर्षों में दोष इसी कारण होता है कि वे राष्ट्रीय मुद्दों के प्रभाव का सही आकलन नहीं कर पाते। चुनाव वाले सभी राज्यों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक प्रमुख चुनावी मुद्दे के रूप में विद्यमान हैं। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के हैं, लेकिन उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और यहां तक कि गोवा में भी उनके वक्तव्य एवं कार्यों की चर्चा व्यापक तौर पर हो रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद हर जगह लोगों के बीच बहस के विषय बने हुए हैं। चीन और पाकिस्तान के साथ तनाव तथा उसके अनुरूप केंद्र सरकार की नीतियों पर लोगों को बातें करते सुना जा रहा है। पंजाब के साथ उत्तराखंड और मणिपुर भी सीमाई राज्य हैं। यहां राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंध का असर मतदान पर होगा।

अनेक ऐसे मुद्दे, जो राष्ट्र और केंद्र सरकार की नीतियों से संबंधित हैं, राज्यों के चुनाव में तैर रहे हैं। जैसे अनुच्छेद 370 का अंत जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ है, लेकिन उसकी प्रतिध्वनि पांचों राज्यों में सुनाई दे रही है। अनेक लोग यह कहते मिल जाएंगे कि भाई हमने तो सोचा भी नहीं था कि हमारे जीवन में अनुच्छेद 370 हट जाएगा, लेकिन हट गया तो जिसने हटाया, मेरा वोट तो उसी को जाएगा। इसी तरह 370 को गलतफहमी में मुसलमानों की अस्मिता से जोड़कर देखने वाले भी हैं। इस आधार पर वे भाजपा का विरोध कर रहे हैं। पंजाब में तो 370 गूंजता ही है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर का पड़ोसी राज्य है। वहां राज्य के लिए विशेष अधिकार मांगने वाले भी हैं, पर वे यह भी कह रहे हैं कि जो भाजपा कश्मीर का विशेषाधिकार खत्म कर सकती है, वह हमें कहां से दे सकती है? इसी तरह के विचार आपको उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सुनने को मिल जाएंगे। जाहिर है 370 का मुद्दा भी छोटे बड़े अनुपात में मतदान प्रभावित करेगा। इसी तरह काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्निर्माण सभी जगह लोगों के जेहन में है। बेशक उत्तर प्रदेश में व्यापक स्तर पर इसकी चर्चा है। उत्तराखंड और पंजाब यहां तक कि गोवा और मणिपुर में भी आपको कहीं-कहीं ऐसा कहने वाले मिल जाएंगे कि दूसरी सरकार होती तो काशी का ऐसा कायाकल्प नहीं होता।

श्रीराम मंदिर निर्माण के साथ अयोध्या को नया कलेवर देने तथा वहां सरयू घाट पर दीपावली के दृश्यों ने पूरे देश को प्रभावित किया है। कोई यह मान ले कि इसका असर केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित है तो भूल होगी। मथुरा का मुद्दा पहले केशव प्रसाद मौर्य और बाद में योगी आदित्यनाथ ने उठाया। निश्चित रूप से उनका फोकस उत्तर प्रदेश चुनाव रहा होगा, लेकिन इसकी गूंज पूरे देश में गई। गोहत्या, मतांतरण और तीन तलाक के विरुद्ध कानून का निर्माण हो या उत्तर प्रदेश सरकार की जनसंख्या नियंत्रण संबंधी पहल या फिर राष्ट्र विरोधी हरकतों के आरोप में अनेक एनजीओ को प्रतिबंधित करना, ये सभी राज्यों में चुनावी मुद्दा हैं।

सामान्यत: चुनाव में कौनसे मुद्दे प्रबल होंगे और कौनसे हाशिये पर रहेंगे, यह राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है। अपने चुनावी अभियानों में राजनीतिक दल जिन मुद्दों को उठाते हैं, काफी हद तक सामूहिक मनोविज्ञान उन्हीं से निर्मित होता है। यह भारत की दृष्टि से सकारात्मक पहलू है। सामान्य लोग भी राष्ट्र की सुरक्षा, संस्कृति-सभ्यता सहित राष्ट्रीय मुद्दों के साथ भावनात्मक तौर पर जुड़े दिखते हैं। वैसे भी प्रत्येक क्षेत्र और राज्य अंतत: देश का ही अंग है। राष्ट्रीय नीतियां लोगों को नीचे तक प्रभावित करती हैं। वास्तव में राष्ट्रीय और प्रादेशिक मुद्दों के बीच बिल्कुल साफ-साफ विभाजक रेखा खींचना कठिन है। ज्यादातर मुद्दे एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। किसान सम्मान निधि केंद्र सरकार का निर्णय है, लेकिन जाता तो किसानों के खाते में ही है। अगर लव जिहाद केरल से कश्मीर तक सामने आया है तो इसके विरुद्ध कानून चाहे किसी राज्य में बने, वह दूसरे राज्य में मुद्दा होगा ही। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक पंजाब में हुई, लेकिन हर राज्य में किसी न किसी रूप में उसकी गूंज रही। यह बात अलग है कि ज्यादातर विपक्षी नेता इसे उस रूप में नहीं ले रहे हैं, जिस रूप में भाजपा। फिर भी यह मुद्दा बन रहा है। अयोध्या, काशी और मथुरा उत्तर प्रदेश में होने के साथ भारत सहित विश्व भर के हिंदुओं के लिए आस्था के केंद्र हैं। यह संभव नहीं कि पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में रहने वाले लोग इससे अपने को अलग कर लें। जनसंख्या असंतुलन क्या केवल किसी एक राज्य का मुद्दा हो सकता है? बिल्कुल नहीं। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि राजनीतिक दलों के सामने बिल्कुल खुला मैदान है। बेशक लोगों की दैनिक आवश्यकताएं, स्थानीय स्तर पर उनकी सुरक्षा, सम्मान आदि विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राष्ट्र का भाव सर्वोपरि है। लोगों की भावनाओं को समझकर उसे अभिव्यक्ति देकर चुनावों को स्पष्ट राष्ट्रीय विचारधारा का प्रतिरूप बनाया जा सकता है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Edited By: Ajay Kumar Rai