[रमेश पोखरियाल निशंक]। National Education Day: वर्ष 2014 में एनडीए की सरकार ने देश की कमान संभाली तो स्पष्ट किया था कि वैश्विक परिवेश की नई चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हमें एक नई शिक्षा नीति की आवश्यकता है। प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति का गठन वर्ष 2017 में हुआ और उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकतानुसार शिक्षा नीति सुझाएं।

31 मई 2019 को नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट स्वीकार कर जब हमने नई शिक्षा नीति को पब्लिक डोमेन में डाला और समस्त हितधारकों से जुड़ने की कोशिश की तो यह विश्व में मुक्त नवाचार का अपनी किस्म का सबसे बड़ा प्रयोग था। नई शिक्षा नीति के लिए हमारे पास अब तक सवा दो लाख सुझाव प्राप्त हुए जिनका विश्लेषण जारी है। मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि हम अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का मुकाबला अमेरिका, जर्मनी, जापान की नकल कर के नहीं कर सकते, हमें भारत बनकर ही वैश्विक चुनौतियों से निपटना होगा। हम विश्व गुरु रहे हैं। हमने पूरे विश्व को नेतृत्व दिया है, मार्गदर्शन दिया है, नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे केंद्रों ने संपूर्ण विश्व को नई दिशा दिखाई। यह सब इसलिए हुआ कि हमारी शिक्षा नीति मूल्यों और संस्कारों पर आधारित थी। चाहे हमारे गुरुकुल रहे हों, चाहे विश्वविद्यालय रहे हों, सर्वत्र मानवीय मूल्यों की शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का आकलन वहां पर संसाधन जुटा देने मात्र से नहीं होता। केवल अवस्थापना या उपकरण जुटाना पर्याप्त नहीं है, अपितु वहां के लोगों के द्वारा अपनाने वाली पद्धतियों, संस्कारों, मूल्यों, कार्य-शैलियों से राष्ट्र निर्माण होता है। हम अपने डिजिटल रिसोर्स से शहर के चप्पे-चप्पे की निगरानी तो कर सकते हैं, लेकिन सन्मार्ग पर चलते हुए हमें अपनी कार्य संस्कृति, संस्कारों, मूल्यों और कार्यशैली को भी उसी के अनुरूप ढालना होगा, तभी शक्तिशाली भारत, समृद्ध भारत, आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा। हमारी अजर अमर भारतीय संस्कृति हमें उन मानवीय मूल्यों के दर्शन कराती है जो सर्वोत्कृष्ट समाज और राष्ट्र के निर्माण का आधार स्तंभ है। इस संस्कृति में हमें एकात्म मानववाद से प्रेरित भावनात्मक एकता के दर्शन होते हैं। यही एकता हमारी शक्ति है, यही कारण है कि हजारों वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बावजूद हमने अपनी पहचान नहीं खोई है। इसीलिए मशहूर शायर इकबाल ने कहा है- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

अगर देखा जाए तो भारत आदिकाल से ही अनेकता में एकता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता रहा है। हमने विविधता में एकता से न केवल भारत को जोड़ने की बात कही है, अपितु वसुधैव कुटुंबकम का संदेश देकर पूरे विश्व को अपना परिवार माना है। विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाला भारत दुनिया को अन्य देशों की तरह एक बाजार के रूप में नहीं देखता, बल्कि अपने परिवार का ही एक हिस्सा मानता है। आज भारत को युवा राष्ट्र की संज्ञा दी जा रही है, विश्व मनीषा को भारत के नवयुवकों में विशिष्ट ऊर्जा दिखाई दे रही है। विकास और प्रगतिशीलता की इस आंधी में विश्व बिरादरी को भारत के बाजार अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। आर्थिक रूप से सशक्त देश भारत में ही अपना निवेश करना चाहते हैं। विश्व के युवा राष्ट्र के रूप में हमारे पास युवाओं की असीम शक्ति है। शक्ति का सदुपयोग इस बात पर निर्भर करेगा कि किस प्रकार हम इन्हें संस्कारित कर राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करें।

संपूर्ण मानवता की 18 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत का वैश्विक शक्ति के रूप में अभ्युदय इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारे समूचे युवा अपनी अपनी क्षमता अनुसार देश के लिए समर्पित भाव से कार्य करें। एक ऐसे सशक्त, समृद्ध और वैभवशाली भारत का निर्माण जो संपूर्ण विश्व को नेतृत्व प्रदान कर सके। इस चुनौतीपूर्ण युग में केवल भारत ही वह देश है जो पूरे विश्व में एक देदीप्यमान सितारे की तरह सबका पथ आलोकित करने की क्षमता रखता है।

विश्व के युवा राष्ट्र के रूप में हम सृजनात्मकता, उद्यमिता, नवाचार, शोध एवं अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। कई बार मैंने विभिन्न मंचों पर यह कहा है कि युवा विद्यार्थियों के रूप में हमारे पास एक बड़ी शक्ति है। अमेरिकी जनसंख्या से अधिक हमारे विद्यार्थियों की संख्या है। हम इसे सकारात्मक दिशा में ले जाने में सक्षम हुए तो हम नए युग का सूत्रपात कर सकते हैं। एक भाव, जो मैं अपनी ओर से आप सबके समक्ष रखना चाहता हूं, और उसमें मेरा यह दृढ़विश्वास भी है, कि भारत की अविरल गरिमामयी परंपरा और संस्कृति को संजोने में राष्ट्रवाद की धारणा और भावना अत्यंत उपयोगी होती है।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रवाद किसी भी समृद्ध और सार्वभौम देश के लिए रीढ़ का काम करती है। इसलिए विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में राष्ट्रवाद से प्रेरित शिक्षण होना कहीं अधिक लाभकारी होगा। मेरा तो यह भी मानना है कि हमारे विश्वविद्यालयों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का शिक्षण भी राष्ट्रहित और विकास के उद्देश्य से किया जाता है। इसलिए जो लोग राष्ट्रवाद और आधुनिक उच्चशिक्षा व्यवस्था में विरोधाभास देखते हैं, वो कहीं न कहीं बड़ी भूल कर रहे हैं।

आधुनिक विश्व में जिस प्रकार ऊहापोह मचा हुआ है, उसमें भारत जैसे प्राचीन और संस्कृति संपदा से धनी देश की भूमिका बलवती होती जा रही है। और हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने जिस दृढ़शक्ति और कुशलता से भारत की गरिमा को विश्व में पुनस्र्थापित करने का प्रयास किया है, उसकी चहुंओर प्रशंसा हो रही है। प्रधानमंत्री के ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प को पूर्ण करने में हमारे शिक्षण संस्थान अद्वितीय योगदान कर सकते हैं, हमारी प्राचीन धरोहर को पुनप्र्राणित कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि मूल्यों पर आधारित नई शिक्षा नीति भारत को वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में सफल होगी।

[मानव संसाधन विकास

मंत्री, भारत सरकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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