भोपाल [संजय मिश्र]। मध्य प्रदेश में यद्यपि 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाला है, लेकिन माहौल सामान्य चुनाव जैसा ही बन गया है। इसका मुख्य कारण सत्ता में बने रहने या सत्ता पाने के लिए इन सीटों की अहमियत है।

माना जा रहा है कि जो जीता वही सत्ता का सिकंदर होगा। भाजपा यदि दस सीटें भी जीत लेती है तो उसकी सरकार मजबूत हो जाएगी, लेकिन यदि कांग्रेस सर्वाधिक सीटें जीतती है तो समीकरण बदल सकता है। यही कारण है कि यह उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। दोनों पार्टयिों के नेता एक दूसरे के खिलाफ आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं।

आम चुनाव से भी अधिक नेता एक दूसरे पर निजी हमले कर रहे हैं। शब्दों की मर्यादा टूट चुकी है। जो आमने-सामने शिष्टाचार का प्रदर्शन करते थे वे एक दूसरे को चोर-डाकू, गद्दार जैसे विशेषणों से नवाज रहे हैं। एक दूसरे को पछाड़ने के लिए रोज मुद्दे और नारे गढ़े जा रहे हैं, लेकिन उपचुनाव में भी कर्ज माफी ही सर्वाधिक चर्चा में है। दोनों पार्टयिों ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बना रखा है। भाजपा पर तोहमत मढ़कर कांग्रेस अपना बचाव करना चाहती है तो भाजपा उसे नए सवालों पर घेर रही है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में किसानों की कर्ज माफी बड़ा और निर्णायक मुद्दा था।

दरअसल, कांग्रेस और कमल नाथ को यह भान था कि शिवराज सिंह चौहान की छवि किसान हितैषी है। किसानों के लिए भावांतर से लेकर कई योजनाएं भी शुरू हुई थीं। इसकी तोड़ के तौर पर कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में कर्ज माफी योजना को आगे रखा था। भाजपा को यह उम्मीद थी कि कांग्रेस की यह घोषणा उसके द्वारा बीते 15 वर्षो में किए गए किसान हितैषी कार्यो के आगे नहीं टिक पाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसानों ने कमल नाथ के वचन पर भरोसा जताया और कांग्रेस का सत्ता से वनवास खत्म हो गया।

कमल नाथ की अगुआई में कांग्रेस की सरकार बनी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजते ही उन्होंने सबसे पहले आदेश 48 लाख किसानों की 54 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का निकाला। इससे किसानों का भरोसा और बढ़ा, पर यह जितना आसान दिख रहा था, उतना था नहीं। खजाना खाली था और दो लाख रुपये तक का कर्ज चुकाने में लगने वाली राशि इतनी बड़ी थी कि यदि इसे पूरा करने लग जाते, तो दूसरे कोई काम नहीं हो सकते थे।

लिहाजा, वित्त विभाग ने पेच फंसाना शुरू किया। कर्ज माफी का ऐसा फार्मूला बनाया कि दो खाते वाले, दो लाख रुपये से अधिक कर्ज वाले, खेती के अलावा अन्य कामों के लिए कर्ज लेने वाले किसान दायरे से बाहर हो गए। इसके बाद भी किसानों की बड़ी संख्या बची थी। इनका कर्ज माफी करने के लिए 16 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की जरूरत थी, इसलिए इसे तीन चरणों में करने का निर्णय लिया गया। 

विपक्ष में रहते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कई बार चेतावनी दी कि सरकार किसानों की कर्ज माफी करे। कांग्रेस ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप उनके घर जाकर उन्हें कर्ज माफी के रिकॉर्ड उपलब्ध कराए। इस बीच कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर्ज माफी से लेकर कई अन्य वादे पूरे नहीं होने का आरोप लगाते हुए हाथ को झटका दे दिया और कांग्रेस की सत्ता से विदाई हो गई।

कांग्रेस तब से लेकर अब तक कर्ज माफी के मुद्दे पर भाजपा को घेर रही है। भाजपा नेता भी पलटवार कर रहे हैं कि किसानों को कर्ज माफी का प्रमाणपत्र पकड़ा दिया, पर कर्ज माफी हुई नहीं। कांग्रेस ने योजनाबद्ध तरीके से विधानसभा में कर्ज माफी के संबंध में प्रश्न किए। कई विधायकों के सवाल के जवाब में कृषि मंत्री ने जो जवाब दिए वो सरकार को परेशानी में डालने वाले थे।

विधानसभा में स्वीकार किया गया कि पहले चरण में दो लाख रुपये तक कालातीत खाते और पचास हजार रुपये तक चालू खाते पर कर्ज वाले किसानों की कर्ज माफी का निर्णय लिया। इसके लिए 20,23,136 किसानों के 7,108 करोड़ रुपये के ऋण माफ करने के लिए स्वीकृत किए गए। दूसरे चरण में चालू खाते पर एक लाख रुपये तक कर्ज माफ होना था। इसके लिए 6,72,245 खातों के 4,538 करोड़ रुपये के प्रकरण स्वीकृत किए गए।

इस प्रकार दोनों चरणों में 26,95,381 खातों का ऋण 11,646 करोड़ रुपये की कर्ज माफी के लिए स्वीकृत किया गया। यदि कर्ज माफी की यह प्रक्रिया पूरी होती तो 5,90,848 किसानों को और लाभ मिलता। कांग्रेस ने इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया और भाजपा सरकार पर किसानों को गुमराह करने का आरोप लगाया। इस बीच विधानसभा में दिए उत्तर से बैकफुट पर आने की जगह सरकार ने आक्रामकता के साथ कांग्रेस पर पलटवार किया। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री भूपेंद्र सिंह ने दावा किया कि किसानों की कर्ज माफी नहीं हुई। 

विधानसभा में अधिकारियों के स्तर पर त्रुटि हुई और गलत आंकड़े प्रस्तुत हो गए। जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी। वहीं, कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि किसानों के साथ इससे बड़ी धोखाधड़ी कभी नहीं हुई। किसानों का दो लाख रुपये तक कर्ज माफ करने का वादा किया था, लेकिन नहीं हुआ। यह मुद्दा इस समय इसलिए ज्वलंत है, क्योंकि प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं। भाजपा से वे लोग चुनाव मैदान में होने वाले हैं, जो कर्ज माफी के वचन के सहारे ही सत्ता तक पहुंचे थे। कुछ मंत्री तो कर्ज माफी के कार्यक्रमों में शरीक भी हुए थे।  (स्थानीय संपादक, नवदुनिया)

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