प्रदीप। आज मानव जाति के सामने ऐसी महामारी मुंह बाए खड़ी है जिससे पूरी दुनिया को खतरा पैदा हो गया है। बहरहाल कोरोना वायरस हमारे लिए एक ऐसे अवसर के रूप में भी सामने आया है जिससे हम अपनी भोजन प्रणाली का विश्लेषण करें ताकि एक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य के लिए अपने खानपान के तौर-तरीकों में जरूरी बदलाव कर सकें। कोरोना एक जूनोसिस संक्रमण है यानी इसका संचरण स्वाभाविक रूप से जानवरों से इंसानों में होता है। यह सर्वविदित है कि इस वायरस के प्रसार का केंद्र चीन के वुहान स्थित सीफूड होलसेल मार्केट ही है, जहां जंगली जानवरों को बेचा जाता है।

सार्स के प्रसार का केंद्र भी यही सीफूड मार्केट ही था : इससे पहले 2002 में सार्स यानी सीवीयर एक्यूट रेसपिरेटरी सिंड्रोम के प्रसार का कारण सीवेट बिल्लियां थी, जिनके मांस के भक्षण के कारण यह वायरस मानव में संचारित हुआ। सार्स के प्रसार का केंद्र भी यही सीफूड मार्केट ही था। चीन के ये बाजार ऐसे ही जगहों के उदाहरण हैं जहां जानवरों से मनुष्यों में वायरस के संचरण की अधिक संभावना होती है। चीन के बाजारों में कई जानवरों का मांस बिकने की वजह से ये बाजार मानव में वायरस की प्रायिकता को बढ़ा देते हैं। वर्ष 2012 का मर्स फ्लू ऊंटों से इंसानों में फैला और इसका केंद्र सऊदी अरब था। वर्ष 2009 का बहुचíचत स्वाइन फ्लू मैक्सिको में शुरू हुआ और वह सुअरों के मांस भक्षण की वजह से इंसानों तक पहुंचा। इबोला वायरस के बारे में भी ऐसे ही सिद्धांत प्रचलित हैं।

वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 10 अरब होगी : इन विभिन्न प्रकोपों से हमें क्या सबक मिलता है? यही कि हमें अपने मौजूदा खाद्य प्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 10 अरब होगी। इतनी बड़ी आबादी का पेट भरना तभी संभव हो सकेगा जब हम अपनी भोजन प्रणाली और भोजन पैदा करने के तौर-तरीकों में बड़े सुधार कर पाएंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में नई उभरती संक्रामक बीमारियों में 60 फीसद बीमारियों का कारण जूनोसिस संक्रमण ही होता है।

75 फीसद संक्रमण जानवरों से इंसानों में हुआ : ऐतिहासिक रूप से ऐसी कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं जिनसे यह साबित होता है कि जूनोसिस संक्रमण की बदौलत वैश्विक महामारी की स्थिति कई बार बनी है। पिछले तीन दशकों में 30 से ज्यादा नए विषाणुओं में से 75 फीसद संक्रमण जानवरों से इंसानों में हुआ है। मियामी यूनिवर्सटिी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर मार्क रॉलैंड्स पशु अधिकारों संबंधी अपने शोध के माध्यम से दुनिया को चेताया है कि मांसाहार कोरोना महामारी से भी अधिक बुरे नतीजे ला सकता है। मांसाहार का दुष्परिणाम बताते हुए उन्होंने लिखा है कि यह न केवल हृदय संबंधी बीमारियां, कैंसर, डायबिटीज और मोटापा बढ़ा रहा है, बल्कि पर्यावरण संबंधी कई समस्याएं भी पैदा कर रहा है।

अनियंत्रित मांसाहार की प्रवृत्ति धरती का तापमान बढ़ाने में प्रमुख भूमिका : नि:संदेह भूख और कुपोषण से मानवता की लड़ाई में जंतु प्रोटीन की अहम भूमिका है। मगर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि वैज्ञानिकों की आशंकाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। अनियंत्रित मांसाहार की प्रवृत्ति जलवायु परिवर्तन यानी धरती का तापमान बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभा रही है। भूमि और जल के दोहन से भी इसका गहरा संबंध है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दाल-चावल और सब्जियां जंतु प्रोटीन का विकल्प नहीं हो सकतीं। जानवरों के मांस में पोषक तत्व अधिक मात्र में होते हैं।

शरीर के लिए जंतु प्रोटीन भी उतना ही जरूरी है, जितना कि दूसरे पोषक तत्व। निर्धनों के लिए तो प्रोटीन का सबसे सस्ता जरिया ही जानवरों का मांस है। अगर सारी दुनिया शाकाहारी हो जाएगी तो सबसे बड़ा संकट विकासशील देशों के लिए हो जाएगा। थोड़ा-थोड़ा मांस, मछली और दूध उन्हें कुपोषण से बचाए रखता है। जहां तक मांस छोड़कर दूध अपनाने की बात है तो मांस एवं दूध दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। दोनों ही पशुओं से आते हैं। पृथ्वी का तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार तीन गैसों कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन में पशुओं का बड़ा योगदान है।

संतुलन हमारे जीवन का मूलमंत्र होना चाहिए : विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक जानवरों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाओं की बड़ी मात्र ने रोगाणु प्रतिरोधी बैक्टीरिया को खत्म कर दिया है जिससे पशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे पशु किसी भी वायरस या बैक्टीरिया के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि इन पशुओं के मांस या अन्य उत्पादों का सेवन इंसानों द्वारा किया जाता है तो संभव है कि पशुओं में मौजूद वायरस या बैक्टीरिया इंसानों में संचारित हो जाए। ऐसे में समाधान है संतुलन। मांसाहार कम करना और ऐसे मांस का उत्पादन करना जो स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक हो। जुगाली करने वाले पशुओं के मांस की तुलना में मुर्गे और मछली स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक हैं। चीन में कोरोना जैसी महामारियों का कारण अंधाधुंध मांसाहार और मांस को पोषण की वस्तु न मानकर स्वाद के लिए बिना पूरी तरह पकाए हुए खाने की प्रवृत्ति भी हो सकती है। संतुलन हमारे जीवन का मूलमंत्र होना चाहिए। हमें सुरक्षित भविष्य के लिए इसे सदैव याद रखना होगा।

[विज्ञान विषय के जानकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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