डॉ. अनिल प्रकाश जोशी। हमारे गांव देशवासियों का पेट भरने के साथ ही देश की राजनीति की दिशा भी तय कर रहे हैं। गांवों के वोट शहरों की तुलना में हमेशा से ज्यादा ही रहे हैं। ऐसे में जिस दल ने उनका झुकाव अपनी तरफ कर लिया उसी के सिर पर सत्ता का ताज भी सजा। पहले धनबल, बाहुबल एवं तमाम तरह के लालच ग्रामीण मतदाताओं को काफी हद तक दिशाहीन करते रहे। वहां जात-पांत के बोलबाले के अलावा प्रचार- प्रसार की भी एक बड़ी भूमिका दिखती रही, परंतु पिछले कुछ समय से वहां एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। पहले गांव राजनीति में मूकदर्शक की भूमिका में थे।

राजनीतिक दलों ने उन्हें निष्क्रिय मतदाता से ज्यादा कुछ नहीं समझा, पर अब वे भी सक्रिय हो रहे हैं और समझदारी का परिचय देते हुए सवाल खड़े कर रहे हैं। उन्होंने अपनी उपेक्षा करने वालों को हाल के वर्षों में झटके भी दिए हैं। इसे भारतीय लोकतंत्र में आए एक अच्छे परिवर्तन की तरह देखा जाना चाहिए। भारत को गांवों का देश कहा जाता है। आज अगर करीब 67 फीसद आबादी गांवों में रहती है तो जाहिर है कि वहां के ही मत तय करेंगे कि देश का नेतृत्व कौन करेगा? यह भी उल्लेखनीय है कि शहरों में मतदान का आंकड़ा भी गांवों के मुकाबले कम रहता है।

हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में ग्रामीण मतदान प्रतिशत शहरों की अपेक्षा 5.5 फीसद ज्यादा रहा। गांवों ने चुनाव में जमकर भागीदारी की और जता दिया कि उनकी अनदेखी दलों को महंगी पड़ सकती है। पांच राज्यों के चुनावों में विकास के प्रदर्शन को गांवों ने सटीक तरह से जांचा भी। मसलन मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस केमतों में ज्यादा अंतर नहीं था। मतलब साफ था कि इन दोनों राज्यों की सरकारों ने गांवों के लिए कुछ तो किया था, पर वह अपर्याप्त था। चूंकि छत्तीसगढ़ में लोग सरकार से नाराज थे इसलिए वह वोटों के रूप में दिखी। यह नाराजगी गांवों की उपेक्षा के मसले पर अधिक थी।

ऐसे निर्णय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। अगर पिछले दो दशक के आंकड़ों को देख लें तो पाएंगे कि ग्रामीण मतदाताओं में अपने मताधिकार के प्रति जागरूकता ही नहीं बढ़ी है, बल्कि वे सही निर्णय लेने में भी सक्षम रहे हैं। इसमें दोराय नहीं कि आज देश की राजनीति के स्तर में भारी गिरावट देखी जा रही है। इसे दोबारा पटरी पर लाने का काम किसी सुधारवादी आंदोलन से संभव नहीं है, बल्कि जनजागरूकता और मुद्दों की राजनीति को बढ़ावा देकर ही इसमें सुधार लाया जा सकता है। यह तभी संभव होगा जब सभी दलों को आभास हो जाए कि उनकी जीत जात-पांत या फिर भावनात्मक मसलों पर नहीं होगी। गांवों के मतों को बटोरने के लिए स्पष्ट है कि ग्रामीण समाज को और अधिक जागरूकता का परिचय देना होगा।

यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हमारे विकास के मानक शहरों के चारों तरफ ही घूमते रहे हैं। हमने स्वतंत्र भारत को शहरी ढांचे में फिट करने तक की ही सोच तय की। इससे एक तो शहर विकास का केंद्र बने और दूसरे, इसके सुख ने गांवों को भी खाली करना शुरू किया। जहां एक समय 90 फीसद लोग गांवों में रहते थे वहीं अब घट कर 67 फीसद ही बचे हैं, क्योंकि देश के गांव आज भी आधारभूत सुविधाओं से वंचित हैं। चूंकि गांव शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे आवश्यक विषयों पर अलग-थलग पड़ गए इसलिए गांवों की नई पीढ़ी ने शहरी ठिकानों एवं सुख-सुविधाओं के लिए गांव त्याग दिए। हम विकास की दौड़ में गांवों को भी भूल गए। हम इस समझ से परे हो गए कि गांवों का बना और बचा रहना देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

आज भी देश की आर्थिकी का बड़ा हिस्सा गांवों के उत्पादों से जुड़ा है। हम किसी भी बाजारी वस्तु की उत्पादकता को गांवों से सीधे जोड़ सकते हैं-चाहे वे खाद्य पदार्थ हों या अन्य कच्चा माल, इनकी आपूर्ति गांवों से ही होती है। इनसे जुड़ा श्रम भी गांवों से ही आता है। असल में शहर गांवों के उत्पादों के प्रबंधक के रूप में खड़े हुए जिसमें श्रम कम और लाभ ज्यादा था। ज्यादा लाभ के चलते शहरों में सुविधाओं की भी होड़ लगी और इस तरह शहर बेहतर जीवनशैली का द्योतक बने और रहने के अड्डे भी। इसी शैली ने ग्रामीणों को आकर्षित किया और फिर पलायन के विकार ने पैर पसारे। इस टें्रड ने दो बड़ी चोट की।

एक, जहां गांवों में हर तरह की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ा वहीं दूसरी तरफ शहरों में बढ़ती भीड़ ने आबादी विस्फोट एवं बेरोजगारी जैसे सवाल भी खड़े कर दिए। ये दोनों ही विषय गांवों से हो रहे पलायन से संदर्भित हैं। साथ में हवा, पानी, जमीन के नए झगड़े भी इसी मुद्दे से जुड़े हैं। साफ है कि गांवों की अनदेखी आर्थिक पारिस्थितिकी एवं सामाजिक असंतुलन को जन्म दे रही है। ऐसे में गांवों पर केंद्रित विकास ही समानता पैदा कर सकता है। यह नारा कि जो गांवों की बात करेगा वही देश में राज करेगा, आज के परिपेक्ष्य में सटीक है। देश सिर्फ शहरों से ही नहीं, गांवों के विकास से भी सशक्त होगा।

 (लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)

 

Posted By: Dhyanendra Singh