नई दिल्ली [पुष्पेश पंत]। जिस किसी ने आपको कुछ भी सिखाया हो, सही दिशा दिखाई हो, वह आपका गुरु है। गुरुपूर्णिमा का पर्व उन्हें सस्नेह सादर स्मरण करने का दिन है। इसी दिन के साथ ही शुरू हो जाते हैं सेहत के लिहाज से खान-पान में संयम और परिवर्तन के चार माह। तो इस खास दिन को समर्पित करें आस्था व सेहत के नाम...

आजकल तिथि के अनुसार पर्व दर्शाने वाले पंचांग दुर्लभ होते जा रहे हैं। पहले कलाई में बंधी घड़ी और अब मोबाइल ही तारीख, वार, महीना बता देते हैं। इस कारण पारंपरिक महत्व के दिन आकर चले जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। यही वजह है कि उनका प्रतीकात्मक महत्व भी अब लोग भूलने लगे हैं। यदि एक मित्र ने यह सवाल नहीं उठाया होता कि ‘यह पूनम कचौरी क्या होती है?’ तो गुरु पूर्णिमा वाला प्रसंग बिसराया ही रह जाता।

पूनम कचौरी आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर श्रीनाथ जी के मंदिर में पकाई जाती है। जो इस दिन भोग में विधेय रूप से शामिल होती है। यूं तो कचौरी पुष्टिमार्गी मंदिरों के छप्पन भोग में वर्ष में अनेक बार शामिल की जाती है परंतु पूनम कचौरी दो या चार बार ही प्रकट होती है। आम तौर पर जो कचौरी प्रभु के लिए पकवान का रूप धारण करती है वह मूंग दाल की पीठी से भरी होती है। पूनम कचौरी की विशेषता है इसका उरद दाल की पीठी से भरा होना।

पहले समय में इस पर्व पर मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के देहात-कस्बों में घरों पर बेड़वी रोटी(दाल की भरवां रोटी) और गेहूं के आटे का शीरा (लपसी) बनती थी। इस मौसम में आमों की बहार रहती है सो इनकी जुगलबंदी साधी जाती थी। 

भगवान की मेहमाननवाजी 

गुरु पूर्णिमा के चार दिन पहले पड़ने वाली एकादशी हरिशयनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। आस्थावान हिंदुओं का मानना है कि इस दिन से भगवान विष्णु शेषशैया पर विराजमान होकर चार माह के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। चतुर्मास के इन महीनों में शादी-ब्याह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं होते थे क्योंकि उन्हें कल्याणकारी आशीर्वाद देने को अन्य देवी-देवता भी सुलभ नहीं रहते। मान्यता यह है कि वे सभी श्रीकृष्ण के आमंत्रण पर इन चार महीनों में ब्रजभूमि में विश्राम करते हैं। इन देवताओं की आवभगत में ही यहां तरह-तरह के पकवान परोसने-खाने की परंपरा का सूत्रपात हुआ है।

आस्था में छिपी सेहत 

इसे यदि सेहत की दृष्टि से देखें तो आस्था का सहारा लेकर आम आदमी को बदलते मौसम के अनुसार अपने खाने में परिवर्तन का संदेश दिया जाता था। वर्षा ऋतु में सूक्ष्म कृमिजनित रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है और यह सर्वविदित है कि गहरे तले वाले व्यंजन विषाणुओं का नाश करते हैं और अधिक टिकाऊ होते हैं। बंगाल और ओड़िसा में अरंधन नामक पर्व रसोई की साफ-सफाई सुनिश्चित करने की याद दिलाकर यही कार्य करता है। 

गुरु-शिष्य परंपरा की याद अब जो सवाल मन में कुलबुलाता है वह यह है कि पूनम कचौरी तथा अन्य पकवानों का गुरु पूर्णिमा से क्या नाता है। इसकी पड़ताल करने के लिए गुरु के साथ शिष्य के आत्मीय रिश्ते को समझना जरूरी है। हमारी संस्कृति में गुरु मात्र अध्यापक का पर्याय नहीं, वह प्रेरक, प्रशिक्षक, पथ प्रदर्शक, प्रोत्साहक सबकुछ एक साथ होता था।

गोविंद से भी गुरुतर! 

जब ब्रह्मचारी शिष्य दीक्षांतोपरांत घर लौटता था, तब कृतज्ञता ज्ञापन में यथा सामथ्र्य गुरु दक्षिणा समर्पित करता था। दक्षिणा शब्द के मूल के साथ अनेक शब्द जुड़े हैं। दक्षिण दिशा भी है-बहिर्मुखी, दाहिना हाथ भी, दक्षता का अर्थ कौशल भी है जो गुरु कृपा से ही हासिल होता है- एक तरह से गुरु का प्रसाद। प्राचीन भारत में शिष्य वर्षों गुरुकुल में रहते थे।

गुरु के परिवार के सदस्य के रूप में गृहकार्य में हाथ बंटाते। यह अनुशासन भी था और जीवन-यापन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण भी। अधिकांश गुरु वनवासी तो थे पर वानप्रस्थी नहीं। उपनिषदों से लेकर पौराणिक आख्यानों में गृहस्थ गुरु परिवारों का उल्लेख मिलता है। गुरु परिवारों तथा उनके साथ रहने वाले शिष्यों के लिए शासक अग्राहार ग्राम दान में देते थे। ये अभयारण्य सरीखे होते थे- करमुक्त, जहां सैनिकों व शिकारियों का प्रवेश निषिद्ध था।

जाहिर है गुरुकुलों में बदलते ऋतुचक्र के अनुसार खान-पान बदलता था, जिसके चलते किशोर-तरुण शिष्य वयस्क होने पर भी गुरुकुल का स्वाद भूलते नहीं थे। संभवत: इसी कारण पूनम कचौरी तलने की परंपरा अब तक अक्षत रह सकी! 

ज्ञान दान का दिन 

गुरु पूर्णिमा का पर्व सभी गुरुओं को सस्नेह सादर स्मरण करने का दिन है। जिस किसी ने आपको कुछ भी सिखाया हो, सही दिशा दिखलाई हो वह आपका गुरु है। महेश्वर शिव आदिगुरु माने जाते हैं। प्रसिद्ध है कि गुरुपूर्णिमा के दिन ही उन्होंने सप्तऋषियों को योग का ज्ञानदान दिया था। शिव के अनेक रौद्र और बीहड़ भैरव रूप हैं परंतु शिक्षक गुरु के रूप में उनकी दक्षिणामूर्ति मुद्रा सदैव कल्याणकारी दर्शाई जाती है।

नटराज, वीणापाणि, वैद्यनाथ, पशुपति, केदारनाथ जैसे विशेषण हमें याद दिलाते हैं कि संगीत, नृत्य, व्याकरण और भी न जाने कितने अनुशासनों और ज्ञान-विज्ञान की धाराओं का स्रोत शिव हैं। शस्त्रास्त्र संचालन हो या उपद्रवी गंगा को सिर पर धारण कर पर्यावरण का संरक्षण, हलाहल गरल का पान कर घातक संकट से जीव-जंतुओं को जीवनदान, कृपालु आदिगुरु शिव के आख्यान के साथ ढेरों प्रसंग जुड़े हैं।

इन्हें अक्षरश: सच मानने के बजाय इनका प्रतीकात्मक महत्व कहीं अधिक है। महाभारत को लिपिबद्ध करने वाले कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास को भी इस दिन साभार स्मरण करते हैं। बौद्ध धर्म अनुयाइयों के लिए भी यह दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि गौतम बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में पहला प्रवचन दिया था। 

त्यागें पूर्वाग्रह के बंधन 

भारत में दार्शनिक राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् का जन्मदिन (5 सितंबर) अध्यापक दिवस घोषित किया गया है परंतु इसे सरकारी रस्म अदायगी की तरह मनाया जाता है। इसमें गुरु पूर्णिमा जैसी आत्मीय ऊष्मा कहां? अंत में यह भी न भूलें कि सभी गुरु स्नेही उदार या पक्षपात से मुक्त नहीं होते। आदिवासी शिष्य एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा लेने वाले द्रोण के प्रति श्रद्धा सहज नहीं। कर्ण के प्रति भेदभाव भी उनके अपार ज्ञान को कलंकित ही करता है। ऐसा ही कुछ गुस्सैल परशुराम के कथानक से भी इंगित होता है।

ब्राह्मण मोह से ग्रस्त होने के कारण उन्होंने कर्ण को श्राप दे दिया था। गुरु पूर्णिमा हमें यह अवसर देती है कि हम तटस्थ भाव से पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर शिक्षा, ज्ञान के अनुशासन व संस्कार के साथ घनिष्ठ संबंध को समतामूलक समाज और जनतांत्रिक प्रणाली के संदर्भ में दोबारा परिभाषित करने की चुनौती को स्वीकार करें-हां पूनम कचौरी का आनंद लेते हुए! (लेखक प्रख्यात खान-पान विशेषज्ञ हैं) 

 

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