[ विवेक काटजू ]: मोदी सरकार ने बीते साल पांच अगस्त को जबसे जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक परिवर्तन किए हैं तबसे कुछ लोग उसके खिलाफ लगातार विषवमन में जुटे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन भी उनमें से एक हैं। बीते शुक्रवार को एक बार फिर इसकी बानगी दिखी जब पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कश्मीर का राग अलापा। कश्मीरी अलगाववाद की तुलना प्रथम विश्व युद्ध में विदेशी प्रभुत्व के खिलाफ तुर्की की लड़ाई से करते हुए एर्दोगन ने पाकिस्तान को आश्वस्त किया कि कश्मीर तुर्की के लिए भी उतना ही संवेदनशील मसला है जितना पाकिस्तान के लिए।

कश्मीर मामले पर तुर्की ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया

पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए उन्होंने दोहराया कि भारत का कदम एकतरफा है जिसकी मार कश्मीरियों पर पड़ रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की उनकी कोशिशों को खारिज कर एकदम सही किया। साथ में यह उचित हिदायत भी दी कि तुर्की वास्तविक तथ्यों को लेकर अपनी समझ बढ़ाए और इस पर भी विचार करे कि पाकिस्तान कैसे भारत और इस समूचे क्षेत्र में आतंक को पाल-पोस रहा है।

एर्दोगन ने पाक में कहा था- तुर्की कश्मीरियों के दुख-दर्द से भलीभांति परिचित है

दरअसल 1950 के दशक से ही इन दोनों देशों में गहरा दोस्ताना रहा है। इनके चलते तुर्की कश्मीर सहित तमाम मामलों पर पाक का हमदर्द बना रहा। 2016 में भी पाक दौरे पर एर्दोगन ने कहा था कि तुर्की कश्मीरियों के दुख-दर्द से भलीभांति परिचित है।

एर्दोगन के तल्ख बयान के पीछे इस्लामिक जगत का सिरमौर बनने की महत्वाकांक्षा है

बहरहाल ताजा संदर्भ में एर्दोगन ने जो तल्ख बयान दिया उसके पीछे इस्लामिक जगत का सिरमौर बनने की महत्वाकांक्षा ही है। वह तुर्की को उसी दौर में वापस ले जाना चाहते हैं जब ऑटोमन साम्राज्य के स्वर्णिम दौर में तुर्की के सुल्तान को खलीफा की पदवी हासिल थी। अब इस्लामिक उम्मा का नेतृत्व व्यापक रूप से सऊदी अरब के हाथ में है और कई अन्य अरब देश भी तुर्की से आगे निकल गए हैं। अरब देश और इस्लामिक उम्मा के तमाम मुल्कों ने पांच अगस्त के बाद पाकिस्तानी दुष्प्रचार को व्यापक रूप से नजरअंदाज ही किया, लेकिन तुर्की ने अलग राह पकड़ी। इससे भारत-तुर्की संबंधों में स्वाभाविक रूप से खटास आ गई। गत वर्ष सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के मंच से एर्दोगन के भारत विरोधी भाषण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रस्तावित तुर्की दौरे को रद कर दिया।

मलेशियाई पीएम का कश्मीर पर निहायत ही बेतुका बयान था

एर्दोगन के अलावा मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने भी कश्मीर पर सरकार के कदमों की तल्ख शब्दों में आलोचना की थी। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत ने कश्मीर में कब्जा कर लिया है। यह निहायत ही बेतुका बयान था। आखिर कोई देश अपनी ही जमीन पर कैसे कब्जा कर सकता है? इस पर मोदी सरकार ने अपनी नाखुशी जाहिर की।

भारतीय व्यापारियों ने मलेशियाई पाम ऑयल के आयात से किया किनारा

इसके जवाब में भारतीय व्यापारियों ने मलेशियाई पाम ऑयल के आयात से किनारा किया। इससे मलेशिया के आर्थिक हितों पर करारी चोट हुई। नतीजतन सहयोगियों के सुझाव पर महातिर को अपने तेवर नरम करने पड़े।

ईयू प्रतिनिधियों को जम्मू-कश्मीर भेजकर पाक दुष्प्रचार की हवा निकालने की कोशिश

तुर्की और मलेशिया के खिलाफ भारत ने एकदम सटीक तरीके से कूटनीतिक कार्रवाई की, लेकिन क्या यही बात सरकार की उस कवायद को लेकर कही जा सकती है जिसके तहत उसने राजनयिकों के दो समूहों को जम्मू-कश्मीर का दौरा कराया? इस सिलसिले में 15 सदस्यीय पहला समूह पिछले महीने वहां गया था। इसमें भारत में अमेरिका के राजदूत भी शामिल थे। इस कड़ी में दूसरा दौरा गत सप्ताह यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों का हुआ। इन समूहों को वहां भेजने की मंशा स्पष्ट रूप से यही थी कि उनके माध्यम से कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी दुष्प्रचार की हवा निकाली जाए।

पाकिस्तान ने कहा- कश्मीर घाटी में कई शहरों में कर्फ्यू सरीखे हालात

पाकिस्तान अभी भी इस बदजुबानी में जुटा है कि कश्मीर घाटी में मानवाधिकारों का उल्लंघन जारी है और तमाम शहरों में कर्फ्यू सरीखे हालात हैं। इन समूहों के जरिये छनकर आने वाली खबरों के मुताबिक राजनयिकों ने अपने दौरे में विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी वर्गों के प्रतिनिधियों से भी चर्चा की।

प्रतिनिधिमंडल ने जटिल हालात समझे होंगे और अपनी सरकारों को बताया भी होगा

प्रयास यह किया गया कि राजनयिकों की मुलाकात न केवल उन लोगों के साथ कराई जाए जो सरकारी कदमों का समर्थन करते हैं, बल्कि उनसे भी मिलाया जाए जो संचार सहित कुछ प्रतिबंधों के आलोचक हैं। इससे राजनयिकों को एक बड़ी हद तक वस्तुनिष्ठ समझ बनाने में मदद मिली होगी जिसे उन्होंने अपनी सरकारों के साथ अवश्य साझा किया होगा। फरवरी में गए समूह ने जम्मू का भी दौरा किया था। जम्मू के लोगों से विमर्श के बाद प्रतिनिधिमंडल को राज्य के जटिल हालात समझ आए होंगे।

राजनयिकों को राजनीतिक निहितार्थ वाले दौरे नहीं कराए जाते

कोई देश अमूमन राजनयिकों को अपनी अपनी आर्थिक संभावनाएं दिखाने के लिए ही विभिन्न स्थानों का दौरा कराता है। इसके पीछे आर्थिक सहयोग और पर्यटन को बढ़ावा देने जैसे मकसद होते हैं। राजनयिकों को राजनीतिक निहितार्थ वाले दौरे नहीं कराए जाते। इसकी सीधी वजह यही है कि यदि ऐसे दौरे कराए जाएं तो दूसरे देशों को आंतरिक मामलों पर टीका-टिप्पणी का मौका मिल जाता है। राजनयिकों के इन दोनों दौरों में यही हुआ।

अमेरिका ने कश्मीरी नेताओं की नजरबंदी, इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई

अपने राजदूत के दौरे के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने कश्मीरी नेताओं की नजरबंदी के अलावा राज्य में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई। इसी तरह दूसरे समूह के दौरे के बाद कुछ राजनयिकों ने आशा व्यक्त की कि संचार संबंधी प्रतिबंध भी जल्द हटा लिए जाएंगे। ऐसे बयानों पर भारत का नाखुश होना स्वाभाविक ही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामलों में ऐसा कूटनीतिक विनिमय आम है, फिर भी सरकार यह नहीं कर सकती कि राजनयिकों को दौरा भी कराए और उनसे यह अपेक्षा भी रखे कि वे कोई टिप्पणी न करें।

जम्मू-कश्मीर में राजनयिकों के दौरों की आखिर क्या उपयोगिता है

अपनी नियुक्ति वाले देश के विभिन्न इलाकों के हालात की सूचनाओं के लिए राजनयिकों के अपने सूत्र भी होते हैं। वे ऐसे दौरों के बजाय अपने इन सूत्रों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। खासतौर से जम्मू-कश्मीर जैसे मामलों में यह और ज्यादा होता है जहां ऐसे दौरों में सुरक्षा घेरे के चलते वे अपनी पसंद की जगह पर स्वतंत्र विचरण करने में सक्षम नहीं होते। कुल मिलाकर इस अनुभव से सीख लेते हुए सरकार को आकलन करना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में राजनयिकों के ऐसे दौरों की आखिर क्या उपयोगिता है? संतुलन की कवायद में नकारात्मकता सकारात्मकता पर हावी हो सकती है। ऐसे में बेहतर यही होगा कि राजनीतिक दौरों से बचने की जांची-परखी परंपरा का ही पालन किया जाए।

( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं )

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