[रमेश कुमार दुबे]। जिस देश में सरकारी योजनाएं देरी के लिए कळ्ख्यात हों वहां समय से पहले किसी योजना का लक्ष्य पूरा होना नई और अनोखी बात है। इस मामले में सबसे उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना। इस योजना के तहत मार्च 2020 तक आठ करोड़ गैस सिलेंडर देने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन उसे बीते महीने यानी निर्धारित समय से सात माह पहले हासिल कर लिया गया। इस योजना के साथ ही सरकार हर गांव तक बिजली पहुंचाने और हर घर को शौचालय सुलभ कराने में भी कामयाब रही है।

राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी

चूंकि मोदी सरकार की इन योजनाओं का लक्ष्य चुनावी राजनीति न होकर आम आदमी का सशक्तीकरण है इसलिए चुनाव बीतने के बाद भी उनके क्रियान्वयन पर पहले जैसा ही जोर दिया जा रहा है। अभी तक सरकारें आम तौर पर चुनावों को ध्यान में रखकर ही योजनाएं बनाती रही हैं। इसीलिए चुनाव बीतते ही उनकी रफ्तार सुस्त पड़ जाती थी। इसके अलावा राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी, नौकरशाही की शिथिलता और भ्रष्टाचार की व्यापकता के कारण सरकारी योजनाओं के अपेक्षित लाभ हासिल नहीं होते थे। वास्तव में इसी कारण जन कल्याणकारी योजनाएं गरीबी उन्मूलन का कारगर हथियार नहीं बन पाईं। इसके विपरीत मोदी सरकार ने समाज के वंचित तबकों को हर तरह से सशक्त बनाने का काम किया। 

ग्रामीण इलाकों और वंचित तबकों में भाजपा की पैठ बढ़ी

गरीबों को बिजली, सड़क, पक्के मकान, शौचालय, रसोई गैस जैसी मूलभूत सुविधाएं बिना किसी भेदभाव के मिलीं, जिनके लिए सरकारें आम आदमी को दशकों से ख्वाब दिखा रही थीं। जैसे-जैसे मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ ग्रामीण इलाकों और वंचित तबकों तक पहुंचा वैसे-वैसे इन क्षेत्रों और समुदायों में भाजपा की पैठ बढ़ी। इन योजनाओं में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का उल्लेख इसीलिए बार-बार होता है, क्योंकि इससे करोड़ों महिलाओं को चूल्हे के धुएं से आजादी तो मिली ही, उनके समय की बचत भी हुई। चूल्हे में भोजन पकाने में महिलाओं को कहीं अधिक श्रम के साथ समय भी खपाना पड़ता था। अब उन्हें कहीं कम समय देना पड़ता है। शेष समय का उपयोग वे ऐसे कार्यों में करती हैं जिनसे उनका जीवन सुधरे।

प्रदूषण से हर साल पांच लाख महिलाओं की मौत

देश में परंपरागत चूल्हों के धुएं से होने वाले प्रदूषण से हर साल पांच लाख महिलाओं की मौत हो जाती थी। विशेषज्ञों के मुताबिक रसोई में खुली आग के धुएं में एक घंटे बैठने का मतलब चार सौ सिगरेट के बराबर धुआं सूंघना है। 2014 में वल्र्ड वाच इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि दुनिया में सबसे अधिक जैव ईंधन पर निर्भर आबादी विकासशील एशिया में है। अकेले भारत में 70 करोड़ लोग परंपरागत ईंधन (लकड़ी, गोबर आदि) से खाना बनाते हैं।

रसोईघर के खतरे को काबू करने के लिए कम प्रयास हुए

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में ऐसे प्रदूषण से हर साल 20 लाख लोगों की अकाल मौत होती है जिसमें करीब 44 फीसद बच्चे हैं। वहीं बड़े लोगों में 60 फीसद महिलाएं इस तरह के प्रदूषण के कारण मौत के मुंह में चली जाती हैं। यह संख्या हर साल मलेरिया से होने वाली कुल मौतों से ज्यादा है, लेकिन विडंबना यह है कि जहां मलेरिया की रोकथाम के लिए बचाव से लेकर इलाज तक हर स्तर पर कोशिशें जारी हैं वहीं रसोईघर के खतरे को काबू करने के लिए बहुत कम प्रयास हुए।

मई 2016 में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ की शुरुआत

आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। देश में एलपीजी वितरण की शुरुआत 1955 में हुई थी और 2014 तक अर्थात साठ वर्षों के दौरान सिर्फ 13 करोड़ लोगों को एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराया जा सका। वहीं एलपीजी का दायरा शहरी एवं कस्बाई इलाकों तथा गांवों के समृद्ध वर्ग तक सिमटा रहा। स्पष्ट है सरकारी उदासीनता के चलते चूल्हे के धुएं से हर साल लाखों लोग बीमार पड़कर गरीब बनते रहे। गरीबों को चूल्हे के धुएं और बीमारियों से मुक्ति दिलाने की पहली ठोस पहल मई 2016 में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के तहत हुई।

2020 तक आठ करोड़ एलपीजी कनेक्शन का लक्ष्य

इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले पांच करोड़ परिवारों को मार्च 2019 तक एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया। बाद में लक्ष्य को बड़ा करते हुए मार्च 2020 तक आठ करोड़ एलपीजी कनेक्शन कर दिया गया। शुरू में इस योजना का लाभ उन्हीं परिवारों को मिल रहा था जो 2011 की गणना के अनुसार गरीबी की रेखा के नीचे थे। आगे चलकर इस योजना का दायरा बढ़ाते हुए इसमें सभी अनुसूचित जाति-जनजाति परिवार, वनवासी, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, द्वीपों, चाय बागानों में रहने वालों तथा प्रधानमंत्री आवास योजना एवं अंत्योदय योजना के लाभार्थियों को भी शामिल कर लिया गया।

कनेक्शन का लक्ष्य वक्त से पहले हासिल किया  

राजनीतिक इच्छाशक्ति और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के कारण उज्ज्वला योजना में लक्ष्य की तुलना में अधिक कनेक्शन बांटे गए। इसका नतीजा यह रहा कि आठ करोड़ कनेक्शन का लक्ष्य वक्त से पहले हासिल हो गया। यदि कुल गैस कनेक्शनों को देखें तो यह आंकड़ा 10 करोड़ की संख्या को पार कर जाएगा। अब तक देश की 95 प्रतिशत आबादी तक रसोई गैस पहुंच चुकी है और हर रोज 69000 नए कनेक्शन दिए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अधिकतर नए गैस कनेक्शन पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पूर्वोत्तर जैसे पिछड़े राज्यों में जारी हुए जहां स्वच्छ ईंधन की पहुंच बहुत कम रही। उज्ज्वला योजना के कुल लाभार्थियों में 48 प्रतिशत अनुसूचित जाति-जनजाति से संबंध रखते हैं। स्पष्ट है कि उज्ज्वला योजना करोड़ों गरीबों के सशक्तीकरण का कारगर हथियार साबित हुई है।

क्या रसोई गैस सब्सिडी खत्म करने का समय आ गया है?

रसोई गैस की देशव्यापी पहुंच के बाद एक बड़ी चुनौती यह आ रही है कि जहां सामान्य उपभोक्ता प्रति वर्ष औसतन सात सिलेंडर गैस भरवाते हैं वहीं उज्ज्वला योजना के लाभार्थी औसतन तीन सिलेंडर ही भरवाते हैं। बड़े सिलेंडर की कीमत अधिक होने के कारण बीपीएल परिवारों द्वारा कम संख्या में सिलेंडरों का उपयोग किया जा रहा है। इसे देखते हुए मोदी सरकार पांच किलो के छोटे सिलेंडर आवंटित कर रही है। यह जरूरी है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि इन छोटे सिलेंडरों का उपयोग बढ़े, क्योंकि ऐसा करके ही कुपोषण की समस्या का सामना किया जा सकता है। चूंकि अब सब्सिडी और गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में अधिक अंतर नहीं रह गया है इसलिए इस पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या रसोई गैस सब्सिडी खत्म करने का समय आ गया है?

(लेखक केंद्रीय सचिवालय सेवा में अधिकारी हैं)

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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