[ऋतुराज सिन्हा]। कृषि कानूनों पर राजनीति से प्रेरित आंदोलन इन दिनों सुर्खियों में है। इस बीच केंद्र सरकार ने समग्र दृष्टिकोण के साथ एक क्रांतिकारी सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है। सरकार ने सभी पक्षों के साथ व्यापक विमर्श कर श्रम सुधारों की पहल की है। पहली बार किसी सरकार ने संगठित के साथ असंगठित क्षेत्रों के कामगारों और उनके परिवारों की सुध ली है। इसके साथ ही नौकरी देने और पाने वालों के संबंधों को एक परिवार भाव में पिरोने की कोशिश की है। इसे दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के सिद्धांत के तहत आगे बढ़ाया है। श्रम सुधार कानून का लक्ष्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों को निश्चित वेतन, बीमा, स्वास्थ्य सेवा और पेंशन की सुरक्षा के दायरे में लाना है।

इन सुधारों से अब हर क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर और डिलीवरी ब्वॉय से लेकर मैनेजर और इंजीनियर तक सबको सम्मान के साथ आर्थिक न्याय मिल पाएगा। देश में 29 करोड़ परिवार और सभी क्षेत्रों में काम करने वालों को मिलाकर 55 करोड़ श्रम बल है। इसमें 60 फीसद काम करने वाली आबादी यानी करीब 30 करोड़ लोग गैर कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं। श्रम सुधार सीधे  इन 30 करोड़ लोगों पर सकारात्मक असर डालेगा। देश के करीब 13-15 करोड़ परिवार इससे लाभान्वित होंगे। इस लिहाज से देश का हर दूसरा परिवार इन सुधारों से प्रभावित होगा। चार श्रम कानूनों के माध्यम से अब राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जाएगा। सभी कामगारों को हर महीने की सात तरीख से पहले बैंक ट्रांसफर से वेतन उपलब्ध कराने की मुहिम चलेगी। पुरुष एवं महिला मजदूरों को समान वेतन देना अनिवार्य होगा। कुल मिलाकर 13-15 करोड़ निम्न मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों का जीवन स्तर और मौजूदा आमदनी बढ़ेगी।

नौ श्रम कानूनों को सामाजिक सुरक्षा और कल्याण कोड से जोड़ा गया

सभी कामगारों को सुरक्षा दिलाने के मकसद से केंद्र सरकार ने नौ श्रम कानूनों को सामाजिक सुरक्षा और कल्याण कोड से जोड़ दिया है, ताकि श्रमिकों को बीमा, स्वास्थ्य चिकित्सा, बोनस, पेंशन, मातृत्व लाभ आदि के अधिकार सुरक्षित हो सकें। श्रम सुधार कानूनों में फैक्ट्रियां, रिटेल शो रूम, रेस्तरां, ई-कॉमर्स डिलीवरी, खनन, कंस्ट्रक्शन, प्लांटेशन, मोटर ट्रांसपोर्ट से लेकर संविदा श्रमिक और अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूर सभी के हितों को सुनिश्चित किया गया है। सरल भाषा में कहा जाए तो बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनी के मैनेजर से लेकर डिलीवरी ब्वॉय तक सभी कामगार सामाजिक सुरक्षा के दायरे में समान रूप से आएंगे। साधारण नौकरी करने वाला व्यक्ति भी इस मूलभूत सुविधा से वंचित नहीं होगा।

श्रम सुविधा के पोर्टल के जरिये उद्योंगो को भी ऑनलाइन से जोड़ा गया 

पहले श्रम कानूनों में कई प्रविधान अंग्रेजी राज के थे। इससे सभी क्षेत्रों में काम करने वाले कामगार और काम देने वाले नियोक्ता, दोनों के हितों की रक्षा के बजाय उन्हें परेशानियों का ही सामना करना पड़ता था। कानूनों का जाल ऐसा था कि एक ही काम के लिए कामगार को कई फॉर्म भरने पड़ते थे तो कंपनियों को तमाम धाराओं और अन्य बिंदुओं में बंटे 44 कानूनों की वजह से श्रम विभाग के दफ्तरों में चक्कर काटने पड़ते थे। ऐसे में बेकार कानूनों को मौजूदा सरकार ने रद किया और अब सभी श्रम कानूनों को चार कोड में समाहित किया जा रहा है। श्रम सुविधा के पोर्टल के जरिये उद्योगों को भी ऑनलाइन और फेसलेस रिटर्न की व्यवस्था की गई है। उद्योग जगत को मिली सहूलियत से लाखों घंटे मानव श्रम की बचत होगी। इतना ही नहीं, इससे श्रम विवादों की संख्या कम होगी। कारोबारी सुगमता से भारत की रैंकिग सुधरेगी और विदेशी निवेश के माध्यम से अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया में भारत 148वें पायदान पर 

भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया में भारत 148वें पायदान पर है। ऐसे में जरूरत है कि बेरोजगारी के साथ कम वेतन की समस्या को दूर करने पर काम भी हो। श्रम सुधार इसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हैं, जो न सिर्फ रोजगार के अवसर सृजित करेंगे, बल्कि पूरी सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ सुनिश्चित वेतन- भत्ते से हर नौकरीपेशा का जीवन स्तर भी बेहतर होगा। इस नए फ्रेमवर्क में लैंगिक भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करते हुए महिला-पुरुष के लिए समान वेतन निर्धारित किया गया है। मैन्यूफैक्र्चंरग ही नहीं, सेवा क्षेत्र से लेकर निर्माण आदि सभी क्षेत्रों में भी यह लागू होगा। साथ ही नौकरियों की गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित करेगा।

अर्थव्यवस्था को तेजी से विकसित करने के लिए घरेलू मांग और खपत को दिया जाए बढ़ावा

घरेलू उपभोग हमारी कुल अर्थव्यवस्था (जीडीपी) का करीब 60 फीसद है। यानी निवेश, सरकारी खर्च और कुल आयात-निर्यात को छोड़ दें तो यह जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को तेजी से विकसित करने के लिए आवश्यक है कि घरेलू मांग और खपत को बढ़ावा दिया जाए। इस दिशा में श्रम सुधार सबसे अहम है, क्योंकि इससे घरेलू आय में बढ़ोतरी होगी और उपभोग की क्षमता बढ़ेगी। अभी देश के 29 करोड़ परिवारों में से 13-15 करोड़ परिवारों की आमदनी 1.5 लाख से 3.5 लाख रुपये के बीच है।

आने वाले वर्षों में इसमें 20-30 फीसद की वृद्धि होगी। ऐसे में इस वर्ग की आय में बढ़ोतरी मांग को बढ़ावा देगी। यानी श्रम सुधार इन निम्न मध्यम आय वाले परिवारों के लिए घरेलू आय में वृद्धि करके मांग को बढ़ावा देगा और मांग बढ़ने से जीडीपी में वृद्धि होगी। जब सरकार किसी कंपनी को कर छूट देती है तो वह तत्काल निवेश या खर्च में तब्दील नहीं होता, लेकिन किसी कामगार को 500 रुपये भी अतिरिक्त मिलता है तो वह कुछ जरूरत की नई चीजें खरीदना चाहता है, जो तत्काल मांग पैदा करता है। निश्चित तौर से नए भारत के नए श्रम कानून देश के श्रम जगत को सही मायने में सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने और केंद्र सरकार के न्यू इंडिया के संकल्प को साकार करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम बनने वाला है।

(लेखक उद्यमी एवं पब्लिक पॉलिसी अध्येता हैं)

[लेखक के निजी विचार हैं]

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