पश्चिम क्षेत्र के देपसांग पठार में विवादित चीन-भारत सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ से कुछ गंभीर सवाल उठते हैं। दोनों देशों के बीच विवादित क्षेत्र के बारे में भारतीय व चीनी नीतियां क्या कहती हैं, यह जानना जरूरी है। भारत और चीन के बीच नियंत्रण रेखा की वास्तविक स्थिति बड़ी उलझी हुई है। इस क्षेत्र में चीनी और भारतीय सेना साझा नियंत्रण रेखा पर सहमत नहीं हैं और न ही उन्होंने नक्शों का आदान-प्रदान किया है। इस अस्पष्ट स्थिति में 'घुसपैठ' तो होगी ही। इस प्रकार की घुसपैठ आम तौर पर होती रहती है और यह केवल चीन की ओर से ही नहीं, भारत की ओर से भी होती है। कुछ साल पहले तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने इस प्रकार की घुसपैठ की स्वीकारोक्ति भी की थी। चीनी अधिकारियों के इस बयान को इसी आलोक में देखा जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की है। जहां तक चीनी पक्ष का संबंध है वे यही मानते हैं कि वे चीनी भूभाग पर हैं।

इस तरह की घुसपैठ आखिर होती क्यों हैं? अगर भारत के रक्षा मंत्रालय के बयान पर यकीन किया जाए कि 2010 से चीनी सेना 500 से अधिक बार भारत में घुसपैठ कर चुकी है। तो इसका मतलब है कि सर्दियों के मौसम को छोड़कर घुसपैठ पूरे साल भर चलती रहती है। जबरदस्त ठंड में यह विवादित क्षेत्र पूरी तरह निर्जन हो जाता है। ऐसे में हालिया घुसपैठ का संबंध चीन के प्रधानमंत्री के अगले माह के भारत दौरे या फिर कुछ माह पहले चीन में हुए सत्ता हस्तांतरण से जोड़ना सही नहीं लगता। संभावना यह नजर आती है कि अगले माह उच्च स्तरीय दौरे को देखते हुए चीन भी इस मसले को सौहा‌र्द्रपूर्ण ढंग से निपटाने का उतना ही इच्छुक होगा जितना कि भारत। किंतु अगर घुसपैठ बार-बार हो रही हो तो इस तथ्य पर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि भारतीय सीमा में 19 किलोमीटर अंदर चीन के महज 20-50 सैनिक कैंप डालकर बैठ गए हों। सोचने की बात है कि क्या कोई भी देश भारत के 19 किलोमीटर अंदर केवल 20-50 सैनिकों के बल पर कार्रवाई करने की हिम्मत कर पाएगा?

परंपरागत रूप से चीन उन्हीं इलाकों में घुसता है जहां भारत के दावे बेहद कमजोर हैं। उदाहरण के लिए अरुणाचल प्रदेश में मैकमहोन रेखा के उत्तारी इलाके। इसके अलावा चीन उन इलाकों में भी घुसता है जहां भारत का सैन्य तंत्र कमजोर है। चीन की ताजा घुसपैठ भी इन्हीं कारणों से होती नजर आती है। इस क्षेत्र में 2008 में भारत ने एयर फोर्स के लिए एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का निर्माण किया था। हवाई पट्टी बनाने के प्रयासों की प्रतिक्रिया में यह कार्रवाई की गई प्रतीत होती है। यह भी हो सकता है कि यह कार्रवाई चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा उच्च अधिकारियों को बताए बिना स्थानीय स्तर की इकाई ने अपने आप कर डाली हो। हालांकि इस इलाके की प्रकृति और भयावह मौसम को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि इस क्षेत्र में चीनी लंबे समय तक डटे रह सकते हैं। यहां तक कि चीन के लिए भी, जिसके पास भारत की तुलना में कहीं बेहतर ढांचागत सुविधाएं मौजूद हैं, यह ऑपरेशन बेहद मुश्किल और खर्चीला साबित होगा। इसलिए दोनों पक्षों के हित में यही है कि हालात काबू से बाहर न हो जाएं। इस प्रकार के रणनीतिक कदमों की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन बातचीत और समझौते का विकल्प बंद नहीं होना चाहिए। चीन और भारत महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी हैं और अपेक्षाकृत छोटी सी घटना पर टकराव मोल लेकर अपनी प्रतिष्ठा और व्यापक हितों को दांव पर नहीं लगाना चाहेंगे।

यह घटना भारत की क्षमताओं के बारे में सवाल खड़े करती है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि हालिया वषरें में सड़क निर्माण की सरकार की मंशा के बावजूद चीन के साथ लगती नियंत्रण रेखा के आसपास भारत का सड़क, रेल और संचार ढांचा चीन की अपेक्षा बेहद खराब अवस्था में है। यह सबक कोई नया नहीं है। पहले भी इस बारे में चिंताएं प्रकट की जाती रही हैं कि चीन सीमा पर भारत का ढांचागत विकास बेहद पिछड़ी स्थिति में है। इसके अलावा चीन की तरफ का इलाका इतना दुर्गम नहीं है जितना कि भारत की तरफ वाला।

आज भारत के लिए ढांचागत सुविधाओं का विकास उतना मुश्किल नहीं रह गया है जितना 1962 में था, किंतु इस तरह की सामरिक महत्व की परियोजनाओं पर 1962 की तरह अब भी विभिन्न मंत्रालयों में समन्वय का अभाव और राज्य व केंद्र सरकारों में तालमेल की कमी नजर आती है। साथ ही अलग-अलग पक्षों का सीमा क्षेत्र के विकास को लेकर अलग-अलग नजरिया भी इसमें बड़ी बाधा बना हुआ है।

वार्ता में सफलता के लिए भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं में वृद्धि करनी होगी। चीन सीमा पर भारत का सैन्य तंत्र इतना मजबूत नहीं है कि सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हुआ जा सके। खासतौर पर चीन की ढांचागत सुविधाओं को देखते हुए वहां सैन्य कार्रवाई भी आसान विकल्प नहीं है। इसके अलावा लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक के लोगों में चीन ढांचागत सुविधाओं के बल पर अपनी पकड़ बनाने में लगा हुआ है। इस प्रकार भारतीय भूभाग में ढांचागत सुविधाओं में कमी के सैन्य निहितार्थ ही नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक आग्रह भी हैं।

चीन की इन कार्रवाइयों की क्या व्याख्या की जाए? यह लगता है कि चीन पूरब में जापान, अनेक आसियान देशों और पश्चिम में भारत के समक्ष एक साथ मोर्चे खोल रहा है। शायद चीन यह मानता है कि इनमें से कोई भी देश जबानी या कूटनीतिक विरोध के अलावा कुछ नहीं कर सकता है। कोई भी देश चीन के साथ सैन्य टकराव नहीं करेगा और अगर ऐसा होता भी है तो ये तमाम देश अलग-अलग जंग में उतरेंगे, न कि संयुक्त मोर्चा बनाकर। चीन को यह डर नहीं है कि सभी देश एक साथ उससे उलझ सकते हैं। इसीलिए चीन या तो यथास्थिति कायम रखने को प्रयासरत है और या फिर जमीनी धरातल पर स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने को। सेनकाकुस से लद्दाख तक चीन का यही दृष्टिकोण नजर आता है। यह कहा जा सकता है कि चीन की हरकतों से उसके तमाम पड़ोसी देश चिंतित हैं। चीन की हरकतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे एक जिम्मेदार राष्ट्र स्वीकार करने में मुश्किल पेश कर रही हैं।

[लेखक जबिन टी. जैकब, इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं]

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