[ केसी त्यागी ]: हालिया आम चुनाव में बंगाल में वाम मोर्चे को एक सीट भी नहीं मिली। एक प्रत्याशी को छोड़ सभी की जमानत जब्त हो गई। 27 वर्ष तक ज्योति बसु जैसे लोकप्रिय नेता के शासन के बाद वाम मोर्चे की ऐसी दुर्गति पर विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।

मार्क्सवादियों की धर्मनिरपेक्षता और धर्म से दूरी

मार्क्सवादियों की धर्मनिरपेक्षता और धर्म से दूरी, दोनों ही विवाद के विषय बन गए हैं। एक जमाना था जब वामपंथी बंगाल के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल होने में भी शर्म महसूस करते थे। कमोबेश यही स्थिति केरल में हुई जहां हाल के लोकसभा चुनावों में वाम मोर्चा एक को छोड़कर सभी सीटों पर पराजित रहा। इसका कारण सबरीमाला का विवाद बना। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के तहत इस मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिली, लेकिन सदियों पुरानी परंपरा उक्त मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को वर्जित करती है।

भारतीय समाज में धर्म की महत्ता

मार्क्सवादी भारतीय समाज में धर्म की महत्ता समझने में गलती कर गए। वहीं भाजपा ने इसके विरुद्ध जन अभियान चलाया। इससे उसे लोकसभा की सीट तो नहीं मिली, लेकिन मत प्रतिशत में बढ़ोतरी जरूर आंकी गई। इस मसले पर प्रारंभ में काग्रेस पार्टी दुविधा में रही। चूंकि राज्य में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा व्यापक नहीं था, इसलिए कांग्रेस वाले नेतृत्व को ही अप्रत्याशित जीत मिली।

केरल में माकपा द्वारा ‘रामायण महीने’ का आयोजन

हालांकि सबरीमाला घटनाक्रम से चिंतित होकर केरल के मार्क्सवादी संगठनों द्वारा कुछ प्रयास किए जा चुके हैं। केरल में सत्ताधारी माकपा के सांस्कृतिक संगठनों द्वारा ‘रामायण महीने’ का आयोजन किया जाना ऐसा ही प्रयास था। पिछले वर्ष जुलाई से अगस्त तक वहां मलयालम महीना कारकीडकम मनाने की परंपरा के साथ ही ‘रामायण महीने’का आयोजन पार्टी का एजेंडा बना। वहां ऐसी मान्यता है कि इससे गरीबी एवं भीषण बारिश से होने वाली बीमारियों से मुक्ति मिलती है। इस दौरान राज्य के सभी 14 जिलों में संस्कृत संगम संस्था के सदस्यों द्वारा रामायण आधारित व्याख्यानमाला आयोजित की गई।

माकपा की धार्मिक क्रांति

केरल सरकार की इस पहल के बाद दलगत प्रतिक्रियाओं के तहत माकपा पर छवि बदलने की कोशिश जैसे आरोप भी लगे। ऐसी प्रतिक्रियाओं पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि कम्युनिस्टों एवं समाजवादियों की पहचान नास्तिक के रूप में रही है। धर्म को लेकर भारतीय समाज से इनकी दूरी बनी रही है। बंगाल में भी मार्क्सवादियों द्वारा दुर्गा पूजा के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखना उन्हें भारी पड़ा। मार्क्सवादी चिंतन के लोग सभी तरह के धर्मों को क्रांति की राह में बड़ा रोड़ा मानते रहे हैं।

लेनिन ने तो धर्म को अफीम तक कह दिया था

लेनिन ने तो धर्म को अफीम तक कह दिया था। कम्युनिस्टों की पहचान ईश्वर और धर्म को नहीं मानने वाले के रूप में बन गई। समय के साथ यह धारणा विश्वव्यापी हो गई और धर्म और कम्युनिस्टों के बीच दूरी बढ़ती चली गई। भारत के कम्युनिस्टों के वक्तव्य, आचरण एवं घोषणापत्र भी धर्म विरोधी होते गए। यद्यपि 1947 के बाद देश में कम्युनिस्टों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। बंटवारे के बाद भी धार्मिक असहिष्णुता इतनी तीव्र नहीं थी जितनी आज है। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में तेलंगाना का सशस्त्र विद्रोह और 1957 में नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल में कम्युनिस्टों की पहली सरकार बनी। वहां के चर्च से जुड़े शिक्षण संस्थान भी कम्युनिस्टों के निशाने पर आ गए।

समाजवादियों में आचार्य नरेंद्र देव नास्तिक थे

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और नरेंद्र देव ने अलग दल का निर्माण किया। समाजवादियों में आचार्य नरेंद्र देव नास्तिक थे। जयप्रकाश भी धार्मिक आचरण से दूरी बनाए रखते थे। सबसे अनूठा और निराला व्यक्तित्व डॉ. लोहिया का रहा जिन्होंने राम, कृष्ण और शिव के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डालने का काम कर तुलनात्मक विश्लेषण भी किया। 1960 के दशक में उन्होंने अपने समाजवादी मित्रों एवं कार्यकर्ताओं को रामायण मेला आयोजित करने का सुझाव भी दिया।

धर्म और राजनीति का रिश्ता

रामायण मेले से जुड़ा उनका यह वक्तव्य आज भी प्रासंगिक है कि ‘धर्म और राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म। हम आज एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति में हैं जिसमें बुराई से लड़ाई में धर्म का कोई रास्ता नहीं रह गया है और वह निर्जीव हो गया है, जबकि राजनीति अत्यधिक कलह भरी हो गई है।’ मेले के आयोजन से उनका तात्पर्य पूछे जाने पर उनका उत्तर था, ‘आनंद, दृष्टि, रस-संचार और हिंदुस्तान को बढ़ावा’ इसके मुख्य उद्देश्य हैैं।

धर्म और राजनीति की जड़ें एक हैं

डॉ. लोहिया का स्पष्ट मत था कि धर्म और राजनीति की जड़ें एक हैं, लेकिन उनके दायरे को अलग-अलग रखना ही कल्याणकारी होगा। डॉ. लोहिया के अकस्मात निधन के बाद समाजवादी आयोजन दिशाहीनता का शिकार हो गया। मंडल के बाद की दलीय राजनीति ने इसे संकीर्ण और सिद्धांतहीन बना दिया। अधिकांश मंडलवादी दल परिवार, जाति की राजनीति के साथ भ्रष्ट आचरण के दोषी बनते गए। इसके परिणाम भी सामने हैं।

वामपंथी आस्तिक-नास्तिक के कठघरे से निकल नहीं पाए

राजनीति और धर्म के प्रति लोहिया के विचार आज भी प्रसांगिक हैं। यदि कम्युनिस्टों और समाजवादियों द्वारा इन विचारों का अनुसरण किया जाता तो आज उनकी स्थिति अलग होती। राज्य विशेष में राजनीतिक सफलता मिल जाने के बावजूद वामपंथी एवं समाजवादी आस्तिक-नास्तिक के कठघरे से बाहर नहीं निकल पाए और यही एक बड़ा कारण रहा कि देश के सभी हिस्सों में उनकी स्वीकार्यता नहीं बन पाई। आज श्रीराम से जुड़े आयोजन मात्र से इन दलों पर पाला बदलने, तुष्टीकरण के प्रयास आदि के आरोप लग रहे हैं, क्योंकि धर्म का राजनीतिक और राजनीति का धार्मिक इस्तेमाल हुआ है। आज की दुनिया भिन्न और बदली हुई है। सोवियत संघ के विघटन के बाद समूचे पूर्वी यूरोप का सांस्कृतिक एवं धार्मिक हुलिया बदल गया।

भारतीय समाज में धर्म की जड़ें गहरी हैं

भारतीय समाज में धर्म और उससे जुड़े प्रतीकों की जड़ें गहरी भी हैं और पुरानी भी। हमारे यहां धार्मिक प्रचारकों और गुरुओं की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन समाज सुधारकों के नाम पर चंद महानुभाव ही हैं जो अपनी विश्वसनीयता रखते हैैं। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में वामपंथियों ने अगर इस मर्ज को समझा है तो यह स्वागतयोग्य है, लेकिन उन्हें भी ढोंग एवं आडंबर के प्रपंच से बचकर ‘रामायण महीने’ का आयोजन करना होगा, क्योंकि धर्म और राजनीति केअविवेकी मिलन से दोनों भ्रष्ट होते हैं।

धर्म को राजनीति से नहीं मिलना चाहिए

किसी एक धर्म को किसी एक राजनीति से नहीं मिलना चाहिए। इससे सांप्रदायिक कट्टरता जन्म लेती है। धर्म और राजनीति को अलग रखने का मतलब यही है कि सांप्रदायिक कट्टरता से बचें और दोनों का घालमेल न करें। सिद्धांत आधारित धार्मिक कार्यक्रम एवं राजनीति जनकल्याण के हित में भी होंगे। इससे धर्म भी तार्किक होंगे और मार्क्सवादी भी व्यावहारिक होंगे।

( लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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