[ संजय गुप्त ]: कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड-19 के चलते जब 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा हुई थी तब देश में 600 के करीब कोरोना संक्रमित मरीज थे और 11 लोगों की मौत हुई थी। लॉकडाउन घोषित होते ही पूरे देश में सन्नाटा सा छा गया तो इस महामारी के खौफ के चलते। इस खौफ के बावजूद अमीर हो या गरीब, सबको यह आशा थी कि स्थिति जल्द ठीक होगी और सरकार लोगों का और लोग एक-दूसरे का ख्याल रखेंगे, लेकिन जब लॉकडाउन की अवधि बढ़ती गई तो देश का गरीब तबका विचलित हो उठा। यह गरीब तबका शहरों में रहने वाला दिहाड़ी मजदूर या किसी कारखाने का कामगार अथवा रेहड़ी लगाने वाला था। इस तबके में ऑटो-रिक्शा चालक और अन्य रोज कमाने-खाने वाले भी थे।

सरकारी राहत नहीं मिलने से कामगार बेचैन हुआ गांव-घर जाने के लिए

सरकार ने किसानों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, जनधन खाताधारक महिलाओं के कल्याण के लिए जो अनेक घोषणाएं कीं उनसे इस तबके को राहत नहीं मिली और वह अपने गांव-घर जाने के लिए बेचैन हो उठा। आमतौर पर यह तबका शहरों की झुग्गी बस्तियों या शहरी सीमा के गांवों में किराये पर रहता था। जब उसकी कमाई बंद हो गई और उसे अपना भविष्य अनिश्चित दिखने लगा तो साधन न मिलने के बाद भी वह पैदल, साइकिल या फिर ट्रकों के जरिये असुरक्षित तरीके से गांव लौटने लगा।

कुछ कामगारों ने सैकड़ों किमी की दूरी पैदल तय की, मजबूरी में श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलानी पड़ी

कुछ ने तो सैकड़ों किमी की दूरी पैदल तय की। मजबूरी में सरकार को श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने का फैसला करना पड़ा। इसी के साथ कामगारों की दुर्दशा की खबरें आने लगीं। ये अब भी आ रही हैं। यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री ने कामगारों की परेशानियों का संज्ञान लिया और स्वीकार किया कि उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़े हैं। उन्होंने उनके कष्टों का निवारण करने की भी बात कही।

गांव लौट चुके तमाम कामगार फिर शहरों की ओर लौटने को तैयार हैं

नि:संदेह कामगारों ने असहनीय पीड़ा झेली है, लेकिन उचित यही होगा कि वे अपने कार्यस्थलों की ओर वापस लौटें। यही उनके और देश के हित में है। इसकी सराहना की जानी चाहिए कि गांव लौट चुके तमाम कामगार फिर शहरों की ओर लौटने को तैयार हैं। उनका उत्साहवर्धन किया जाना चाहिए।

लॉकडाउन से कोरोना को नियंत्रित तो किया, लेकिन कामगारों की दुर्दशा को नहीं रोका जा सका

यह सही है कि लॉकडाउन के कारण कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद मिली, लेकिन शहरी कामगारों की दुर्दशा को नहीं रोका जा सका। जिन राज्य सरकारों को इन कामगारों को समझाने और रोकने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी उनका पूरा तंत्र ऐसा करने में विफल रहा। सबसे खराब यह था कि कुछ राज्यों की यह कोशिश रही कि कामगार उनके यहां से जितनी जल्दी निकल जाएं तो बेहतर ताकि उन्हें उनकी देखभाल न करनी पड़े।

राज्य सरकारों ने कामगारों को राशन उपलब्ध कराने में लापरवाही बरती

भरोसा दिलाने के बाद भी राज्य सरकारों ने कामगारों को राशन उपलब्ध कराने में लापरवाही बरती। इस उपेक्षित रवैये के कारण दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, सूरत, बेंगलुरु सरीखे बडे़ शहरों में रह रहे कामगारों की मुसीबतें और बढ़ीं। न तो उनके रहने की कोई सही व्यवस्था थी और न ही खाने की। राज्यों के रवैये के कारण ही यह ध्येय पूरा नहीं हो सका कि जो जहां है वह वहीं रहे।

असंगठित क्षेत्र के लाखों मजदूरों के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है

जब उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि प्रांतों के लाखों मजदूर गांव लौटने लगे तब यह पता चला कि उनके पास किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं। चूंकि वे असंगठित क्षेत्र में किसी ठेकेदार के तहत काम करते थे इसलिए उनके पास न पीएफ था और न ईएसआइ।

कामगारों को किराया न देने की स्थिति में घर खाली करने को कहा गया

आधार उनके गांव के पते का था, क्योंकि वे शहरों में स्थायी ठिकाना नहीं बना पाए थे और किराये के मकान अथवा झुग्गी बस्ती का कोई भरोसा होता नहीं। जो कामगार रुकने का मन बना रहे थे उन्हें या तो किराया देने को बाध्य किया गया या फिर उनसे कहा गया कि किराया नहीं दे सकते तो घर खाली करें।

कामगारों की बदहाली पर केंद्र के आश्वासन के चलते सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिया दखल

कामगारों की बदहाली को देखते हुए कुछ लोग जनहित याचिका के जरिये सुप्रीम कोर्ट पहुंचते रहे। कोर्ट ने विषम परिस्थितियों और केंद्र के इस आश्वासन के चलते दखल नहीं दिया कि कामगारों की देखभाल हो रही है। इस पर कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अभियान सा छेड़ दिया।

जब कामगारों की दुर्दशा जारी रही तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर सरकार को दिए निर्देश

जब कामगारों की दुर्दशा की खबरों का सिलसिला कायम रहा तो सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर केंद्र और राज्यों को कुछ निर्देश दिए। उसकी ओर से आगे भी इस पर सुनवाई होगी, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि वह ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं है। वह तो किसी कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में ही कुछ कर सकता है। यह ठीक नहीं कि संकीर्ण राजनीति से प्रेरित लोग एक मानवीय त्रासदी को भुनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को अपना मोहरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

कामगारों के संकटग्रस्त होने के बाद केंद्र को प्रवासी कामगारों की परिभाषा बदलने की याद आई

अपने राज्य से निकलकर दूसरे राज्य गए कामगारों की दुर्दशा इसलिए हुई, क्योंकि वे जहां काम कर रहे थे वहां के वोटर नहीं थे। यह भी एक त्रासदी ही है कि कामगारों के संकटग्रस्त होने के बाद केंद्र सरकार को प्रवासी कामगारों की परिभाषा बदलने की याद आई। कामगारों को कर्मचारी राज्य बीमा निगम के तहत सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए एक नया कानून बनाने की पहल अच्छी बात है, लेकिन आखिर इसके पहले इस बारे में क्यों नहीं सोचा गया?

कामगारों की सामाजिक एवं स्वास्थ्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला कानून बनना चाहिए

उचित यह होगा कि कामगारों की सामाजिक सुरक्षा से संबंधित कानून का निर्माण जितनी जल्दी संभव हो, किया जाए। ऐसा करते समय यह भी देखा जाना चाहिए कि इस कानून का हश्र 1979 के अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम और 2008 के असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम जैसा न होने पाए। ये दोनों अधिनियम कागजी ही साबित हुए, क्योंकि किसी ने उनके अमल की चिंता नहीं की। कम से कम अब तो कामगारों की सामाजिक एवं स्वास्थ्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला पुख्ता कानून बनाया ही जाना चाहिए।

कामगारों के हित में बनने वाले नियम- कानूनों को राज्य सरकारें को अमल में लाना होगा

कामगारों के हित में बनने वाले नियम- कानून असरकारी तभी सिद्ध होंगे जब राज्य सरकारें उनके अमल को लेकर तत्परता दिखाएंगी। कामगारों के मामले में केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों को भी जरूरी सबक सीखने की जरूरत है। इस मामले में और देर इसलिए नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि पहले ही देरी हो चुकी है और उसके ही दुष्परिणाम कामगारों की बदहाली के रूप में सामने आए हैं।

कामगारों की बदहाली राष्ट्रीय शर्म का विषय है

कामगारों की बदहाली राष्ट्रीय शर्म का विषय है। शर्मिंदगी के इस भाव का परिचय देने के साथ यह भी महसूस किया जाना चाहिए कि उनके बगैर देश का काम चलने वाला नहीं। यह ठीक है कि देश कामगारों की महत्ता को समझ रहा है, मगर बात तब बनेगी जब ऐसे ठोस उपाय किए जाएंगे जिससे फिर कभी उनकी उपेक्षा-अनदेखी न होने पाए।

[  लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं  ]

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