प्रमोद भार्गव। Dairy production: दुनिया में दूध उत्पादन में अव्वल होने के साथ भारत दूध की सबसे ज्यादा खपत में भी अव्वल है। बावजूद इन पशुपालकों की गिनती देश की आíथकी में नहीं की जाती है। इन्हें सामान्य किसानों में ही शामिल किया जाता है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा घोषित किए गए 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में इनकी भी सुध ली गई है। दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज इन्हीं पशुपालकों को दिए जाएंगे। इससे पशुपालन का ढांचागत विकास होगा।

मिलावटी दूध का वृहद पैमाने पर उत्पादन : हालांकि इन मवेशियों और इनके पालकों का वास्तव में संरक्षण करना है तो वन संरक्षण अधिनियम में सुधार कर पशुओं को आरक्षित वनों आदि में घास चरने की अनुमति देनी होगी। इन मवेशियों के जंगली घास और पत्तियां खाने से दूध का उत्पादन तो बढ़ेगा ही, लोगों को पौष्टिक आहार भी मिलेगा जिससे बीमारियां कम होंगी।वैसे देश में दूध के उत्पादन और खपत में व्यापक अंतर को पाटने के लिए मिलावटी दूध का वृहद पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। बहरहाल मिलावटी दूध के दुष्परिणाम जो भी हों, इस असली-नकली दूध का देश की अर्थव्यवस्था में योगदान 1.15 लाख करोड़ रुपये का है। दाल और चावल की खपत से कहीं ज्यादा दूध और उसके सह-उत्पादों की मांग लगातार बनी रहती है। वर्ष 2018 में देश में दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दर 2.2 फीसद रही है।

14 राज्यों की अपनी दूध सहकारी संस्थाएं : बिना किसी सरकारी मदद के बूते देश में दूध का 70 फीसद कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस कारोबार में ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पारंपरिक ज्ञान से न केवल वे बड़ी मात्र में दुग्ध उत्पादन में सफल हैं, बल्कि इसके सह-उत्पाद बनाने में भी मर्मज्ञ हैं। दूध का 30 फीसद कारोबार संगठित ढांचा, मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हैं। 14 राज्यों की अपनी दूध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य उत्पादों एवं दूध से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसद हैं, किंतु वह दूध ही है जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे सात करोड़ से भी ज्यादा परिवारों की आजीविका जुड़ी है। रोजाना दो लाख से भी अधिक गांवों से दूध एकत्रित करके डेयरियों में पहुंचाया जाता है। बड़े पैमाने पर ग्रामीण सीधे शहरी एवं कस्बाई ग्राहकों तक भी दूध बेचने का काम करते हैं।

जब दूध में मिलाई जाएंगी तो देश का युवा स्वस्थ्य कैसे रहेगा? दूध में मिलावट कोई नई बात नहीं है। बीते दिनों लोकसभा में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन ने दूध में मिलाए जाने वाले जिन हानिकारक तत्वों की जानकारी दी है, वह हैरान करने वाली है। एक अनुमान के मुताबिक बाजार में मिलने वाला 68 प्रतिशत दूध मिलावटी है। इसमें यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेट पाउडर, कृत्रिम चिकनाई, सफेद रोगन और सफेद पेंट तक मिलाया जा रहा है। इस तरह की अखाद्य वस्तुएं जब दूध में मिलाई जाएंगी तो देश का युवा स्वस्थ्य कैसे रहेगा? वैसे दूध केवल बच्चों, किशोर और युवाओं का ही आहार नहीं है, प्रौढ़ और वृद्ध भी खूब पीते हैं। दूध और शहद प्रकृति से मिले ऐसे पेय पदार्थ हैं, जिनमें संपूर्ण पौष्टिक गुण होते हैं। ऊंटनी के दूध की मांग इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि उसमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक है।

68 फीसद नमूने एफएसएसआइ के मानकों पर खरे नहीं उतरे : जिन लोगों को गाय, भैंस, बकरी के दूध से एलर्जी होती है, उन्हें यह दूध बेहतर साबित होता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने 2011 में दूध की गुणवत्ता नापने के लिए एक सर्वेक्षण किया था। इसके लिए 1,791 नमूने देश भर से इकट्ठे किए गए थे। इनमें से 68 फीसद नमूने एफएसएसआइ के मानकों पर खरे नहीं उतरे। बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, झारखंड में हालात ज्यादा ही बदतर हैं। इससे यह सच्चाई भी सामने आई है कि हम सबसे ज्यादा दूध इसलिए उत्पादित कर पा रहे हैं, क्योंकि उसमें मिलावटी दूध की मात्र भी जुड़ी हुई है।

भारत आयात शुल्क घटाने के साथ उन दुग्ध उत्पादों को बेचने की छूट भी दे : इस व्यवसाय पर अमेरिका समेत अन्य देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें टिकी हैं। अमेरिका की इस मंशा को समझने के लिए भारत और अमेरिका के बीच होने वाले आयात-निर्यात को समझना होगा। वर्ष 2018 में दोनों देशों के बीच 143 अरब डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था। इसमें अमेरिका को 25 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ है। इसकी भरपाई वह दुग्ध और पोल्ट्री उत्पादों का भारत में निर्यात करके करना चाहता है। इस नाते उसकी कोशिश है कि इन वस्तुओं एवं अन्य कृषि उत्पादों पर भारत आयात शुल्क घटाने के साथ उन दुग्ध उत्पादों को बेचने की छूट भी दे, जो पशुओं को मांस खिलाकर तैयार किए जाते हैं।

दरअसल अमेरिका में इस समय दुग्ध-उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन उस अनुपात में कीमतें नहीं बढ़ रही हैं। दूसरे अमेरिकी लोगों में दूध की जगह अन्य तरल पेय पीने का चलन बढ़ने से दूध की खपत घट गई है। इस कारण किसान आíथक बदहाली के शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति तब है, जब अमेरिका अपने किसानों को प्रति किसान 60,600 डॉलर यानी करीब 43 लाख रुपये की वार्षकि सब्सिडी देता है। इसके उलट भारत में सब मदों में मिलाकर किसान को बमुश्किल 16,000 रुपये की प्रतिवर्ष सब्सिडी दी जाती है। ऐसे में यदि अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए डेयरी उत्पादों के निर्यात की छूट दे दी गई तो भारतीय डेयरी उत्पादक अमेरिकी किसानों से किसी भी स्थिति में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। नतीजन आत्मनिर्भरता का पर्याय बना डेयरी उद्योग चौपट हो जाएगा।

आज देश के महानगरों से लाखों की संख्या में श्रमिक गांव-देहात पहुंचे हैं और उनके समक्ष रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में यदि सरकार उन्हें पशुपालन और दूध उत्पादन के लिए पर्याप्त मदद करे तो एक साथ दो समस्याओं का समाधान हो सकता है। जहां एक ओर मजदूरों को रोजगार मिलेगा वहीं दूध खरीदारों को शुद्ध दूध उपलब्ध हो सकेगा।

[वरिष्ठ पत्रकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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