केसी त्यागी

विश्व व्यापार संगठन यानी डब्लूटीओ की चार दिवसीय मंत्री स्तरीय बैठक में सार्वजनिक खाद्य भंडारण को लेकर बहुप्रतीक्षित ‘स्थाई समाधान’ से अमेरिका के पीछे हटने से भारत समेत विश्व के तमाम विकासशील राष्ट्र निराश हैैं। अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित इस 11वीं बैठक के दौरान अमेरिका का रुख निराश करने वाला रहा। यह बैठक ‘मिनिस्ट्रीयल डिक्लरेशन’ के बिना ही समाप्त हो गई। इससे डब्लूटीओ की साख भी प्रभावित हुई।

बैठक में ई-कॉमर्स और मत्स्य पालन के क्षेत्र में तय कार्यक्रम यानी ‘वर्क प्रोग्राम’ पर सिर्फ सहमति बनाने के अलावा अन्य किसी भी क्षेत्र में कोई निष्कर्ष नहीं निकला। भारत और जी-33 के सदस्य देश सार्वजनिक खाद्य भंडारण मुद्दे पर स्थाई समाधान की मांग को लेकर आखिर तक डटे रहे, लेकिन सर्वाधिक प्रभावशाली अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण गतिरोध पर यथास्थिति बनी रह गई। इसके साथ ही अगली मंत्री स्तरीय बैठक के एजेंडे भी तय नहीं हो पाए। महत्वपूर्ण बात यह रही कि 164 सदस्यीय इस सम्मेलन में भारतीय पक्ष वैश्विक दबावों को दरकिनार कर अपने हितों की रक्षा को प्रतिबद्ध दिखा। वार्ता को विफल होने से बचाने और भारतीय रुख को स्पष्ट करने के लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के साथ सहमति बनाने का प्रयास भी किया गया। भारत के परिप्रेक्ष्य में यह विषय चुनौतीपूर्ण है। भारत लगातार अनाज भंडारण का मुद्दा उठाता रहा है, क्योंकि देश की 60 करोड़ से ज्यादा आबादी अन्न सुरक्षा के दायरे में आती है जिसके लिए सरकारी अनाज का भंडारण आवश्यक है और इसके लिए बड़े पैमाने पर सब्सिडी की जरूरत पड़ती है। यही सब्सिडी बड़े देशों की आंखों की किरकिरी बनी हुई है और वे इस पर 10 फीसद की सीमा रेखा थोपना चाहते हैं, लेकिन भारत इस मुद्दे का स्थाई समाधान चाहता है। तात्कालिक तौर पर यह राहत जरूर है कि इन विषयों पर फैसले थोपे जाने का खतरा टल गया है।
स्थाई समाधान की मांग समझने के लिए वर्ष 2001 के दोहा डेवलपमेंट एजेंडे को समझना जरूरी है। इसके तहत वर्ष 2013 तक निर्यात पर दी जाने वाली सब्सिडी और अन्य सहयोग समाप्त करने जैसे विषय पर फैसला थोपा गया था, लेकिन भारत ने कृषि को ‘जीवन रेखा’ बताकर विकासशील देशों द्वारा कृषि के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य व्यवस्था को विकृत करने के प्रस्ताव से अपनी दूरी बना ली थी। अमेरिका जैसे देश भारत और इस श्रेणी के अन्य राष्ट्रों पर छूट मांगने का आरोप लगाते रहे हैं। दिसंबर 2013 में इंडोनेशिया के बाली में हुई बैठक के दौरान खाद्य सुरक्षा और कृषि संरक्षण के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी को सीमित किए जाने पर अंतिम निर्णय होना था, लेकिन चूंकि यह फैसला भारतीय हितों के अनुरूप नहीं होता, लिहाजा भारत और विकासशील देश इससे सहमत नहीं हुए और निर्णय लंबित रह गया। संगठन द्वारा इन देशों के लिए सब्सिडी सीमा कुल कृषि उत्पादन का 10 फीसद तक प्रस्तावित किया जाना अविकसित देशों की किसानी समस्याओं को बढ़ावा देने वाली पहल है। विषय पर समझौता न हो पाने की स्थिति में एक ‘पीस क्लाज’ पर सहमति बनाई गई कि जब तक इस मसले पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता तब तक कोई भी राष्ट्र खाद्य सुरक्षा के नाम पर दी जाने वाली राहत को लेकर किसी भी देश पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा। दो साल पहले केन्या की राजधानी नैरोबी में आयोजित इस बैठक में ‘स्पेशल सेफगार्ड मैकेनिज्म’ पर प्रतिबद्धता जताई और सब्सिडी सीमा कम करने एवं आयात शुल्क घटाने से उपजने वाली घरेलू समस्याओं के निपटारे का विकल्प रखने का प्रस्ताव रखा गया।
डब्लूटीओ के ऐसे प्रस्ताव भारतीय हितों के अनुरूप नहीं हैं। आए दिन हमारे किसान एमएसपी और अन्य समस्याओं को लेकर आंदोलनरत रहते हैं। आलू, प्याज के बाद अब कर्नाटक के मूंगफली किसान कीमतों को लेकर नाराज हैं। चार-पांच महीनों की मेहनत के बावजूद उन्हें लागत की आधी कीमत भी नहीं मिल पा रही है। वर्तमान एमएसपी प्रणाली से किसानों का भला नहीं हो पा रहा है। किसान आत्महत्याओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। देश में खेती का रकबा घटता जा रहा है। ऐसे में वैश्विक मंच को संतुष्ट करने की पहल खतरनाक ही होती।
ब्यूनस आयर्स की चुनौतियों एवं डब्लूटीओ की ‘अर्थनीति की राजनीति’ को समझने के लिए इसके छिपे उद्देश्यों को समझना जरूरी है। इसमें विकसित देशों का वर्चस्व है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी बड़ी भागीदारी होने के कारण वे तीसरी दुनिया के मुल्कों में उत्पाद बेचने के लिए बाजार की तलाश में हैं। इतिहास गवाह है कि डब्लूटीओ के कृषि संबंधित समझौतों का केवल विकसित देशों द्वारा इस्तेमाल किया गया है। अमेरिका समेत अन्य औद्योगिक राष्ट्र अपने किसानों को भारी कृषि सब्सिडी प्रदान करते हैं, लेकिन छोटे देशों पर किसान-मजदूर विरोधी कानून बनाने का दबाव डालते रहे हैं। 2014 में पारित ‘यूनाइटेड स्टेट्स फार्म बिल’ अपने किसानों को अगले 10 वर्षों तक फार्म सब्सिडी प्रदान करने की बात करता है। वहां ऐसा भी कानून है, जो कहता है कि निर्यात सब्सिडी में कोई कटौती नहीं की जाए। इसके तहत अमेरिकी खेतिहरों को 956 अरब डॉलर की राशि सब्सिडी स्वरूप दिए जाने का प्रावधान है। कपास निर्यात पर अमेरिका द्वारा भारी सब्सिडी दिए जाने का प्रतिकूल असर अफ्रीकी एवं एशियाई कपास उत्पादक देशों पर पड़ चुका है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अमेरिका में प्रति किसान औसतन 7,860 डॉलर की सब्सिडी दी गई। इसी दौरान ब्रिटेन ने अपने किसानों को 28,300 पाउंड की सब्सिडी देने का काम किया। अब भारत-चीन के प्रयासों से यूरोपीय संघ और अमेरिका द्वारा अपने किसानों को 160 अरब डॉलर की सब्सिडी में कटौती करनी पड़ी। कटौती के साथ ही इसे पूरी तरह बंद कराने की कोशिशें भी जारी हैं।
जहां तक भारतीय सब्सिडी का सवाल है तो उर्वरक, सिंचाई और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी में कमी आंकी गई है। वित्त वर्ष 2011 में इन क्षेत्रों के लिए 29.1 अरब डॉलर की सब्सिडी राशि दी गई थी जो वित्त वर्ष 2014 में 22.8 अरब डॉलर पर आ गई। इस स्थिति में भारतीय किसान को अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ कदमताल करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। राहत की बात यह रही कि भारत अपने खाद्य सुरक्षा एवं किसानी मुद्दों पर पिछले अवसरों की तरह न सिर्फ अडिग रहा, बल्कि नए एजेंडे शामिल कर पुराने को नजरअंदाज किए जाने के खिलाफ भी रहा। स्थाई समाधान को लेकर सहमति न बन पाने से निराशा जरूर हुई, लेकिन वाणिज्य मंत्री के मजबूत प्रतिनिधित्व से आगामी बैठकों एवं अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अपने स्पष्ट रुख प्रस्तुत करने का हौसला भी प्राप्त हुआ है।
[ लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं ]

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