[विवेक ओझा]। ब्राजील में आयोजित ग्यारहवें ब्रिक्स सम्मेलन में वैश्विक बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार कर उसे मजबूती देने, विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ‘एजेंडा 2030’ के प्रभावी क्रियान्वयन, यूएनएफसीसीसी (यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) के बैनर तले पेरिस समझौते पर काम करते हुए जलवायु परिवर्तन से निपटने पर बल दिया गया है।

ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय नेताओं ने इस समिट के समापन के बाद जिस संयुक्त वक्तव्य को जारी किया उसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय राजनीति और विवादों के समाधान, पर्यावरण संरक्षण, वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के समाधान, सतत विकास, अंतरराष्ट्रीय संगठनों की संरचना और कार्यप्रणाली में सुधार आदि विषयों से जुड़े पहलुओं पर ब्रिक्स देशों की मंशा और सहयोग के प्रस्तावों को शामिल किया गया है।

ब्रिक्स देशों ने दर्शाई प्रतिबद्धता

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की बात करें तो इस समिट में जैविक हथियारों के उत्पादन और भंडारण पर रोक से जुड़े तथ्यों को प्रभावी तरीके से लागू कर एक नए प्रोटोकॉल को अपनाने की बात की गई है जिसका उद्देश्य इस संबंध में एक सत्यापन तंत्र विकसित करना है। इसमें रासायनिक हथियारों से जुड़े संगठनों की मांग के अनुरूप कार्य करने पर बल दिया गया है। अंतरिक्ष में शस्त्रों की होड़ को रोकने के लिए ब्रिक्स देशों ने प्रतिबद्धता दर्शाई।

इस समिट में जैविक और रासायनिक आतंकवाद से निपटने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2,462 को अंगीकृत करने पर संतुष्टि जाहिर की गई। ब्लैक मनी, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंक के वित्त पोषण को रोकने के लिए ब्रिक्स देशों ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के साथ मिलकर चलने की बात की है। बैठक में व्यापारिक तनावों और युद्धों से परे एक मुक्त, निष्पक्ष, नियम आधारित और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक प्रणाली के विकास के लिए कार्य करने पर बल दिया गया है।

जी-20 के साथ वैश्विक आर्थिक सहयोग को मजबूती देने की बात ब्रिक्स नेताओं ने की है। ब्रिक्स नेताओं ने आइएमएफ में सुधार की अपेक्षा करते हुए एक मजबूत कोटा आधारित प्रणाली के पक्ष में काम करने की मांग की। आइएमएफ के 15वें जनरल रिव्यू ऑफ कोटा के प्रति ब्रिक्स देशों ने अपनी गंभीर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए कहा कि आइएमएफ कोष के आकार को बढ़ाने में असफल रहा। ब्रिक्स देशों ने यह भी असंतोष जाहिर किया कि उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में कोटा शेयर बढ़ाने में आइएमएफ असफल रहा है।

ब्रिक्स सम्मेलन और भारत

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11वें ब्रिक्स समिट में कुछ महत्वपूर्ण उद्घोषणाएं की हैं। स्वस्थ जीवनशैली के लिए नवोन्मेषी समाधानों पर भारत ब्रिक्स डिजिटल हेल्थ समिट का आयोजन करेगा। इसे प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। इस समिट का लक्ष्य डिजिटल प्रौद्योगिकी को हेल्थकेयर इंफोर्मेटिक्स और डायग्नोस्टिक्स से जोड़ना है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने परंपरागत औषधियों पर पहले हो चुके ब्रिक्स ज्ञापन समझौते को गति देते हुए इस विषय पर एक कार्यशाला आयोजित करने की मंशा जाहिर की। इस विषय पर ब्रिक्स के बैनर तले नेतृत्वकर्ता की भूमिका वर्ष 2016 में भारत ने गोवा में निभाई थी। भारत ने इस समिट में सतत जल प्रबंधन के मुद्दे को उठाते हुए ब्रिक्स के जल संरक्षण मंत्रियों की पहली बैठक के भारत में आयोजन का प्रस्ताव किया।

इस समिट में सॉफ्ट पावर को बढ़ावा देने की मंशा से प्रधानमंत्री ने कहा कि चूंकि हम फिल्म निर्माण और तकनीक में वैश्विक नेतृत्वकर्ता हैं, इसलिए भारत मार्च 2020 में मुंबई में ‘ब्रिक्स फिल्म टेक्नोलॉजी सिम्पोजियम’ का आयोजन करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने समिट में स्पष्ट किया कि ब्रिक्स के लिए आतंकवाद से निपटने का मुद्दा बहुत अहम है और हाल में ब्राजील ने आतंकवाद निरोधक रणनीतियों पर पहले ब्रिक्स सेमिनार का आयोजन किया है, जो प्रशंसनीय है। मालूम हो कि ब्रिक्स आतंकवाद पर पांच कार्य-समूहों का गठन कर चुका है। इस समिट में यह घोषणा भी की गई कि भारत डिजिटल फोरेंसिक्स (फोरेंसिक विज्ञान की एक शाखा) पर ब्रिक्स कार्यशाला का आयोजन करेगा। भारत द्वारा ब्रिक्स यूथ समिट के आयोजन की घोषणा करते हुए कहा गया है कि यह समिट स्टार्ट अप्स, हैकेथान और खेलों पर विशेष ध्यान देगा। समिट में प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स देशों के छात्रों के लिए इंटर्नशिप और फेलोशिप कार्यक्रम को शुरू करने की मंशा जाहिर की।

भारत के लिए क्यों जरूरी ब्रिक्स

रूस और चीन की अमेरिका से किसी ना किसी रूप में दुश्मनी जगजाहिर रही है। क्रीमिया पर रूस द्वारा कब्जा करने के बाद रूस- अमेरिका तनातनी के बीच रूस ने जी-आठ की सदस्यता छोड़ दी थी, और उसके बाद से दोनों देशों में संबंध सामान्य नहीं रहे। वर्ष 2015 के पहले इन दोनों देशों की विश्व राजनीति में आक्रामक सक्रियता के चलते तीसरे विश्व युद्ध होने तक की आशंका लोग प्रकट करने लगे। दोनों देशों ने नाभिकीय हथियारों को खत्म करने संबंधी 1987 की आइएनएफ ट्रीटी को ही 2019 में खत्म कर दिया। अमेरिका ने हाल के समय में अपने ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज थ्रू सैंक्शन एक्ट’ का हवाला देते हुए भारत को चेतावनी दी थी कि चूंकि रूस अमेरिका का शत्रु है, इसलिए अगर भारत ने उससे एसयू 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा तो उसे अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2014 के बाद से ठंडे पड़े रूस भारत संबंधों की पुनर्बहाली को रोकने की कोशिश इस रूप में अमेरिका ने की। अमेरिका ने यह भी प्रस्ताव किया कि रूस से ना लेकर डिफेंस मिसाइल भारत अमेरिका से ले ले।

गौरतलब है कि दो अगस्त 2017 को अमेरिकी राष्ट्रपति ने उक्त कानून पारित कर ईरान, रूस और उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध आरोपित कर दिए थे। भारत और रूस ने अमेरिका की मंशा को पहचाना है, और चीन को भी इस बात का अहसास हुआ है कि अमेरिका इन तीनों के आर्थिक और अन्य हितों के मार्ग में रोड़ा बनता जा रहा है। जब अमेरिका ने भारत को ईरान से कच्चा तेल ना खरीदने की धमकी दी तो ब्रिक्स के तीन देशों भारत, चीन व रूस ने घोषणा की थी कि वे विकासशील देशों की अगुवाई में एक नया ‘मल्टीलेटरल ट्रेड रेजिम’ विकसित करेंगे और ऐसी प्रतिबद्धता शंघाई सहयोग संगठन के फोरम से भी जाहिर की। अमेरिका अक्सर भारत, चीन और रूस जैसे देशों पर बौद्घिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाने की फिराक में रहता है। हर साल वह अंतरराष्ट्रीय बौद्घिक संपदा अधिकार सूचकांक जारी कर इन देशों पर पेटेंट, ट्रेड सीक्रेट, इंडस्ट्रियल डिजाइन के पुख्ता इंतजाम ना करने का आरोप लगाता है और इन्हें और अन्य प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रायोरिटी वॉच लिस्ट में डाल देता है।

अमेरिका अपने स्पेशल 301 रिपोर्ट के जरिये भी भारत और चीन सहित कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर बौद्घिक संपदा अधिकार संरक्षण के मजबूत नियम कायदे कानून ना होने का आरोप लगाता रहता है। अर्थव्यवस्था की भाषा में कहें तो अमेरिका गैर-प्रशुल्क अवरोध (बौद्घिक संपदा अधिकार, पर्यावरण नियमों के अभाव, बाल श्रम, मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप) के जरिये इन देशों को असहज कर अपने संरक्षणवादी एजेंडे को चलाता रहता है। इसलिए दो वर्ष पहले आठ विकासशील देशों ने मिलकर अमेरिका के स्पेशल 301 रिपोर्ट को अपनी आर्थिक संप्रभुता पर हमला करने की अमेरिकी चाल करार दिया था। इस प्रकार ब्रिक्स के बैनर तले ये देश विकसित देशों से अपनी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ा पाने में सफल भी रहे हैं। जहां तक भारत का सवाल है तो आज देश सक्रिय रूप में अपने हितों की रक्षा के लिए किसी देश को जवाब दे सकने की स्थिति में है, और कई अवसरों पर दे भी चुका है, दे भी रहा है।

विकसित देश बनने का लक्ष्य

ब्रिक्स देश उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं के नाम से जाने जाते हैं। ब्रिक्स शब्द के गठनकर्ता जिम ओ नील ‘गोल्डमैन सैक्स’ नामक अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी फर्म के मुख्य अर्थशास्त्री थे। वर्ष 2001 में नील ने ‘ब्रिक’ शब्द को गढ़ते हुए कहा था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन ऐसी उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाएं हैं जो अपनी जीडीपी विकास दर, प्रतिव्यक्ति आय, जनसंख्या आधार, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र आदि के बल पर वर्ष 2050 तक विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देंगे। वर्ष 2050 आने में देर है, लेकिन नील का यह सपना 15 वर्षों में ही पूरा होता दिख गया।

आज चीन एशिया की सबसे बड़ी और विश्व में अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। साथ ही दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देशों में शामिल है। रूस आज दुनिया की 12वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। रूस की जीडीपी 1.52 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि भारत की जीडीपी विश्व बैंक के नवीनतम आंकड़ों के हिसाब से 2.58 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं ब्राजील विश्व की आठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसका सकल घरेलू उत्पाद 2.05 ट्रिलियन डॉलर है। इसके अलावा 1.53 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ दक्षिण अफ्रीका भी विश्व की ग्यारहवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि इन उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं में कई बातें एक समान हैं और इन्हें विकसित देशों, विशेषकर अमेरिका जैसे देशों के आर्थिक संरक्षणवादी नीतियों से बचने के लिए एकजुट रहने की जरूरत है।

42 प्रतिशत आबादी ब्रिक्स देशों में

ब्रिक्स की महत्ता इस बात से पता चलती है कि दुनिया की 42 प्रतिशत आबादी ब्रिक्स देशों में निवास करती है। वैश्विक जीडीपी में इसका शेयर 23 प्रतिशत है, और नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट कहती है कि अगले एक दशक में ब्रिक्स देशों का ग्लोबल जीडीपी में हिस्सा 26 प्रतिशत होगा। इतना ही नहीं, वैश्विक व्यापार में इसकी 17 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ब्रिक्स देशों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 16 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का है। ब्रिक्स का एक बड़ा महत्व उसके न्यू डेवलपमेंट बैंक और उसके द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं से पता चलता है। लगभग 100 बिलियन डॉलर वाले इस बैंक से ब्रिक्स देशों में अवसंरचनात्मक परियोजनाओं और नवीकरणीय ऊर्जा के विकास के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। इस बैंक ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस से भी समझौता किया है।

ब्रिक्स के ही बैनर तले 100 बिलियन डॉलर वाले ‘कंटिंजेन्ट रिजर्व अरेंजमेंट’ के जरिये ब्रिक्स देशों में किसी भी भुगतान संतुलन संकट, तरलता संकट यानी मुद्रास्फीति और अवस्फीति जैसी समस्याओं से निपटने के लिए वित्तीय मदद देने का इंतजाम किया गया है। इसके अलावा ब्रिक्स अपने मीडिया समिट, ट्रेड फेयर, अंडर 17 फुटबॉल टूर्नामेंट जैसी पहलों के जरिये जनता के मध्य संपर्क भी बढ़ाने का काम कर रहा है। कला, संस्कृति, पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी ब्रिक्स के प्रतिनिधि सक्रिय हैं।

[अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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