[पुष्पेंद्र सिंह]। Air Pollution: धान की फसल की कटाई के साथ ही उत्तर भारत विशेषकर पंजाब और हरियाणा में धान की फसल के अवशेष (पराली) जलाने से इस पूरे इलाके में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। इससे अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली एनसीआर की हवा भी बहुत खराब हो जाती है। परंतु इस समय बढ़ने वाले वायु प्रदूषण के स्तर के लिए केवल आसपास के राज्यों में किसानों द्वारा पराली जलाना ही जिम्मेदार नहीं है। आइआइटी कानपुर के एक अध्ययन के अनुसार इन महीनों में दिल्ली के प्रदूषण में केवल 25 प्रतिशत हिस्सा ही पराली जलाने के कारण होता है।

कृषि एक आर्थिक गतिविधि है

दिल्ली एनसीआर का अपना खुद का प्रदूषण भी बहुत ज्यादा होता है। हालांकि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष पराली जलाने की घटना में भारी कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है। हमें समझना होगा कि कृषि एक आर्थिक गतिविधि है। किसान स्वयं भी पराली जलाने के दुष्परिणाम जानते हैं और इनके प्रति सचेत हो रहे हैं। इस वर्ष धान की एमएसपी 1,815 रुपये प्रति क्विंटल घोषित की गई है, जबकि अन्य धान उत्पादक एशियाई देशों जैसे बांग्लादेश, चीन, फिलीपींस से लेकर थाईलैंड तक में यह भारतीय रुपये में 2,500 से लेकर 5,500 रुपये प्रति क्विंटल है।

किसानों को सस्ते मजदूर नहीं मिलते

पराली जलाने वाले प्रदेशों पंजाब और हरियाणा में एक तो मजदूरी महंगी है और दूसरे धान की कटाई के वक्त पर्याप्त संख्या में मजदूर भी उपलब्ध नहीं हो पाते। दरअसल मनरेगा जैसी योजनाओं के चलते किसानों को सस्ते मजदूर नहीं मिलते। पंजाब और हरियाणा में पहले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूर आते थे, परंतु अब स्थानीय स्तर पर अपने राज्यों में ही मनरेगा के माध्यम से मजदूरी मिलने के चलते कम संख्या में मजदूर पलायन करते हैं।

डीजल के प्रयोग से प्रदूषण होता है

किसानों को अक्टूबर-नवंबर में खेत खाली करने की जल्दी भी रहती है, क्योंकि उन्हें रबी की फसल आलू, मटर, सरसों, दलहन, गेहूं आदि की बोआई के लिए भी खेत तैयार करने के लिए कम दिनों का ही समय मिलता है। मशीन से कटाई तेज भी होती है और ज्यादा महंगी भी नहीं पड़ती, परंतु डीजल के प्रयोग से प्रदूषण जरूर होता है। मशीन से कटाई के बाद पराली जलाने से केवल प्रदूषण ही नहीं होता, बल्कि जमीन से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर, पोटैशियम जैसे पोषक तत्वों और जमीन की उर्वरता का भी ह्रास होता है। इस कारण अगली फसल में और ज्यादा मात्रा में रासायनिक खादों का प्रयोग करना पड़ता है। इससे देश पर खाद सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता है और किसानों की लागत भी। चूंकि खाद का हम बड़ी मात्रा में आयात करते हैं तो इससे हमारा व्यापार घाटा भी बढ़ता है, जिसके अपने अलग नुकसान हैं।

पराली जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड समेत अनेक जहरीली गैसों से स्वास्थ्य का नुकसान तो होता ही है, धरती का तापमान भी बढ़ता है, जिसके बहुत से अन्य गंभीर दुष्परिणाम होते हैं। इससे भविष्य में फसलों की पैदावार बड़ी मात्रा में घटने का अंदेशा भी विशेषज्ञों द्वारा जताया जाता है जिससे खाद्य संकट पैदा हो सकता है।

पराली प्रबंधन प्रणाली

पराली से बिजली बनाने या उसका कोई अन्य प्रयोग करने वाले सुझाव भी सीधे या परोक्ष रूप से प्रदूषण को ही बढ़ाते हैं। मशीनों से पराली प्रबंधन के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं उनकी अपनी समस्याएं भी हैं। इसके लिए प्रचलित हैप्पी सीडर व अन्य मशीनों के प्रयोग के लिए 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2018- 20 में दो वर्ष में इस मद में 1,152 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया है।

मशीन से खेत काटने और बाद में हैप्पी सीडर या एसएमएस (पराली प्रबंधन प्रणाली) मशीन को चलाने में भी तो डीजल का ही प्रयोग होता है जिससे किसान का खर्चा और प्रदूषण दोनों बढ़ता है। किसानों का मशीनों से पराली निस्तारण में लगभग दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर का खर्चा आता है। इस खर्च को वहन करने की ना तो किसान की क्षमता है और ना ही उसे इसमें कोई लाभ दिखाई देता है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने धान की कई नई उन्नत प्रजातियां विकसित की हैं जो ना केवल अन्य प्रचलित प्रजातियों से ज्यादा उत्पादन देती हैं, बल्कि ये कम पानी, कम समय में तैयार हो जाती हैं और उनमें कीटों या बीमारियों का प्रकोप भी कम होता है। इन प्रजातियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, क्योंकि इनके प्रयोग से अगली फसल की तैयारी के लिए किसान को ज्यादा समय मिलेगा। पंजाब और हरियाणा को छोड़कर देश भर में धान की पराली कहीं भी नहीं जलाई जाती।

धान झाड़ने के बाद पराली के गट्ठर बनाए जाते है

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो अधिकांश धान हाथ से काटा जाता है और फिर हाथ से ही झाड़ कर निकाला जाता है। हाथ से काटने और झाड़ने में एक तो कोई प्रदूषण नहीं होता, डीजल का खर्चा बचता है और दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों को खूब रोजगार भी मिलता है। धान झाड़ने के बाद पराली के गट्ठर बना लिए जाते हैं। धान की कुछ प्रजातियों की पराली तो कुट्टी के रूप में काटकर सारी सर्दी पशुओं के हरे चारे में मिलाकर उन्हें खिलाई जाती है जिसे पशु खूब चाव से खाते हैं। इस प्रक्रिया में कोई प्रदूषण नहीं होता।

इस तरह धान की पराली का प्रबंधन, इस्तेमाल और निस्तारण बहुत ही सरल, जैविक और प्रदूषण रहित तरीके से हो सकता है। इसके लिए सरकार धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य अपने वायदे के अनुसार कृषि लागत मूल्य आयोग द्वारा निर्धारित संबंधित लागत के डेढ़ गुने के आधार पर घोषित करे। दूसरा धान की कटाई और झड़ाई में लगे मजदूरों को मनरेगा के माध्यम से सरकार अपनी तरफ से भुगतान करे। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले वर्ष धान की खरीद पर 300 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दिया था, तो पंजाब और हरियाणा की सरकारें भी केंद्रीय सहयोग से ऐसा कर सकती हैं।

किसान अपने खर्चे पर पराली प्रबंधन करें?

एक तरफ हम किसानों को बाकी देशों के मुकाबले धान की सबसे कम एमएसपी दे रहे हैं, और दूसरी तरफ हम चाहते हैं कि किसान अपने खर्चे पर पराली प्रबंधन करें, तो ऐसा कैसे संभव है? उर्वरक सब्सिडी, व्यापार घाटे, प्रदूषण, बढ़ते तापमान, स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में बड़ी कीमत तो देश चुका ही रहा है। यदि इस कीमत का कुछ हिस्सा ही सीधे किसानों को धान की उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल की कटाई के लिए मनरेगा पोषित मजदूरों या प्रति हेक्टेयर सब्सिडी के रूप में दे दिया जाए तो कहीं कम कीमत चुकाकर हम पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से बच सकेंगे और बेहतर पर्यावरण संरक्षण कर सकेंगे।

[अध्यक्ष, किसान शक्ति संघ]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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