शिवकांत शर्मा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा होते ही टिकटों की बंदरबांट और उन्हें हासिल करने के लिए दलदबदल की लहर शुरू हो गई है। लगभग हर बड़े लोकतंत्र में पार्टियां अपने उम्मीदवारों का चयन निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी सदस्यों और स्थानीय लोगों की राय और उम्मीदवारों की योग्यता के आधार पर करती हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। यहां पार्टियां नेताओं की कुनबाशाही की तरह चलती हैं। इसलिए उम्मीदवारों का चयन नेता, उनके वफादारों की पसंद, जाति, मजहब, वर्ग, हैसियत, बाहुबल और लोकप्रियता के आधार पर किया जाता है।

यही भारतीय मतदाता की सबसे बड़ी विडंबना है। वह जातीय, धार्मिक और वर्गीय आधार पर सोचता है और अक्सर उसी आधार पर वोट देता है। हालांकि उसकी उम्मीद यह होती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि उसकी जाति, मजहब और वर्ग के लिए काम करने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को भी बेहतर बनाएं। वास्तव में होता इसके विपरीत है। चूंकि मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग योग्यता और व्यापक जनहित के मुद्दे पर नहीं करता, इसलिए न उसकी जाति, मजहब और वर्ग का कुछ भला हो पाता है और न ही उसके जीवन स्तर में कोई उल्लेखनीय सुधार आता है।

मुद्दों का सही होना आवश्यक

लोकतंत्र में प्रतिनिधियों को इसीलिए एक नियत कार्यकाल के लिए चुना जाता है ताकि सही काम न करने पर उन्हें अगले चुनाव में बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। प्रतिनिधियों को अपने काम और वादों के प्रति उत्तरदायी बनाने का जो एकमात्र हथियार मतदाता के पास था, वह पूरी तरह से नाकाम हो चुका है। कभी उम्मीदवार जाति, मजहब और वर्ग के नाम पर जीत जाते हैं तो कभी दूसरे के नाम पर। आगामी विधानसभा चुनावों में भी वही कहानी दोहराए जाने के आसार हैं। जिन लोगों ने अपनी जाति, मजहब और वर्गों के हितों के लिए, रोजगार के वादों, सुरक्षा और विकास के वादों से आकर्षित होकर वोट दिए थे, वे इन सबके पूरा न होने और कोरोना महामारी में मारे गए स्वजनों और कारोबारों के चौपट हो जाने की वजह से नाराज होंगे और शायद बदलाव चाह सकते हैं। वहीं इनमें कई समस्याएं ऐसी हैं जो उम्मीदवार ही नहीं, उसकी पार्टी और पूरे तंत्र की योग्यता और जनसहयोग के बिना हल नहीं हो सकतीं।

सरकारी खजाने की सीमा

यदि रोजगार की बात करें तो उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड बेरोजगारी के मामले में आगे हैं। पार्टियां रिक्त सरकारी पदों को भरकर लाखों नई सरकारी नौकरियों का वादा करेंगी, पर क्या कारोबार और निजी उद्यमों को बढ़ाए बिना केवल सरकारी नौकरियों के सहारे करोड़ों लोगों को रोजगार दिया जा सकता है? क्या सरकारी नौकरियां ही रोजगार हैं? क्या आप अपने कारोबार में किसी को उसकी उत्पादकता की परवाह किए बिना नौकरी पर रखना चाहेंगे? मगर सरकारी नौकरियों में यही होता है। क्या यह आपके करों के पैसे का सही उपयोग है?

उत्तर प्रदेश पर अभी 6.1 लाख करोड़ का कर्ज है, जो राज्य के जीडीपी का लगभग 28 प्रतिशत है। राज्य सरकार का सालाना खर्च 5.5 लाख करोड़ है, जिसका 14 प्रतिशत कर्ज लेकर पूरा किया जाता है। सरकार अपने हर सौ रुपये में से 40 रुपये सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और पेंशन पर खर्च करती है और 14 रुपये उधारी में चुकाती है। पंजाब का हाल उससे भी बुरा है। पांच साल पहले पंजाब का कुल कर्ज 1.82 लाख करोड़ था, जो अब 2.82 लाख करोड़ हो चुका है। पंजाब सरकार का पिछले वर्ष का कुल राजस्व 69 हजार करोड़ से भी कम है, जिसका 40 प्रतिशत यानी हर सौ रुपये में से 40 रुपया कर्ज का ब्याज चुकाने और कर्ज चुकाने में खर्च किया जाएगा। 56.5 प्रतिशत वेतन, पेंशन और भत्तों पर खर्च होगा, जो कुल राजस्व के लगभग बराबर हो जाता है। ऐसी आर्थिक दशा में उत्तर प्रदेश और खासकर पंजाब में चुनाव लडऩे वाले यदि लाखों नई सरकारी नौकरियां देने के वादे करते हैं तो आप स्वयं तय कर सकते हैं कि वे क्या कर रहे हैं?

आप पूछ सकते हैं कि सामाजिक न्याय और विकास के लिए कर्ज लेकर सरकार चलाने में हर्ज ही क्या है? हर विकासोन्मुख देश को यही करना पड़ता है। यह संभव है, बशर्ते दो बातों का ध्यान रखा जाए। पहली यह कि कर्ज के सालाना ब्याज और भुगतान की किस्त राजस्व के एक तिहाई से ऊपर न जाने पाए। दूसरी यह कि ब्याज और कर्ज का भुगतान वक्त पर होता रहे। वर्ना कर्ज की किस्त ऊपर जाने से सरकार चलाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं बचेगा। उत्तर प्रदेश तो नहीं, परंतु पंजाब सरकार अब खतरे के बिंदु की ओर बढ़ रही है।

सरकारी सेवाओं का लचर स्तर

हमारे चुनावी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि बुनियादी मुद्दे चुनावों में नहीं उठाए जाते। आज से 40 साल पहले लगभग हर शहर की नगरपालिका के नलों का पानी पीने लायक होता था, लेकिन आज हर किसी को आरओ लगाना पड़ता है। इसी तरह सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी दयनीय कर दी गई है कि हर कोई कर्ज लेकर भी बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को प्राइवेट स्कूलों के अध्यापकों से कई गुना वेतन, छुट्टियां और सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन क्या वे प्राइवेट स्कूलों के अध्यापकों से कई गुना बेहतर शिक्षा देते हैं? यही हाल डिस्पेंसरियों, अस्पतालों और सफाई संस्थानों का है। क्या कोई उन्हें सुधारने की समयबद्ध योजना की बात करता है? क्या कोई बाबुओं और नौकरों की फौज पैदा करने वाली बेकार शिक्षा प्रणाली को सुधारने, निजी कारोबारों और रोजगार देने वाले उद्यमों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की बात करता है? कभी सोचा है, क्यों नहीं? क्योंकि चुनाव एक निवेश बन गया है।

पार्टियां और उम्मीदवार विकास करने, समतामूलक समाज बनाने और जाति, मजहब और वर्गों के आधार पर चले आ रहे विभाजन को पाटने के बजाय लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसाने, असुरक्षा की भावना पैदा करने और अपना निवेश वसूल करने की जुगत में रहते हैं। जिसे लोकतंत्र का पर्व होना चाहिए, वह लोकतंत्र का कालाबाजार बनता जा रहा है। जिसे यह सब बेनकाब करना था, वह स्वयं इसका भागीदार बन चुका है। विडंबना यह है कि इसके कर्णधार और शिकार दोनों हम ही हैं।

(लेखक बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व संपादक हैं)

Edited By: Pranav Sirohi