मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

[अवधेश कुमार]। Karnataka political Crisis कर्नाटक का पूरा राजनीतिक दृश्य दुर्भाग्यपूर्ण है, किंतु इसे किसी भी दृष्टि से अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। भाजपा विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उस पर यह आरोप लगाना आसान है कि वह कांग्रेस एवं जद एस की गठबंधन सरकार के पतन तथा अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा भी है कि हम संन्यासी नहीं हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अगर अवसर मिलता है तो वो सरकार बनाने की कोशिश करेंगे। बावजूद इसके यदि यह मान लिया जाए कि सबकुछ भाजपा का किया धरा है तो फिर हमें यह भी मानना पड़ेगा कि कांग्रेस एवं जद एस की दोस्ती हर स्तर पर आदर्श है, उनके बीच किसी तरह का मतभेद नहीं, गठबंधन तथा दोनों पार्टियों के अंदर नेतृत्व के खिलाफ असंतोष है ही नहीं।

कोई भी निष्पक्ष विश्लेषक इसे स्वीकार नहीं कर सकता। जरा सोचिए मई 2018 के चुनाव परिणाम से अब तक तीन बार अपने विधायकों को कब्जे में रखने की नौबत आई, चार ऐसे अवसर आए जिससे सरकार की अस्थिरता प्रमाणित हुई तथा गठबंधन के नेताओं ने तो न जाने खुलकर कितनी बार असंतोष विद्रोही स्वर में प्रकट किया।

वास्तव में जिस परिस्थिति में कुमारस्वामी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी उसमें ही असंतोष, विद्रोह, अभद्रता, अस्थिरता आदि के बीज निहित थे। विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 104 सीटें प्राप्त हुई थीं जो बहुमत से नौ कम थी। कांग्रेस की सीटें 122 से घटकर 78 रह गई तथा जद एस को 36 सीटें मिली, जो

बाद में 37 हुई। चूंकि कांग्रेस की सरकार को जनता ने पराजित कर दिया था इसलिए बड़ा दल होने के नाते भाजपा के नेता येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और 17 मई 2018 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन उन्हें बहुमत नहीं मिला और त्यागपत्र देना पड़ा जिसके बाद विपक्षी एकता के बूते कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने।

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि भाजपा की नजर सत्ता पर होगी और वह इनके अंतर्विरोध का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। राजनीति में किसी एक दल या गठबंधन से शुचिता के पालन की उम्मीद बेमानी है। किंतु इसे भाजपा द्वारा पैदा किया गया संकट नहीं कहा जा सकता है। अगर ऐसा ही होता तो इसी वर्ष जनवरी में भाजपा को अपने सारे विधायकों को गुरुग्राम के पास एक रिसॉर्ट में नहीं रखना पड़ता। सिद्धारमैया एवं उनके समर्थक न कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, न ही कांग्रेस के जी परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री। इस कारण पहले दिन से गठबंधन के अंदर छेद करने की कोशिश होने लगी। सबसे पहले तो सिद्धारमैया इस पर अड़ गए कि उन्होंने फरवरी में जो बजट पेश किया था उसे ही रहने दिया जाए। यह विचित्र स्थिति थी।

चुनाव के पूर्व अंतरिम बजट पेश होता है और नई सरकार पूर्ण बजट पेश करती है। कोई मुख्यमंत्री बन जाए और उसे अपना बजट पेश करने न दिया जाए तो उस पर क्या गुजरेगी? खैर किसी तरह कुमारस्वामी सरकार को बजट पेश करने का अवसर मिला। सरकार बने एक महीना भी नहीं हुआ था कि बेंगलुरु में अपनी पार्टी के अधिवेशन में सात जून 2018 को कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के खिलाफ सोची-समझी दुष्प्रचार से कांग्रेस ने उन्हें अनेक सीटों पर पराजित कराया जिससे भाजपा को अधिक सीटें मिल गईं। उसके एक दिन पहले उनके पुत्र निखिल कुमारस्वामी ने पार्टी नेताओंकार्यकर्ताओं को मध्यावधि चुनाव की तैयारी शुरू करने का आह्वान कर दिया।

15 जुलाई 2018 को आयोजित एक अभिनंदन समारोह में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कह दिया कि वह मुख्यमंत्री पद पर खुश नहीं हैं और भगवान शिव की तरह जहर पी रहे हैं। क्या कांग्रेस जद एस सरकार के बीच जारी अंदरूनी टकराव का इससे बड़ा प्रमाण कोई हो सकता है? कुमारस्वामी को अपने अनुसार अधिकारी

तक के तबादलों और नियुक्तियों से रोका गया। मंत्रिमंडल के गठन में समस्याएं, कांग्रेस के विधायकों का विद्रोह, इनका सिद्धारमैया के पास जाना, स्थानीय मीडिया में दिए जा रहे बयान आदि सारी कवायदों को याद करिए और निष्कर्ष निकालिए।

जनवरी माह में सात विधायकों का विद्रोह अवश्य चर्चा में बना, क्योंकि वह ज्यादा प्रखर था। सिद्धारमैया एक समानांतर सरकार चलाते रहे। जनवरी के विद्रोह को राहुल गांधी के हस्तक्षेप से शांत किया गया। कुमारस्वामी को कहा गया कि आप सभी विधायकों से बात करिए। दलबदल के डर से पार्टी विधायक दल की बैठक में असंतुष्ट विधायक आ गए। लगा कि सब शांत हो गया, लेकिन 30 जनवरी को सिद्धारमैया ने बयान दिया कि जद एस गठबंधन धर्म नहीं निभा रहा है। उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात की और देवेगौड़ा पिता-पुत्र पर कई प्रकार के आरोप लगाते हुए गठबंधन तोड़ देने का अनुरोध किया। यह अलग बात है कि केंद्र की नीति साथ लोकसभा चुनाव लड़ने की थी। सिद्धारमैया ने विधायकों को कहा कि लोकसभा चुनाव तक शांत रहें। इसी समय कुमारस्वामी ने फिर कहा कि उन्हें कांग्रेस के दबाव में काम करना पड़ रहा है। एचडी देवेगौड़ा की नजर भी लोकसभा चुनाव पर थी, लेकिन इस चुनाव में दोनों पार्टियां साफ हो गईं। आज कांग्रेस की जो दुर्दशा है उसमें विधायकों को लग रहा है कि इस पार्टी में अपना भविष्य नहीं है। इस बार 13 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से ही त्यागपत्र दे दिया तो यह बड़ी बात है।

निर्दलीय विधायक नागेश ने पहले भी कहा था कि उनके साथ जबरदस्ती की गई। जद एस के अध्यक्ष ए एच विश्वनाथ ने क्यों इस्तीफा दिया? उन्होंने भी कई आरोप लगाए हैं। तीन विधायकों ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर दी तो चार ने परमेश्वर को हटाने की। इस तरह पूरी समस्या अंदरूनी, अंतर्निहित और कुटिल व्यवहारों से पैदा की गई है। सारे मंत्रियों का त्यागपत्र लेकर कितने को संतुष्ट कर पाएंगे? अगर कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री होगा तो उसके खिलाफ भी ऐसे विद्रोह होगा। कर्नाटक की राजनीति किस करवट बैठेगी इसका आकलन भले कठिन हो, पर कांग्रेस-जद एस गठबंधन सरकार का कार्यकाल पूरा करना संभव नहीं है। हो सकता है आने वाले समय में और इस्तीफे हों, आगे कांग्रेस के अंदर से एक क्षेत्रीय पार्टी भी खड़ी हो जाए। हो यह भी सकता है कि अगर भाजपा को सरकार बनाने में सफलता मिली तो इस्तीफों की संख्या तेजी से बढ़ेगी।

[वरिष्ठ पत्रकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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