[ राजीव सचान ]: इससे इन्कार नहीं कि 2016 में गुमनाम से हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी ने पैगंबर साहब को लेकर अपने एक बेजा बयान से मुस्लिम समाज को उद्वेलित करने का काम किया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि उनका एक तरह से एलानिया कत्ल कर दिया जाता। दुर्भाग्य से ऐसा ही किया गया और वह भी तब जब उन्हें अपने उक्त बयान के कारण करीब एक साल तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में रहना पड़ा। कमलेश की गिरफ्तारी के बाद भी उन्हें जान से मारने की धमकियां दी गईं और उन्हें फांसी की सजा देने की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किए गए।

कमलेश तिवारी का सिर कलम करने वाले को डेढ़ करोड़

मालदा, पश्चिम बंगाल में हुए ऐसे ही प्रदर्शन में एक पुलिस थाने समेत कई वाहन जला दिए गए थे। इसके अलावा बिजनौर के एक मौलाना और एक मुफ्ती ने कमलेश तिवारी का सिर कलम करने वाले को डेढ़ करोड़ रुपये का इनाम देने का एलान किया था। इस पैसे के साथ सोने का एक मुकुट भी देने की पेशकश की गई थी। अगर कोई यह सोच रहा है कि इसके बाद इस मौलाना और मुफ्ती को गिरफ्तार कर लिया गया होगा तो वह गलत है। इन दोनों को गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन बीते दिनों तब जब कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई। इसका सीधा-सरल मतलब यही निकला कि करीब तीन साल तक किसी ने यह नहीं समझा कि इस तरह किसी के सिर इनाम रखने से कानून के शासन की हेठी होती है और उसका मजाक भी उड़ता है। कहना कठिन है कि इस मुफ्ती और मौलाना का कमलेश तिवारी की हत्या से कोई लेना-देना है या नहीं, लेकिन सभ्य समाज के लिए इससे बुरी बात और कोई नहीं कि कोई किसी का सिर काटने की जरूरत जताए और फिर भी उसका बाल बांका न हो।

धमकियां देने वालों के खिलाफ कारगर कार्रवाई नही होती

यह पहली बार नहीं जब किसी ने किसी के सिर पर इस तरह इनाम रखा हो। अपने देश में इस तरह का काम होता ही रहता है और मुश्किल से ही ऐसे लोगों पर कोई कारगर कार्रवाई होती है। रह-रहकर जिस-तिस का सिर, जीभ, नाक काटने की धमकी देना इतना आम हो चला है कि इस पर भरोसा करना कठिन है कि देश में कानून का राज है। ऐसी धमकियां देने वालों के खिलाफ कभी-कभार कार्रवाई होती भी है, लेकिन आम तौर पर वह इतनी मामूली किस्म की होती है कि ऐसे लोगों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उलटे वे और चर्चित हो जाते हैैं। सूरजपाल अम्मू और अकबरुद्दीन ओवैसी इसके सटीक उदाहरण हैैं।

हाजी याकूब ने लोकसभा चुनाव लड़ा और दूसरे नंबर पर रहे

कमलेश तिवारी की हत्या के बाद खुद को शिवसेना नेता बताने वाले अरुण पाठक ने उनके हत्यारों को मारने वालों को एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की है। 2006 में बसपा नेता हाजी याकूब कुरैशी ने पैगंबर साहब के कार्टून बनाने वाले डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सिर पर 51 करोड़ रुपये का इनाम रखा था। इसके बाद इन्हीं हाजी जी ने फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली आब्दो के दफ्तर में हुए आतंकी हमले को जायज ठहराया। हाजी याकूब को कोई चाहे जिस नजर से देखे, यह जानना ज्यादा जरूरी है कि बीते लोकसभा चुनाव में हापुड़-मेरठ निर्वाचन क्षेत्र में वह दूसरे नंबर पर रहे थे और उन्हें पांच लाख से अधिक वोट मिले थे।

पैगंबर साहब के खिलाफ सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणियां

कमलेश तिवारी की हत्या को चाहे जैसी घटना के तौर पर व्याख्यायित किया जाए, लेकिन हिंदू समाज पार्टी के दफ्तर में उनके कत्ल और शार्ली आब्दो दफ्तर में हुए आतंकी हमले में ज्यादा अंतर नहीं। उस हमले के जरिये भी यही रेखांकित किया गया था कि पैगंबर साहब की शान में गुस्ताखी करने वाले जिंदा नहीं बचेंगे और कमलेश तिवारी की हत्या से भी यही जाहिर किया गया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इन दिनों वह तबका खामोश है जो लिबरल-सेक्युलर के तौर पर जाना जाता है। इस तबके को इस पर उचित ही आपत्ति है कि कमलेश तिवारी की हत्या के बाद पैगंबर साहब के खिलाफ सोशल मीडिया में अभद्र टिप्पणियां की गईं।

अभद्र टिप्पणियों के जवाब में शांति का उपदेश

ये टिप्पणियां वाकई शर्मनाक और माहौल दूषित करने वाली थीं और उनके खिलाफ आवाज उठनी ही चाहिए, लेकिन आवाज उनके खिलाफ भी तो उठनी चाहिए जो कमलेश तिवारी की हत्या का जश्न मनाने या फिर हत्या को जायज ठहराने में लगे हुए थे। यह देखना दयनीय रहा कि जश्न मनाने वालों ने पैगंबर साहब के खिलाफ अभद्र टिप्पणियों के जवाब में जब शांति का उपदेश देना शुरू किया तो कहीं दुबका पड़ा सेक्युलर-लिबरल तबका तत्काल उनके साथ आ खड़ा हुआ।

कथनी-करनी के कारण जान गंवानी पड़ी

कमलेश तिवारी पहले ऐसे शख्स नहीं जिन्हें अपनी कथनी-करनी के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी हो। गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी के साथ भी यही हुआ था। माना जाता है कि गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी के हिंदुत्व विरोधी विचारों से चिढ़े लोगों ने उनकी हत्या की। विडंबना यह है कि जिन लोगों के लिए गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी की हत्या गंभीर बात थी उनके लिए कमलेश तिवारी की हत्या कुछ भी नहीं। गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद जो बुद्धिजीवी तबका असहिष्णुता के खतरे को बयान करने की होड़ में लिप्त था वह अब मौन साधे हुए है।

आखिर वे अब क्यों नहीं बोलते?

कमलेश तिवारी की हत्या से आक्रोशित लोग इस मौन का जिक्र करते हुए यह सवाल पूछ रहे हैैं कि आखिर वे अब कुछ क्यों नहीं बोलते? यह सवाल ही व्यर्थ है। आखिर जो अपने दोहरेपन के लिए कुख्यात हैैं उनसे यह प्रमाण पत्र लेने की कोशिश क्यों की जा रही है कि कमलेश तिवारी की हत्या खौफ पैदा करने वाला एक जघन्य कृत्य है? इस तबके की ओर से नीर-क्षीर विवेक का परिचय देने की अपेक्षा एक तरह की मृग मरीचिका ही है।

कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जाए

खुद के सीने पर लिबरल-सेक्लुयर होने का बिल्ला लगाए इस तबके से कोई उम्मीद नही रखी जानी चाहिए, लेकिन जिन पर कानून का शासन बनाए रखने की जिम्मेदारी है उन्हें तो यह सुनिश्चित करना ही चाहिए कि कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जाए। अभी ऐसा नहीं किया जा रहा है। इसका पता भीड़ की हिंसा वाली घटनाओं से भी चलता है। अगर कानून हाथ में लेने वाले हर तरह के तत्वों अथवा अपने बयानों और कृत्यों से कानून को नीचा दिखाने वालों के खिलाफ समय रहते कठोर कार्रवाई हो रही होती तो शायद कमलेश तिवारी की जान नहीं जाती।

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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