जनधन योजना की सोच है कि देश के हर नागरिक की पहुंच बैंक तक होनी चाहिए ताकि आवश्यकता पडऩे पर वह बैंक से ऋण ले सके और उसे साहूकार के पास न जाना पड़े। वैसे भी आधुनिक युग के तौर-तरीकों की हर नागरिक को जानकारी होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री के इस मंतव्य के लिए साधुवाद। लेकिन किसी भी परियोजना का प्रभाव परिदृश्य पर निर्भर करता है। कमजोर व्यक्ति को घी पिला दिया जाए तो उसे अपच हो जाता है। पहलवान व्यक्ति को घी पिलाया जाए तो वह ताकतवर हो जाता है। घी वही है। परिदृश्य बदलने से उसका प्रभाव बदल जाता है।

ब्रिटिश हुकूमत ने हमारे देश में रेल लाइनों का जाल बिछाया। रेल के माध्यम से देश की लकड़ी तथा कपास को बंदरगाहों तक ले जाया गया। वहां से इन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया। इन्हीं रेल लाइन के रास्ते इंग्लैंड से कपड़े को लाकर भारत के शहरों तक पहुंचाया गया, लेकिन हम गरीब होते गए, क्योंकि परिदृश्य हमारे विपरीत था। ब्रिटिश हुकूमत ने ऐसी नीतियां बना रखी थीं कि हमारे किसान को कपास के दाम कम मिले, जबकि उपभोक्ता को इंग्लैंड में बने कपड़ों को महंगा खरीदना पड़ा। रेल तक पहुंच पाना हमारे किसानों तथा छोटे शहरों के लिए अभिशाप हो गया। इसका दोष रेल को नहीं, बल्कि उस समय के आर्थिक परिदृश्य को जाता है। रेल तक वही पहुंच हमारे छोटे शहरों के लिए आज लाभप्रद है। लोग रेल से नौकरी के लिए मुंबई जा सकते हैं। रेल से टेलीविजन और बाइक गांव तक पहुंच रही है।

जनधन योजना का प्रभाव भी परिदृश्य पर निर्भर करेगा। आज हमारी बैंकिंग व्यवस्था गांव की पूंजी को शहर तक पहुंचा रही है। उदाहरण के लिए पंजाब के ग्रामीण बैंकों का क्रेडिट-डिपाजिट अनुपात 61 है, जबकि चंडीगढ़ का 106 रुपये है। मान लीजिए ग्रामीण शाखा में 100 रुपये का फिक्स डिपाजिट कराया गया। रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंक के लिए अनिवार्य है कि इसमें से 27 रुपये को सरकारी बांड में जमा कराया जाए। बैंक के पास बचे 73 रुपये। इसमें 61 रुपये बैंक ने ग्रामीण क्षेत्रों को लोन दिए। इसलिए क्रेडिट डिपाजिट अनुपात 61 हुआ। 100 के डिपाजिट पर बैंक ने 61 रुपये की क्रेडिट दी। शेष 12 रुपये बैंक ने अपने मुख्यालय को भेज दिए। उसी बैंक की चंडीगढ़ की शाखा की कहानी बिल्कुल अलग है। यहां किसी नागरिक ने 100 रुपये का फिक्स डिपाजिट कराया। इसमें से 27 रुपये को बैंक द्वारा सरकारी बांड में जमा कराया गया। बचे 73 रुपये। बैंक ने मुख्यालय से 33 रुपये मंगवाए और लोन दिए 106 रुपये के। चंडीगढ़ का क्रेडिट डिपाजिट अनुपात हुआ 106। इस प्रकार गांव में जमा रकम को बैंकों द्वारा शहर पहुंचाया जा रहा है। इस कृत्य में बैंक दोषी नहीं हैं। यदि गांव में लोन लेने वाले ज्यादा होते तो बैंकों द्वारा शहर में डिपाजिट लेकर गांव में लोन दिए जाते।

पूंजी के इस ट्रांसफर में जनधन योजना मोबिल आयल का काम करेगी। वर्तमान में तमाम ग्रामवासी अपनी पूंजी से सोना चांदी खरीद कर रख लेते हैं अथवा बक्से में नगद रख देते हैं। यह पूंजी शहर नहीं पहुंच पाती है। जनधन योजना के माध्यम से ग्रामवासी अपनी बचत को बैंक में जमा करेंगे जिससे इस पूंजी को चंडीगढ़ पहुंचाया जा सके और देश के आर्थिक विकास को गति मिले। प्रलोभन के रूप में खाता धारकों को फ्री बीमा उपलब्ध कराया गया है। मृत्यु पर 30,000 रुपये और दुर्घटना पर एक लाख का मुआवजा मिलेगा। लेकिन यह सुविधा केवल परिवार के कमाने वाले तक ही सीमित है। इसके अलावा यह सुविधा केवल पांच वर्षों तक ही मिलेगी।

संभवत: सरकार की सोच है कि 5 वर्षों में लोगों को बैंक में पूंजी जमा कराने की आदत पड़ जाएगी। इसके बाद इंश्योरेंस का प्रलोभन देना जरूरी नहीं रहेगा। दूसरा प्रलोभन ओवर ड्राफ्ट का है। खाता धारक 5,000 रुपये तक का ऋण ले सकता है यदि उसके खाते में लगातार लेन-देन किया जा रहा है। संभवत: सरकार की सोच है कि लगातार लेन-देन से ज्यादा पूंजी जमा होगी और ओवर ड्राफ्ट से कम मात्रा में पूंजी दी जाएगी। आज तमाम कंपनियां नए उत्पाद को बाजार में प्रवेश कराने के लिए मुफ्त ऑफर लेकर आती हैं। इसी प्रकार लोगों का बैंकों में प्रवेश कराने के लिए सरकार ने बीमा तथा ओवर ड्राफ्ट का ऑफर दिया है। इन प्रलोभनों से जनधन योजना के मूल चरित्र में परिवर्तन नहीं होता है। मूल उद्देश्य गांव की पूंजी को शहर में भेजना है ताकि इसका उपयोग शहरी उद्योगों में हो सके।

जनधन योजना का उद्देश्य गांव में दिए गए लोन की मात्रा में वृद्धि हासिल करना नहीं है। सरकार चाहती तो ग्रामीण युवाओं को मोबाइल रिपेयरिंग शाप खोलने, ट्रैक्टर, इंटरनेट कैफे इत्यादि खोलने के लिए लोन देने की योजना बनाती जिससे ग्रामीणों का अपना विकास होता और उनकी पूंजी उनके ही घर में इस्तेमाल होती, परंतु सरकार ने ऐसा नहीं किया है। गांव में लोन लेने वाले लोग नहीं हैं, जबकि शहर में लोन लेने वालों की लाइन लगी है। इस बहाव को शहर से गांव अथवा अमीर से गरीब की ओर पलटने के लिए जरूरी है कि गांव में उद्योग लगाने की संभावना बढ़े। ऐसे में गांव में लोन लेने की मांग बढ़ेगी। दुर्भाग्यवश हमारी आर्थिक नीतियां गांव एवं छोटे उद्योगों के विकास के विपरीत हैं। सरकार भारत को 'विकसित' देश बनाना चाहती है। विकसित देशों के मॉडल को अपनाते हुए आटोमैटिक मशीनों से उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। 'मेक इन इंडिया' का केंद्र आधुनिक तकनीक ही है, न कि रोजगार का सृजन। आज बड़ी कंपनियों द्वारा ब्रेड और साबुन बनाए जा रहे हैं। कुछ समय पहले छोटे उद्यमों द्वारा इनका उत्पादन किया जाता था। ये छोटे उद्यम बैंकों से लोन लेते थे। परंतु पिछले दो दशक में ये लगभग शून्यप्राय हो गए हैं। इसलिए बैंकों द्वारा गांव में लोन कम दिए जा रहे हैं। इसके फलस्वरूप ग्रामीण बैंकों का क्रेडिट डिपाजिट रेशियो न्यून है।

जनधन योजना के बारे में इन बातों को कहने का मेरा उद्देश्य इसकी भत्र्सना करने का नहीं है। रेल लाइन की भत्र्सना का कोई औचित्य नहीं है। मेरा उद्देश्य इसमें निहित अदृश्य परिणामों पर प्रकाश डालने का है। वास्तव में मूल परिदृश्य को ठीक करना चाहिए। गरीब, ग्रामीण और छोटे शहरों में उद्यमों को बढ़ावा देने की ठोस नीति बनानी होगी। उसके बाद ही जनधन योजना का सार्थक दृश्य हासिल होगा।

[लेखक डॉ. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

Posted By: Bhupendra Singh