[ कृपाशंकर चौबे ]: पांच भाषाओं-कश्मीरी, डोगरी, उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी को जम्मू-कश्मीर की राजभाषा बनाने के निर्णय से वस्तुत: वहां की जनसंख्या का समावेशी संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट हुआ है। इन पांच भाषाओं को जम्मू-कश्मीर की राजभाषा बनाने के लिए संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक पारित किए जाने के साथ ही अब तक उपेक्षित रहीं कश्मीरी और डोगरी जैसी भाषाओं को पहली बार न्याय मिल सकेगा। जम्मू-कश्मीर की आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन व्यवहार में इन भाषाओं को बरतता है, इन्हें राजभाषा बनाने से उन्हें अहसास होगा कि शासन में उनकी भी भागीदारी है। प्रसंगवश राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी भारतीय भाषाओं को यथेष्ठ महत्व दिया गया है। कश्मीरी जम्मू-कश्मीर की वैदिक संस्कृत की पृष्ठभूमि रही है और वह आर्य भाषा परिवार की समृद्ध भाषा है, किंतु उसके साथ हुए अन्याय का इतिहास सदियों पुराना है।

14वीं शताब्दी में कश्मीर में फारसी राजभाषा घोषित की गई थी 

14वीं शताब्दी में कश्मीर में मुस्लिम शासन कायम होने के साथ ही फारसी राजभाषा घोषित की गई थी। उसके पहले कश्मीरी शारदा लिपि में लिखी जाती थी। आजादी के बाद भी कश्मीरी भाषा के प्रति अन्याय नहीं दूर हुआ। स्वतंत्र भारत में भी कश्मीरी की पारंपरिक शारदा लिपि की जगह फारसी-अरबी लिपि नस्तालीक कश्मीरी की आधिकारिक लिपि बनाई गई, किंतु जो कश्मीरी अरबी-फारसी लिपि से अनभिज्ञ थे, उन्होंने देवनागरी का प्रयोग करना जारी रखा। जम्मू-कश्मीर के निर्वासित लेखकों ने कश्मीरी भाषा के लिए नस्तालीक लिपि के साथ ही देवनागरी को भी आधिकारिक लिपि की मान्यता दिए जाने की मांग की है। इस मांग पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में कश्मीरी के वरिष्ठ साहित्यकार शशिशेखर तोषखानी, रतनलाल शांत, क्षमा कौल और अग्निशेखर आदि बुद्धिजीवी शामिल हैं। यह कोई नई मांग नहीं है।

दशकों से कश्मीरी की आधिकारिक लिपि देवनागरी को करने की मांग होती रही

लाखों कश्मीरी दशकों से कश्मीरी की आधिकारिक लिपि देवनागरी को करने की मांग करते रहे हैं। उनकी मांग के पीछे ठोस आधार है। वस्तुत: अधिकतर कश्मीरीभाषी नस्तालीक लिपि नहीं जानते। वे देवनागरी जानते हैं और कश्मीरी के अनेक लेखक देवनागरी में ही लिख रहे हैं। डोगरी के अधिकांश लेखक भी देवनागरी में ही लिखते हैं। डोगरी की मूल लिपि टाकरी रही है, जो आज लगभग इतिहास हो चुकी है।

लंबा संघर्ष करने के बाद डोगरी को मिला राजभाषा का दर्जा 

कश्मीरी की तरह डोगरी के साथ भी हर स्तर पर अन्याय हुआ। जम्मू संभाग के 10 जिलों में करीब 60 लाख डोगरीभाषी नागरिक रहते हैं। उनके 12 वर्ष निरंतर संघर्ष करने के बाद 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में डोगरी को शामिल किया था, परंतु अब जाकर डोगरी को राजभाषा बनाने के निर्णय से उस भाषा को समुचित प्रतिष्ठा मिली है।

उर्दू को भी देवनागरी में लिखने पर बहस हो रही

दिलचस्प है कि उर्दू को भी देवनागरी में लिखने पर बहस हो रही है। कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ तथा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री लगातार अपने वक्तव्यों में कहते रहे हैं कि कश्मीर घाटी में जिस भाषा में लोग बातचीत करते हैं, वह हिंदी है। अत: उनके साहित्य को भी देवनागरी में लिखने पर विचार करना चाहिए। उर्दू, कश्मीरी, डोगरी को देवनागरी में लिखने पर बहस तो आज हो रही है, इसकी स्वीकार्यता, वैज्ञानिकता और व्यापकता बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही जस्टिस शारदा चरण मित्र जैसे मनीषी ने महसूस कर ली थी।

भारतीय भाषाओं के लिए एक लिपि

उन्होंने भारतीय भाषाओं के लिए एक लिपि को सामान्य लिपि के रूप में प्रचलित करने के उद्देश्य से 1905 में एक लिपि विस्तार परिषद की स्थापना की और 1907 में ‘देवनागर’ नामक पत्रिका निकाली थी। वह मासिक पत्रिका जस्टिस मित्र के मृत्युपर्यंत यानी 1917 तक निकलती रही। ‘देवनागर’ के प्रवेशांक में उसके उद्देश्यों के बारे में इस तरह प्रकाश डाला गया था, ‘इस पत्र का मुख्य उद्देश्य है भारत में एक लिपि का प्रचार बढ़ाना और वह एक लिपि देवनागराक्षर है।’ ‘देवनागर’ में बांग्ला, उर्दू, नेपाली, उड़िया, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, मलयालम और पंजाबी आदि की रचनाएं देवनागरी लिपि में लिप्यांतरित होकर छपती थीं।

हिंदी को कश्मीर की राजभाषा बनाने की पहल ऐतिहासिक 

पिछले 131 वर्षों से उर्दू जम्मू-कश्मीर की एकमात्र राजभाषा थी। वहीं राज्य में अब तक केवल उर्दू के राजभाषा होने से उर्दू नहीं जानने वाले लाखों लोग अदालतों-सरकारी दफ्तरों तक में असहाय महसूस करते थे। अब वे कागजात आधिकारिक पांचों भाषाओं में रहेंगे और उम्मीद है कि कश्मीरी और डोगरी सहित पूरे प्रदेश को एक सूत्र में पिरोने का काम हिंदी कर सकेगी। इस दृष्टि से हिंदी को भी कश्मीर की राजभाषा बनाने की पहल ऐतिहासिक है।

हिंदी के तद्भव-तत्सम शब्द कश्मीरी भाषा से भिन्न नहीं

कश्मीर और हिंदी का संबंध सदियों पुराना है। कश्मीर में हिंदी के प्रचलन और प्रभाव का आरंभिक श्रेय काशी के पुराने आचार्यों को, तदनंतर भारतीय साधु संत समाज और तत्पश्चात हिंदी भाषी पर्यटकों को है। सैकड़ों वर्षों से हिंदी यदि कश्मीर में प्रचलित है तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि हिंदी समझना या सीखना आम कश्मीरी के लिए आसान रहा है। हिंदी के तद्भव-तत्सम शब्द कश्मीरी भाषा से भिन्न नहीं हैं।

महाराजा रणवीर सिंह ने हिंदी और डोगरी भाषा में देवनागरी लिपि द्वारा अपना राजकाज चलाया

कश्मीर के जनमानस में हिंदी इतना स्थान बना चुकी थी कि आगे चलकर वहां की राजकाज की भाषा हो गई। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तर काल में महाराजा रणवीर सिंह ने हिंदी और डोगरी भाषा में देवनागरी लिपि द्वारा अपना सारा राजकाज चलाया। संस्कृत के ग्रंथों का भी हिंदी में अनुवाद काशी के आचार्यों से करवाया।

अब राजभाषा का दर्जा मिलने से हिंदी जम्मू-कश्मीर में और फले-फूलेगी

महाराजा प्रताप सिंह के शासनकाल में उर्दू-फारसी पढ़े हुए मंत्रियों ने अपनी सुविधा के लिए हिंदी-डोगरी को पदच्युत करके उर्दू-फारसी को ही राज्य कार्यवाही के लिए प्रचलित किया, लेकिन जनमानस में हिंदी की प्रतिष्ठा बनी रही। कश्मीर के जनमानस में हिंदी की प्रतिष्ठा को देखते हुए कश्मीरी भाषा के लेखक भी हिंदी में रचनाएं करने लगे। उम्मीद है अब राजभाषा का दर्जा मिलने से हिंदी जम्मू-कश्मीर में और फले-फूलेगी।

( लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं )

[ लेखक के निजी विचार हैं ]

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