[ बैजयंत जय पांडा ]: कुछ दिन पहले मुंबई में एक आर्थिक जलसा हुआ। वहां देश के एक जानेमाने उद्योगपति ने गृहमंत्री अमित शाह से देश में कथित तौर पर डर के माहौल को लेकर सवाल किया। उनका यह सवाल पूछना था कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में इस मसले पर तूफान खड़ा हो गया। उसके केंद्र में वही मसला था कि मौजूदा मोदी सरकार के दौर में देश में कथित तौर पर खौफ का माहौल पसरा हुआ है जहां सरकार को किसी भी सूरत में अपनी आलोचना स्वीकार्य नहीं। इस वाकये और बीते पांच वर्षों के दौरान इससे मिलते-जुलते मामलों के बीच एक खास पहलू देखने को मिला और वह यह कि जब भी ऐसे सवाल किए गए तब सैकड़ों लोग इसके साक्षी रहे। तमाम लोगों के बीच पूछे गए इन सवालों को देश-विदेश में टेलीविजन प्रसारण के दौरान लाखों-करोड़ों दर्शकों ने देखा भी। वास्तव में गाहे-बगाहे ऐसे आरोप बेहद आम रहे हैं जिन पर मीडिया मुख्य रूप से टीवी परिचर्चाओं, अखबारी स्तंभों, साहित्यिक आयोजनों, आर्थिक सम्मेलनों एवं संगोष्ठियों में खासी चर्चा हुई।

देश में खौफ का माहौल

जिन देशों में तानाशाह सरकारें होती हैं वहां कभी ऐसे सवाल नहीं किए जा सकते। ऐसे देशों या सरकारों में जहां लोग वाकई डरे होते हैं वहां ऐसी बातें चोरी-छिपे दबे स्वरों में और अमूमन बंद दरवाजों के भीतर होती हैं। वहां अक्सर छोटे-छोटे समूह ही ऐसी चर्चा करते हैं। वे खुलेआम मुखर होकर अपनी आवाज नहीं उठाते। मीडिया और यहां तक कि किसी सम्मेलन के मंच से तो ऐसी बातें उठाने का सवाल ही नहीं उठता।

आपातकाल के दौरान तानाशाह-अधिनायक वादी सरकार

भारत में आखिर कब ऐसी तानाशाह-अधिनायक वादी सरकार रही है? यदि इस सवाल का जवाब ढूंढ़ेंगे तब आपकी तलाश आपातकाल के दौर पर जाकर ठहरेगी। उसी खौफनाक दौर में ऐसे डर की अभिव्यक्ति हो सकती थी। तब भयाक्रांत लोग मीडिया में या सार्वजनिक तौर पर नहीं, बल्कि निजी बातचीत में ही ऐसी भावनाएं व्यक्त करते थे। तब मीडिया पर भी सरकारी सेंसर की तलवार लटकी हुई थी।

लोगों को परिवार की सुरक्षा ज्यादा परेशान करती

मौजूदा भारत सरकार के बारे में ऐसी बातें कहना न केवल अतिशयोक्ति होगी, बल्कि यह वास्तविकता को अपनी सुविधानुसार तोड़ने-मरोड़ने का मामला अधिक प्रतीत होता है, फिर भी जो लोग ऐसे डर की बात कर रहे हैं उसे समझना एवं उसकी पड़ताल करना बहुत जरूरी है। सबसे पहली बात तो यह कि यह पूरी तरह से शहरी कुलीन वर्ग के दिमाग की उपज है। अगर आप इन कुलीन बस्तियों से दूर निकलकर आम लोगों की तरफ जाएंगे तो ऐसे सुर नहीं सुनाई पड़ेंगे। ऐसा नहीं है कि आम लोगों की बड़ी आबादी वाली इन बस्तियों में किसी तरह का कोई खतरा महसूस नहीं होता। यहां असल में लोगों को सुरक्षा खासतौर से परिवार की बच्चियों और महिलाओं की परवाह ज्यादा परेशान करती है कि रात में अकेले चलने पर वे किसी मुसीबत में न पड़ जाएं। उनकी सुरक्षा उनके लिए गंभीर चिंता का विषय है।

शहरी कुलीन वर्ग के अनसुलझे सवाल

इसके उलट अगर उनसे मोदी सरकार को लेकर किसी सामान्य डर की बात को लेकर सवाल किया जाएगा तो जवाब यकीनन ‘नहीं’ में आएगा। आम शहरी नागरिकों में भी आपको कभी ऐसी चर्चा सुनने को नहीं मिलेगी। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर शहरी कुलीन वर्ग के कुछ लोग डर को लेकर ऐसा दावा क्यों कर रहे हैं? इनमें कई चोटी के उद्योगपति भी शामिल हैं। असल में ये उस जमात के लोग हैं जिनके सामने पूरे का पूरा ढांचा ही बदल रहा है जो उन्हें बहुत असहज करने वाला है। यदि आप इस पर विचार करते हैं तो शहरी कुलीन वर्ग के शीर्ष पर कायम ऐसे लोगों में डर की भावना को बखूबी समझ सकते हैं। दशकों से वे उन असमान्य चीजों को सामान्य मानकर खुद को उनके मुताबिक ढालते और तरक्की करते आए हैं, लेकिन अब उनकी वह दुनिया एकदम बदल रही है।

काली करतूतों के दम पर फलते-फूलते कारोबार पर लगा विराम

मैं इसे विस्तार से समझाता हूं। यह कुलीन तबका भ्रष्टाचार जैसी बुराई को भी ‘सामान्य’ मानकर उसे उचित ठहराता रहा है। चाहे सामान्य स्वीकृतियों या मंजूरियों के मामले हों या फिर प्रमुख राष्ट्रीय नीतियों को अपने मुताबिक बदलवाने के लिए भारी-भरकम रकम की घूस देने के उन्हें ऐसे तौर-तरीकों से कोई एतराज नहीं रहा। अपनी काली करतूतों के लिए उन्हें कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। सरकारी विभागों के साथ उनकी साठगांठ चलती रही। इसके दम पर ही वे फलते-फूलते रहे। इससे उन्हें खास किस्म का आत्मविश्वास मिलता था जो अब बदलती व्यवस्था के दौर में ध्वस्त हो गया है। आज कई बुनियादी बदलाव हो रहे हैं। सख्त कायदे-कानून बनाए जा रहे हैं। उन्हें कड़ाई से लागू भी किया जा रहा है। उन्हें तोड़ना-मरोड़ना भी मुश्किल है। इस बदलते और आकार लेते नए भारत में जहां ये नियम लागू हो रहे हैं, वहां उनके लिए वास्तविकता से ताल मिलाना बहुत कठिन साबित हो रहा है।

जुगाड़ बैठाने में नाकाम लोगों को लगी गहरी चोट

यह खासतौर से उन विशिष्ट कारोबारी जनों पर बहुत भारी पड़ रहा है जो पहले तंत्र को अपने हिसाब से हांकने में सक्षम थे। अपना जुगाड़ बैठाने में नाकामी उनके लिए दुखदायी साबित हो रही है। वे दशकों से जिस परिपाटी के अभ्यस्त थे, उसमें व्यापक बदलाव उन पर भारी पड़ रहा है। ऐसे तंत्र के भरभराकर गिरने से उनके आत्मविश्वास पर भी गहरी चोट हुई है जिसका अस्थाई रूप से असर शायद उनके निवेश पर भी पड़ रहा हो। उनके लिए ये स्थितियां बदल सकती हैं, यदि वे उन नए परिवर्तन से ताल मिला लें, जो सबके लिए समान आधार उपलब्ध कराती हैं।

नए तौर-तरीकों को अपनाने के प्रयास

पुरानी शैली के कारोबारियों में अधिक व्यावहारिक उद्यमी उस पुराने दौर एवं परिपाटी की वापसी को लेकर कोई उम्मीद नहीं कर रहे। वे तंत्र को प्रभावित करने वाले पुराने चलन से पीछा छुड़ाकर वास्तव में नए तौर-तरीकों को अपनाने के प्रयास में हैं। वे उन प्रक्रियागत परिवर्तन के साथ स्वयं को समायोजित कर रहे हैं जो केवल उन्हें नहीं, बल्कि सभी के लिए बेहतर कारोबारी परिवेश उपलब्ध कराए।

सरकार नहीं सुन सकती अपनी आलोचना

सरकार के बारे में यह कहना किसी विडंबना से कम नहीं कि वह आलोचना नहीं सुन सकती या वह असहिष्णु है। खासतौर से तब जब गृहमंत्री ने उनके प्रश्न का बहुत विनम्रतापूर्वक और आश्वस्त करने वाला जवाब दिया हो, मगर मीडिया में सवाल को जितनी प्रमुखता दी गई, उतनी उनके जवाब को नहीं मिली।

मीडिया के मुखरित स्वर देश के समृद्ध लोकतंत्र के जीवंत प्रमाण हैं

भारत में विभिन्न प्रकाशक एवं प्रसारक समूहों के रूप में भारतीय मीडिया के मुखरित स्वर देश के समृद्ध लोकतंत्र के जीवंत प्रमाण हैं। वास्तव में किसी भी सार्वजनिक मंच, टेलीविजन, सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बिना किसी डर के सरकार पर किसी भी तरह की टिप्पणी करना इसकी जीती-जागती मिसाल है कि भारतीय लोकतंत्र किस स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

( लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं )

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