उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दो चरण संपन्न हो गए हैं। इन चरणों में जिन इलाकों में मतदान हुआ वहां अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी है। पहले चरण में जिन 15 जिलों में चुनाव हुआ वहां मुस्लिम आबादी तकरीबन 19.4 प्रतिशत है। इसके बाद बुधवार को संपन्न दूसरे चरण में जिन 67 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान हुआ वहां मुस्लिम आबादी का औसत लगभग 34.12 प्रतिशत है। राजनीतिक दलों से लेकर सियासी पंडितों तक सबकी नजरें प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं के रुख पर लगी हैं। यह स्पष्ट ही है कि ज्यादा दिलचस्पी पहले दो चरणों में हुए मतदान में मुसलमानों के रुझान को लेकर है। अगर सूबे में मुसलमानों की सियासी लामबंदी पर गौर करें तो मुस्लिम मतदाता पंरपरागत रूप से सपा, बसपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल यानी रालोद का ही दामन थामते आए हैं। 2012 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में सपा को मुसलमानों के 40 प्रतिशत मत मिले थे। इसी तरह कांग्रेस को 20 प्रतिशत, बसपा को 18 प्रतिशत और भाजपा को 7 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का साथ मिला था। कुछ छिटपुट वोट रालोद की झोली में भी आए थे। इस बार यह माना गया कि सपा और कांग्रेस के साथ आने से मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन इस गठजोड़ को मिल जाएगा, लेकिन मायावती की दलित-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग वाली रणनीति इस गठबंधन का खेल बिगाड़ भी सकती है। सपा-कांग्रेस की हसरतों पर पानी फेरने का मंसूबा रखने वाली मायावती अकेली नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर खुद को मुसलमानों के रहनुमा के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में जुटे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुसलमीन भी प्रदेश के चुनावों में पहली बार शिरकत कर रही है। इन सभी के अलावा चुनावों में भाजपा द्वारा तीन-तलाक के मुद्दे ने भी इसे काफी दिलचस्प बना दिया है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि तीन तलाक का मुद्दा मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत संवेदनशील है। यही मसला उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करता है, लेकिन वे चाहकर भी इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पातीं।
तीन तलाक से उच्च वर्ग या आर्थिक रूप से स्वतंत्र मुस्लिम महिलाएं तो उतनी त्रस्त नहीं हैं, लेकिन मुस्लिम समाज के निचले तबके की महिलाओं के लिए यह उनकी जिंदगी तबाह करने वाला होता है। अच्छा यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने उन्हें मताधिकार के रूप में खामोशी के साथ चलाने वाला एक मजबूत हथियार दिया है जिससे वे इस तकलीफ से छुटकारा पा सकती हैं। यह बेहद अजीब बात है कि जब तमाम इस्लामिक देशों में तीन तलाक का मुद्दा न्यायिक दायरे में आ गया है तब भारत जैसे लोकतांत्रिक एवं सेक्युलर देश में संवैधानिक निर्देश और अदालतों के दखल एवं तल्ख टिप्पणियों के बावजूद सरकारें इस ओर ध्यान क्यों नहीं देतीं? पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, इराक, तुर्की, मलेशिया जैसे दुनिया के 22 मुस्लिम देशों ने तीन तलाक के चलन को खत्म कर दिया है। इराक में तो तलाक देने वाले पति को न्यायालय को आश्वस्त करना पड़ता है कि तलाक देना क्यों जरूरी है? श्रीलंका में पति को इस्लामिक न्यायालय में अर्जी देनी पड़ती है। इसके बाद अदालत एक महीने तक दोनों पक्षों में सुलह की कोशिशें करती है और इस कवायद के नाकाम होने पर ही तलाक की इजाजत मिलती है। पाकिस्तान में भी 1961 के कानून के मुताबिक तलाक के लिए पहले स्थानीय अदालत में अर्जी लगानी होती है और उसकी एक प्रति पत्नी को भी उपलब्ध करानी होती है। फिर आर्बिट्रेशन काउंसिल 90 दिनों के दौरान सुलह कराने का प्रयास करती है। तब तक तलाक प्रभावी नहीं होता और यदि पत्नी गर्भवती है तो शिशु के जन्म तक तलाक मंजूर नहीं होता। तीन तलाक के मसले पर पाकिस्तान में जो सुधार 56 साल पहले ही अमल में आ गया वह सुधार भारत में किन लोगों के विरोध के चलते अटका हुआ है?
तीन तलाक का मुद्दा केवल महिला अधिकार तक सीमित नहीं है। इसका मुस्लिम बच्चों के भविष्य, उनकी परवरिश और अधिकारों से भी ताल्लुक है। आखिर मुस्लिम समाज का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता? मुस्लिम समाज में सुधारों को इस्लाम पर खतरे के रूप में क्यों देखा जाता है? आज तमाम मुस्लिम महिलाएं बुर्के का परित्याग कर सामाजिक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रही हैं। उससे इस्लाम को क्या खतरा हुआ? मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक भूमिका खुद मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए बेहद जरूरी है, मगर अफसोस की बात है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्था ने महिलाओं के हक में कोई सम्माजनक कानूनी हल बनाने के बजाय इसका विरोध करने का फैसला किया।
तीन तलाक को लेकर मुस्लिम महिलाओं में जैसे-जैसे चेतना बढ़ रही है वैसे-वैसे उनमें मतदान के प्रति आकर्षण भी बढ़ रहा है। हो सकता है कि इस समस्या को मुद्दा बनाने वालों को चुनाव में इसका लाभ भी मिल जाए, लेकिन बेहतर होगा कि खुद मुस्लिम समाज आगे बढ़कर ऐसी कोशिशों का स्वागत करे। इस पैमाने पर अगर मुस्लिम मतदान के रुझान का विश्लेषण करें तो लगता है कि उसमें कुछ परिवर्तन आ रहा है। इसमें पहला परिवर्तन सामाजिक और जातिगत आधार से जुड़ा है। उच्च जाति-वर्ग के अशरफ मुसलमान और पिछड़े एवं दलित वर्ग के अजलफ और अरजल मुसलमानों के मुद्दे, समस्याएं, अभिरुचियों और नजरिये में बदलाव आ रहा है। ऐसे में कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर वे इन समस्याओं के समाधान के लिए अलग-अलग दलों का दामन थामें। जिस तरह मौलाना कल्बे जव्वाद, मौलाना इमाम बुखारी, गरीब नवाज फाउंडेशन, ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड, अलीगढ़ पूर्व छात्र संघ आदि ने मुसलमानों से मायावती के पक्ष में मतदान की अपील की है उसका जमीनी स्तर पर असर पड़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो पिछड़े एवं दलित वर्ग के मुसलमानों के सपा-कांग्रेस से छिटककर बसपा की ओर आकृष्ट होने का अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरा बदलाव मुस्लिम समाज में लैंगिक आधार से जुड़ा है।
भारतीय महिलाएं अमूमन परिवार के पुरुषों के कहने पर ही मतदान करती हैं, लेकिन इन चुनावों में भाजपा द्वारा तीन तलाक खत्म करने के मुद्दे ने उनके भीतर आशा जगाई है। अगर दुनिया के तमाम मुस्लिम मुल्कों में तीन तलाक खत्म हो सकता है तो फिर भारत में क्यों नहीं? अगर संविधान में समान नागरिक संहिता की बात करने वाले अनुच्छेद 44 को लागू न भी किया जाए तब भी क्या तीन तलाक को खत्म करने की कोई पहल नहीं की जा सकती है? अगर मुस्लिम महिलाओं को यह समझ आता है तो संभव है कि इस मुद्दे पर वे अपने समाज के पुरुषों के फतवे के खिलाफ जाकर मतदान करना पसंद करे। भाजपा के लिए यह काफी रोचक होगा,क्योंकि इससे न केवल उसके मुस्लिम मतों में इजाफा होगा, बल्कि बिना किसी सांगठनिक कोशिश के ही मुस्लिम महिलाओं में पार्टी की बैठ बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ नारे को भी सार्थक बता सकेगी। इस लिहाज से यह चुनाव केवल एक शुरुआत भर है। यह अभी तय नहीं कि इस मुद्दे के दम पर भाजपा को मौजूदा विधानसभा चुनावों में महिलाओं के वोट मिल ही जाएंगे, लेकिन इसका दूरगामी असर जरूर होगा।
[ लेखक डॉ. एके वर्मा, राजनीतिक विश्लेषक और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस