[विवेक ओझा]। InDepath Indo Pacific Maritime Route: समुद्री सुरक्षा और स्वतंत्रता के प्रश्न को एक कदम और बढ़ाते हुए भारत और रूस ने हाल ही में एक नया 'इंडो पैसिफिक मैरीटाइम रूट' लॉन्च करने पर सहमति व्यक्त की है जो रूस के सुदूर पूर्व के बंदरगाह शहर व्लादिवोस्तोक से चेन्नई तक विस्तृत होगा। इस व्यापारिक समुद्री मार्ग का कुछ हिस्सा दक्षिण चीन सागर से होकर भी गुजरेगा। इस रूप में यह माना जा रहा है कि भारत दक्षिण चीन सागर में चीन के प्रभाव को चुनौती दे रहा है जिसमें उसका साथ रूस देगा।

एक्ट ईस्ट पॉलिसी

कहा गया है कि इस नए समुद्री मार्ग के संदर्भ में भारत रूस अपने सहयोग का विस्तार सैन्य और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भी कर सकते हैं। दोनों देश सैन्य उपकरणों का संयुक्त विकास और उत्पादन भी कर सकते हैं। भारत के इन सब कार्यों का असर यह पड़ा है कि चीन के विवादित सर्वे पोत ने हाल ही में वियतनाम के वैंगार्ड बैंक से स्वयं को बाहर कर लिया है। भारत का कहना है कि यह प्रस्तावित समुद्री मार्ग भारत के एक्ट ईस्ट पॉलिसी के बिल्कुल अनुकूल है जिसे दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती देने के लिए निर्मित किया गया है। आज दक्षिण पूर्वी एशियाई देश भारत की क्षमता और वैश्विक राजनीति में किसी मुद्दे की वैधता को सिद्ध करने की उसकी सक्रियता में यकीन रखते हैं।

वैनगार्ड बैंक विवाद 

हाल में जिस वैनगार्ड बैंक को लेकर वियतनाम और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर में स्वामित्व विवाद हो रहा है, वहां से मात्र 100 नॉटिकल मील की दूरी पर ऑयल ब्लॉक नंबर 06/1 हैं जहां पर भारत के ओएनजीसी, रूस के रोस्नेफ्ट और वियतनाम के पेट्रो वियतनाम के नियमित तेल और गैस उत्पादन के साझे उपक्रम 17 वर्षों से कार्यरत हैं। इस क्षेत्र में अन्य भारतीय निजी कंपनियां भी तेल अन्वेषण के अवसरों पर निगाह लगाए हुए हैं। गौरतलब है कि जुलाई, 2019 में चीन का समुद्री सर्वेक्षण पोत वियतनाम के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में वैनगार्ड बैंक में अवैध तरीके से प्रवेश कर गया जिससे दोनों देशों के बीच तनाव भी बढ़ गया। वैनगार्ड बैंक स्पार्टले द्वीप पर स्थित है।

वियतनाम यहां तेल अन्वेषण परियोजना चलाना चाहता है जिसमें चीन बाधा पैदा कर रहा है। चीन और वियतनाम के तटरक्षक पोत इस स्थिति में आक्रामक मुद्रा में रहे हैं। छह सशस्त्र तटरक्षक पोत जिनमें दो चीन के और चार वियतनाम के थे, द्वारा वैनगार्ड बैंक और स्पर्टले द्वीप की निगरानी की गई। जुलाई, 2019 में चीन के सर्वे पोत हैयांग डिझी ने वियतनाम के नियंत्रण वाले रीफ क्षेत्र वैनगार्ड तट में प्रवेश किया जिसे वियतनाम अपना ईईजेड मानता है।

चीन का कहना था कि वह इस क्षेत्र में सिस्मिक सर्वे करना चाहता था। भारत के विदेश मंत्रालय का इस घटना पर स्पष्ट रूप से कहना है कि दक्षिण चीन सागर क्षेत्र के प्रमुख जलमार्ग क्षेत्र में शांति और स्थिरता में भारत के मूलभूत और वैध हित निहित हैं। भारत का 55 प्रतिशत व्यापार दक्षिण चीन सागर के सागरीय जलमार्गों से गुजरता है। इस दृष्टि से इसे शांति का क्षेत्र बनाना भारत की प्राथमिकता है।

दक्षिण चीन सागर से जुड़े अन्य विवाद

फरवरी से जुलाई 2019 के बीच चार बार चीन ने फिलीपींस के सिबुथू जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेज कर दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ़ा दिया है। फिलीपींस ने आरोप लगाया है कि उसके अनन्य आर्थिक क्षेत्र में चीन के दो अनुसंधान पोत काम कर रहे हैं। फिलीपींस इस मामले को चीन के साथ फिर से उठाने को तैयार है। इसके अलावा हाल में चीन और मलयेशिया के बीच लूकोनिया शोल और चीन और फिलीपींस के बीच रीड बैंक को लेकर भी विवाद बढ़ गया है। दक्षिण चीन सागर विवाद दुनिया के सबसे बड़े महासागरीय विवाद के रूप में माना जाता है। चीन के दक्षिण में स्थित सागर जो प्रशांत महासागर का भाग है, को ही दक्षिण चीन सागर कहा जाता है।

नाइन डैश लाइन विवाद

चीन से लगे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों और उनके द्वीपों को लेकर भी चीन और वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रुनेई, फिलीपींस, ताइवान, स्कार्बोराफ रीफ आदि क्षेत्रों को लेकर विवाद है। लेकिन मूल विवाद की जड़ है दक्षिण चीन सागर में स्थित स्पार्टले और परासेल द्वीप। चीन ने दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में अतिक्रमण कर वहां अपनी संप्रभुता के दावों के लिए नौ स्थानों पर डैश या चिन्ह लगाकर विवाद को बढ़ा दिया है, इसलिए इस विवाद को नाइन डैश लाइन विवाद भी कहते हैं। चीन का नाइन डैश लाइन यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑफ द लॉ ऑफ द सी, 1982 के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की मान्यता काखंडन करता है।

दक्षिण चीन सागर का सामरिक महत्व

चीन को प्राकृतिक तेल की आपूर्ति मध्य पूर्व से होती है और यह मलक्का जलडमरुमध्य के रास्ते से होकर गुजरता है। अक्सर अमेरिका चीन को चेतावनी देता है कि वह मलक्का जलडमरुमध्य को ब्लॉक कर देगा जिससे चीन की ऊर्जा आपूर्ति रुक जाएगी। इसलिए चीन दुनिया भर के अन्य देशों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सजग और आक्रामक हुआ है। यही कारण है कि चीन को दक्षिण चीन सागर में अपने भू आर्थिक और भू सामरिक हित दिखाई देते हैं।

दक्षिण चीन सागर में 11 बिलियन बैरल प्राकृतिक तेल का भंडार है और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस भंडार होने की संभावना भी व्यक्त की गई है। यह क्षेत्र ऐसा है जहां से हर वर्ष पांच ट्रिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। दक्षिण चीन सागर, प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित बेहद अहम कारोबारी इलाका भी है। दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का 20 प्रतिशत हिस्सा यहां से गुजरता है। इस इलाके में अक्सर अमेरिकी जंगी जहाज गश्त लगाते हैं, ताकि समुद्री व्यापार में बाधा ना पहुंचे, लेकिन चीन इसे अमेरिका का आक्रामक रवैया कहता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए चीन ने यहां कृत्रिम द्वीप बनाए हैं, संसाधन अन्वेषण के लिए सर्वे भी किए हैं।

स्कारबोरफ शोल की अहमियत

यहां यह जानना भी जरूरी है कि सिर्फ तेल और गैस ही नहीं, दक्षिण चीन सागर में मछलियों की हजारों नस्लें पाई जाती हैं। दुनिया भर के मछलियों के कारोबार का करीब 55 फीसद हिस्सा या तो दक्षिण चीन सागर से गुजरता है, या वहां पाया जाता है। वर्ष 2012 में चीन ने अपने तट से 500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे से द्वीप स्कारबोरफ शोल पर जहाज भेजकर कब्जा कर लिया। वैसे तो ये विशाल दक्षिण चीन सागर में एक छोटा सा टीला है, लेकिन इसे लेकर फिलीपींस से चीन के तनाव लंबे समय तक बने रहे।

इस इलाके में चीन और फिलीपींस के जंगी जहाज एक-दूसरे के मुकाबले खड़े रहे हैं। हालात युद्ध तक के बन गए, क्योंकि स्कारबोरफ शोल फिलीपींस के ज्यादा करीब है। इसलिए फिलीपींस इस पर अपना हक छोड़ने को तैयार नहीं है। स्कारबोरफ शोल की अहमियत इसलिए है, क्योंकि मछली पकड़ने निकलने वाले जहाज अगर समुद्री तूफान में फसते हैं, तो ये टीला उनके लिए डूबते को तिनके के सहारे जैसा काम करता है। फिलीपींस ने चीन को इस मामले पर पीसीएस में घसीट लिया था। इस अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल की सुनवाई में चीन शामिल नहीं हुआ था।

दक्षिण चीन सागर विवाद में शामिल पक्ष

चीन ने वर्ष 2018 में दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्र में पहली बार अपना बम वर्षक विमान एच-6के तैनात कर दिया था। इन विमानों की रेंज उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और अमेरिकी द्वीप गुआम तक बताई गई थी। अमेरिका ने चीन के इस कदम के बाद अपने युद्धक जहाजों को चीन के बनाए गए कृत्रिम द्वीपों की ओर रवाना किया था। चीन पिछले एक दशक से लगातार दक्षिणी चीन सागर में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश में रहा है। इस क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है और अमेरिका ने सबसे पहले अपने युद्धक जहाजों को भेजकर यहां फ्रीडम ऑफ नैविगेशन की बात पर जोर दिया। लेकिन आज अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर ज्यादा देश खड़े हुए नजर नहीं आते हैं।

अमेरिका का खास दोस्त ऑस्ट्रेलिया भी चीन की ओर इस तरह की कार्रवाई से झिझकता है। हालांकि ब्रिटेन कभीकभी अपने पोत अमेरिका के साथ भेजता है। ऐसे में अमेरिका अपने आपको इस मुद्दे पर अकेला पाता है। यही नहीं, अमेरिका, डोनल्ड ट्रंप की सरकार में एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपना नेतृत्व बनाए रखने में रुचि खोता जा रहा है, ऐसे भी आरोप लगाए गए हैं। इस क्षेत्र में चीन की कृत्रिम द्वीप बनाने की कोशिशों, नौसेना के आधुनिकीकरण, जहाजों की पेट्रोलिंग और 2010 में बनाया गया सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर यह सिद्ध करते हैं कि इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ता रहा है और इसका तनाव सभी तटीय देशों के संबंधों में नजर आता है। मगर यह कहना भी जरूरी है कि इस क्षेत्र पर बाकी पांच देश भी अपना दावा करते हैं और सभी ऐसी कोशिशें कर रहे हैं, फर्क इतना है कि चीन की हैसियत बहुत ज्यादा है।

[अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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