नई दिल्ली [ बद्री नारायण ]। भारतीय समाज अंतर्विरोधों से भरा समाज है। हालांकि वह दुनिया का सबसे बड़ा जनतांत्रिक समाज है, किंतु उसमें व्यावहारिक स्तर पर वंशवाद की सहज स्वीकारोक्ति है। पारिवारिक पेशा हो या राजनीति, वंशवाद से शायद ही किसी को परहेज हो। इस तरह उभरते जनतंत्र में सामंतवादी मूल्य एवं तौर-तरीके भारतीय जनतंत्र को आकार देते हैं। भारतीय समाज गजब तरीके से हालात से सामंजस्य करने की क्षमता से लैस है। वैसे तो सैद्घांतिक स्तर पर जनतांत्रिक मूल्यों और सामंती मूल्यों में कहीं भी समानता नहीं है, परंतु भारतीय समाज में ये दोनों दूध और पानी की तरह मिल गए हैं। इनके मिश्रण से ही भारतीय जनतंत्र की शक्ल ने आकार लिया है।

पश्चिमी समाज से नया संस्करण तैयार 

पश्चिमी समाज में उभरा जनतंत्र जब एशियाई एवं मध्य पूर्व के देशों एवं समाजों में गया तो वहां के समाज की प्रकृति में उसने नया अवतार लिया यानी उसका नया संस्करण तैयार हुआ। इसी तरह भारत में आज जो जनतंत्र है वह पश्चिमी जनतंत्र का भारतीय संस्करण है। आज भारतीय समाज आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है। महानगरों, स्मार्ट सिटी, कस्बों, बाजारों का विस्तार अबाध गति से हो रहा है। भारत नई टेक्नोलॉजी का एक बड़ा उपभोक्ता एवं बाजार बनकर उभरा है। बीते कुछ समय से नागर समाज कहीं तेजी से विकसित होता जा रहा है। सिविल सोसाइटी एवं समाज सुधारक एवं सेवाभावी संस्थाओं का भी नेटवर्क लगातार विकसित होता जा रहा है।

यूनिवर्सिटी, कॉलेज आदि नई आधुनिकता का माध्यम

यूनिवर्सिटी, कॉलेज आदि नई आधुनिकता का माध्यम बन रहे हैं, किंतु अगर हम सही अर्थों में देखें तो भारतीय समाज में आज भी अनेक प्राचीन मूल्य न केवल ठाठ से चल रहे हैं, बल्कि वे और सशक्त होते भी दिख रहे हैं। जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, वंशवाद आदि अनेक मूल्य इस आधुनिकता में अंतर्विरोध पैदा करते रहते हैं। जनतंत्र एवं जनतांत्रिक राजनीति में जातिवाद, क्षेत्रवाद एवं संप्रदायवाद की भूमिका सीधे तौर पर देखी जा सकता है। चुनावी विमर्शों में तो अनेक बार ये खुलकर दिखने लगते हैं। भारतीय राजनीति में अस्मिता बोध के अनेक आधार भी जाति, क्षेत्र एवं धर्म की ऐसी ही प्राक् आधुनिक पहचानों से जुड़कर हमारी जनतांत्रिक राजनीति में आकार ले रहे हैं। भारत एक जनतांत्रिक समाज तो है, लेकिन उसमें सामंती मूल्य का होना एक तरह का अंतर्विरोध सृजित कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ यह समाज आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है, किंतु अनेक प्राक् आधुनिक मूल्यों के साथ। यह दूसरी तरह का विरोधाभास है।

अहिंसक देश में भी दिखाई देती है हिंसा

प्रसिद्ध इतिहासकार एवं चिंतक रणजीत गुहा कई साल पहले नीदरलैंड के एक शोध संस्थान में फेलो थे। मैं भी उन दिनों वहां फेलो के रूप में कार्यरत था। हमारे स्टडी रूम अगल-बगल थे। शाम को हम घंटों बातें करते थे। एक बार उन्होंने कहा कि देखो यह कैसा अंतर्विरोध है? कहने को तो हम कहते हैं कि भारत अहिंसक देश है। अहिंसा के मूल्यों पर विश्वास करता है, किंतु अगर गहराई से देखें तो यहां के सामाजिक स्तरों में हिंसा की अनेक परतें दिखाई पड़ेंगी। हमारे समाज में कई बार बाप बेटे को पीटता है। पति पत्नी को पीटता है, आधिपत्यशाली कमजोर पर हिंसा करता है। हर शक्तिवान शक्तिहीन को हिंसा के माध्यम से ही नियंत्रित करना चाहता है। है न एक दुखद विरोधाभास। कहने को तो हम बुद्घ के उपदेशों की दुहाई देते हैं। अपने को गांधी का देश कहते हैं और अहिंसा की महत्ता को रेखांकित करते हैं, किंतु अनेक बार अपनी असहमति एवं विरोध हिंसा के माध्यम से ही प्रकट करते हैं। इस क्रम में कभी सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाई जाती है, कभी अपने से भिन्न मत रखने वाले को और कभी-कभी तो जो भी सामने मिल गया अर्थात अनजान लोगों को भी क्षति पहुंचा देते हैं। एक तरह से हिंसाजनित

क्षति में ही हम अपनी समस्याओं की पूर्ति देखते हैं। हाल में गुरुग्राम में प्रद्युम्न हत्याकांड ने हमें यही बताया कि हिंसा छोटे बच्चों में भी कितने कुत्सित स्तर तक पहुंच गई है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि हाल में जब फिल्म पद्मावत का विरोध हो रहा था तो विरोधी फिल्मकारों के साथ-साथ अन्य ऐसे लोगों को भी क्षति पहुंचाने की धमकी दे रहे थे जिनका इस फिल्म से कोई लेना-देना ही नहीं था। हिंसा अनेक प्रकार की होती है। एक, प्रकट हिंसा और दूसरी, अदृश्य हिंसा। बातों से हिंसा, भावों से हिंसा, देह भाषा से हिंसा। हिंसा के अनेक रूप एवं ढंग हैं। प्रकट हिंसा के तो हम आंकड़े बनाते हैं, लेकिन अदृश्य हिंसा के संपूर्ण आंकड़े बनाना दुष्कर कार्य है। आधुनिकता की ओर हम जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, प्रत्यक्ष हिंसा के साथ-साथ अदृश्य एवं अप्रकट हिंसा के रूप बढ़ते जा रहे हैं। मूल्य एवं सिद्घांत के स्तर पर अहिंसक देश में हिंसा के बढ़ते प्रारूप हमें चिंतित करने चाहिए।

जनतंत्र एवं जनतांत्रिक चुनाव के बाद भी भारतीय समाज में हिंसा बढ़ी है या यूं कहें हिंसा का राजनीतिकरण हुआ है। स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर संसद के लिए होने वाले चुनाव में भी हिंसा के अनेक रूप पूरी प्रक्रिया के हिस्से के रूप में दिखाई देते हैं। किसी को वोट देने पर हिंसा, किसी को वोट न देने पर हिंसा, वोट के बाद विजय जुलूस के कारण हिंसा अर्थात विजय मनाने के क्रम में हिंसा। एक तरह से अनेक रूपों में हिंसा हमारी चुनावी प्रक्रिया का अंग बन गई है।

अंतर्विरोध के अनेक रूपों को अपने में समाहित कर आगे बढ़ रहा भारत

इसमें दोराय नहीं कि आज भारतीय समाज अंतर्विरोध के अनेक रूपों को अपने में समाहित कर आगे बढ़ रहा है। इतने अंतर्विरोधों को अपने में समाए भारतीय समाज फिर भी किसी भी तरह की टूट-फूट से अपने को बचाकर हजारों वर्षों से यात्रा कर रहा है। यही उसकी शक्ति है। शायद यहीं से ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ उभरता है। इन अंतर्विरोधों में नकारात्मक एवं सकारात्मक, दोनों तरह की प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। हो सकता है कि इन अंतर्विरोधों के टकराव से भारतीय समाज में नया स्फुरण आए। सामाजिक विश्लेषण के अब तक के अनुभव के आधार पर कहें तो सामाजिक विकास के क्रम में अंतर्विरोधों से उत्पन्न होने वाली नकारात्मकता कमजोर होती है। देखना यह है कि इन अंतर्विरोधों में पाए जाने वाले नकारात्मक मूल्य आगे चलकर कमजोर होते हैं या नहीं? साथ ही हमें देखना यह भी होगा कि राज्य एवं समाज, एक सम्यक एवं समानतापूर्ण समाज बनाने की दिशा में कैसे इन अंतर्विरोधों का सामना करता है?

[ लेखक गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक हैं ] 

Posted By: Sanjay Pokhriyal