प्रो. सतीश कुमार। India China Border Tension News मई माह में भारत और चीन की सेना के बीच लद्दाख में एलएसी पर शुरू हुआ संघर्ष बीते माह कुछ थमता दिख रहा था। लेकिन बीते करीब एक सप्ताह से परिस्थितियां फिर से बिगड़ती जा रही हैं। चीन की सेना ने लद्दाख में पैंगोंग झील के दक्षिणी हिस्से में अड्डा बनाना शुरू कर दिया है। यह क्षेत्र भारत के सामरिक महत्व के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है।

भारत ने भी अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा दी है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्री स्तर की बातचीत में चीन ने पांच सूत्री संधि की बात मानी थी, जिसमें स्थिति को हर कीमत पर बातचीत के द्वारा तय करने पर सहमति जताई गई थी। लेकिन लगता नहीं है कि चीन कि मंशा ठीक है, क्योंकि उसने हठधर्मिता के साथ कहा है कि वह एक इंच भी नहीं पीछे हटेगा। यानी चीन युद्ध की धमकी दे रहा है।

चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में 1962 युद्ध का उल्लेख किया जाना भी इस बात का संकेत है कि चीन उसके बाद की गई अनेक संधियों को ताक पर रखकर भारत की सामरिक शक्ति को चुनौती दे रहा है। संसद में देश के रक्षा मंत्री ने भी संसद को चीन की सोच से अवगत करा दिया है और यह भी विश्वास दिलाया है कि भारत की स्थिति मजबूत है। हम युद्ध के लिए तैयार हैं, जबकि शांति से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

आसान नहीं होगा चीन के लिए युद्ध : अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो चीन के लिए मुश्किलें कैसे पैदा होंगी, उसकी विवेचना जरूरी है। दरअसल, चीन नई विश्व व्यवस्था में मुखिया बनने की कोशिश में है। भारत उस दौड़ में नहीं है। चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि पिछले छह महीने में बहुत धूमिल हुई है। कुछ दिन पहले ताईवान ने चीन की सैन्य पनडुब्बी को मिसाइल से ध्वस्त कर दिया था, चीन चीखता रहा, पर हुआ कुछ भी नहीं, क्योंकि ताईवान के सिर पर अमेरिका का हाथ है। दूसरी तरफ चीन के विश्वस्त पड़ोसी देशों, मसलन मलेशिया और थाईलैंड ने भी एक निश्चित दूरी बना ली है।

तिब्बत प्रकरण पर मुखर भारत : इस बीच भारत ने पिछले दिनों तिब्बत कार्ड की शुरुआत कर दी है। इसका अंदाजा इस बात से मिलता है कि एक विशेष सैन्य टुकड़ी, जिसे स्पेशल फ्रंटियर फोर्स कहा जाता है, वह खबर में आई है। इस सैन्य टुकड़ी का गठन 1964 में ही किया गया था, लेकिन यह बात चीन तक नहीं पहुंची थी। इसमें तिब्बत के शरणार्थी हैं, जो 1950 में और बाद में दलाई लामा के साथ 1959 में भागकर भारत आ गए थे। पिछली सदी के छठे दशक में इस टुकड़ी को खम्पा विद्रोह के रूप में जाना जाता था, जिसे अमेरिकी मदद से तिब्बत को आजाद करने की व्यूह रचना की गई थी। चूंकि भारत नेहरू की सोच की वजह से खम्पा विद्रोहियों का साथ नहीं दे पाया, वरना तिब्बत पिछली सदी के छठे-सातवें दशक में ही पुन: आजाद देश बन जाता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

भारत के स्पेशल फ्रंटियर फोर्स से उड़ी चीन की नींद : पिछले दिनों एक तिब्बती सैनिक के शहीद होने के बाद उसे भारत और तिब्बत के झंडे में लपेट कर अंतिम विदाई दी गई। यह सब देखकर चीन के होश उड़ गए। चीन की सबसे कमजोर नब्ज तिब्बत ही है। तिब्बत चीन के लिए दीवार की तरह है। अगर वह मजबूत है तो चीन सुरक्षित है, अन्यथा नहीं। भारत ने उसी के मांद में चिंगारी फेंक दी है। इस बीच खबर है कि चीन की सेना भारत के विरुद्ध लड़ने के लिए तिब्बती फोर्स तैयार करने में जुटी हुई है। जिस क्षेत्र को चीन ने दीमक की तरह चाट लिया है, उसे भारत के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया जा रहा था। भारत के प्रयास ने चीन को खतरे में डाल दिया है। मालूम हो कि भारत के स्पेशल फ्रंटियर फोर्स में मूलत: तिब्बती ही हैं, जो अपने देश को आजाद करने के संकल्प के लिए कुर्बानियां दे रहे हैं। सीमा के उस पार भी उसी नस्ल और क्षेत्र के तिब्बती हैं। अंतर इतना सा है कि वह चीन के चंगुल में हैं और ये लोग चीन के चंगुल से आजाद हैं। इस बात की पूरी आशंका है कि कहीं यह युद्ध भारत चीन की लपेट में तिब्बत स्वतंत्रता संग्राम के रूप में न बदल जाए।

चीन का मुख्य शत्रु आज भी अमेरिका ही है। जब तक अमेरिका से चीन दो दो हाथ नहीं कर लेता, उसकी छवि एक सुपर पावर के रूप में कभी नहीं बन सकती। जिस तरीके से वह भारत के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है, उसकी वैश्विक पहचान धूमिल होने वाली है। भारत और चीन के बीच संघर्ष का नतीजा जो भी हो, लेकिन तो इतना तय है कि इससे चीन कमजोर होगा।

चीन के राष्ट्राध्यक्ष द्वारा भारत का कमजोर आकलन : चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी चिनफिंग ने वर्ष 2012 में चीन को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाने की बात कही थी। वह उसी नक्शे कदम पर काम करते रहे। उन्हें विश्वास था कि दुनिया अब चीन के अश्वमेध उड़ान को रोक नहीं पाएगी। व्यक्ति या देश के लिए अति उत्साह या सार्वभौमिक बनने की आतुरता विघटन को जन्म देती है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर का पराभव भी इसी कारण से हुआ था। जर्मनी ने पूर्व सोवियत संघ की शक्ति को कम करके आंका था। उसे पूरा विश्वास था कि नाजी सेना की जीत सुनिश्चित है, लेकिन हुआ इसके विपरीत। वहीं से हिटलर के पतन की कहानी शुरू हो गई। चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी चिनफिंग ने भी भारत की शक्ति को तीतर-बटेर समझ लिया। शी चिनफिंग शायद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच और कार्य करने की शैली को ठीक से समझ नहीं पाए।

डोकलाम से नहीं ली सीख : उम्मीद थी कि डोकलाम में चोट खाने के बाद चीन अपनी भूल से सीख लेते हुए अब ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा। उसके बाद भारत और चीन के बीच दो महत्वपूर्ण अनौपचारिक सम्मलेन भी हुए। पहला चीन के वुहान में दूसरा भारत के महाबलीपुरम में। भारत ने चीन के साथ मिलकर दुनिया को बेहतर बनाने की कवायद की थी। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में भी गरमाहट लाने की बात हुई।

कोरोना की त्रासदी में भी भारत चीन विरोधी अभियान से काफी हद तक दूर ही रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोस्ती की लाज रखते हुए चीन पर लगने वाले आरोपों से स्वयं को दूर रखा। लेकिन चीन भारत की चुप्पी को कमजोरी समझने की भूल कर बैठा और उसकी सेना ने लद्दाख की गलवान घाटी में एलएसी पर अतिक्रमण करने का दुस्साहस किया। भारत ने इसका मजबूती के साथ प्रतिकार किया और हिसाब बराबर कर लिया। नवीनतम सूचना के अनुसार भारत ने फिंगर फाइव पर पुन: कब्जा जमा लिया है।

[राजनीतिक विश्लेषक]

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