राहुल लाल। श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने रविवार को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई और श्रीलंकाई राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने उन्हें शपथ दिलाई। श्रीलंका के हालिया चुनावों में उनकी पार्टी श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) को 225 सदस्यीय नौवीं संसद में 145 सीटें मिली हैं, जबकि उसके सहयोगी दलों कों पांच सीटें मिली हैं। इस तरह उनके गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत हासिल हो गया।

श्रीलंका के इस चुनाव में राजपक्षे की पार्टी एसएलपीपी का जीतना तय माना जा रहा था, लेकिन मूल मुद्दा यह था कि उन्हें दो-तिहाई बहुमत मिलता है या नहीं। पार्टी ने गठबंधन के साथ दो-तिहाई के जादुई लक्ष्य को भी प्राप्त कर लिया है। श्रीलंका में नया संविधान लागू करना या एकतरफा ढंग से संविधान संशोधन कराना इस प्रचंड बहुमत का स्वीकृत उद्देश्य है। इन बदलावों में संविधान में 19वें संशोधन को निरस्त करना भी शामिल है, जो संसद की भूमिका को मजबूत करते हुए राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करता है।

यह संशोधन इस धारणा पर आधारित है कि राष्ट्रपति पद के मजबूत होने से प्रशासनिक अकुशलता पैदा हुई। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति की शक्तियों में बदलाव से दोनों भाइयों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इस दो-तिहाई बहुमत का प्रयोग अल्पमत के संवैधानिक शक्तियों को कम करने के लिए भी होगा। इसकी वजह यह है कि महिंदा राजपक्षे दो बार राष्ट्रपति रहने के बाद तीसरी बार चुनाव इसलिए हार गए थे, क्योंकि सिंहला मतदाताओं का व्यापक समर्थन मिलने के बावजूद तमिल और मुस्लिम प्रभाव वाले उत्तरी प्रांतों में उनके खिलाफ अधिक मतदान हुआ था। उसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए एसएलपीपी एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहेगी, जिसमें अल्पमत भविष्य में बहुमत की राय को पलट नहीं सके।

मुख्य विपक्षी दलों की स्थिति: महिंदा राजपक्षे की मुख्य रूप से दो प्रतिद्वंदी पार्टयिां हैं। पिछली संसद में बहुमत रखने वाली यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) और समागी जन बालतेगाया (एसजेबी) में एसजेबी का नेतृत्व सजित प्रेमदासा के पास है, जो यूएनपी के ही पूर्व नेता हैं और पिछली गठबंधन सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी थे। सजित ने यूएनपी से ही अलग होकर नई पार्टी एसजेबी बनाई है। एसजेबी को विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा 54 सीटें मिलीं। चुनाव परिणाम में सबसे ज्यादा झटका रानिल विक्रमसिंघे की पार्टी यूएनपी को लगा। यूएनपी केवल एक सीट ही जीत पाई। यूएनपी नेता विक्रमसिंघे को पहली बार हार का सामना करना पड़ा है।

भारत की चुनौतियां बढ़ने की आशंका: अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में महिंदा ने गोतबाया राजपक्षे की उस घोषणा का समर्थन किया कि सरकार करोड़ों डॉलर के बंदरगाह समझौते की समीक्षा करेगी। एक साल पहले श्रीलंका की तत्कालीन सरकार ने भारत और जापान के साथ ईस्ट कंटेनर टíमनल विकसित करने का समझौता किया था। मई 2019 में बातचीत के लंबे दौर के बाद श्रीलंका, जापान और भारत इस प्रोजेक्ट के एमओयू तक पहुंचे थे। 70 करोड़ डॉलर की इस परियोजना में 51 फीसद शेयर जापान का और 49 फीसद शेयर भारत का होना था। हालांकि इस पर स्वामित्व श्रीलंका पोर्ट्स अथॉरिटी के पास ही रहता। ईसीटी से 70 फीसद कारोबार भारत से होता है। इसके विकास को लेकर पूर्व श्रीलंकाई राष्ट्रपति सिरीसेना और विक्रमसिंघे के बीच विवाद भी था। विक्रमसिंघे का मानना था कि इस टर्मिनल से श्रीलंका को शिपिंग हब बनाने में मदद मिलेगी, जबकि सिरीसेना नहीं चाहते थे कि इसमें कोई विदेशी निवेश हो। राजपक्षे ने चीन पर अंकुश लगाने वाले समूह भारत-आस्ट्रेलिया-अमेरिका-जापान के कई आíथक मदद को अस्वीकार किया तथा चीनी सहयोग को स्वीकार किया। श्रीलंका ने जापान की मदद से बनने वाले कोलंबो लाइट रेलवे प्रोजेक्ट और अमेरिका के एक कॉरपोरेशन से 48 करोड़ डॉलर के अनुदान को भी ठुकरा दिया। राजपक्षे बंधु चीन को यह संकेत नहीं देना चाहते हैं कि वे चीन विरोधी समूह से मदद ले रहे हैं।

कर्ज के जाल में फंसता श्रीलंका: वर्ष 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे को देश में तीन दशकों से जारी गृहयुद्ध को खत्म करने का श्रेय तो दिया ही जाता है, लेकिन श्रीलंका जिस तरह से कर्ज के बोझ तले दबा है, उसके लिए भी राजपक्षे को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था 88 अरब डॉलर की है तथा उस पर 55 अरब डॉलर का कर्ज है। श्रीलंकाई केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर इंद्रजीत कुमारस्वामी के अनुसार श्रीलंका पर कर्ज उसकी जीडीपी का 77 फीसद है। श्रीलंका का यह कर्ज अनुपात पड़ोसी देश भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड से भी ज्यादा है। इस कर्ज में चीन का हिस्सा 10 प्रतिशत तथा एशियन डेवलपमेंट बैंक का हिस्सा 14 प्रतिशत है। लेकिन हाल ही में श्रीलंका ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए चीन से 50 करोड़ डॉलर का तात्कालिक लोन लिया तथा सड़क परियोजना के लिए चाइना डेवलपमेंट बैंक से आठ करोड़ डॉलर का एक अन्य कर्ज लिया।

इस बीच न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि चीनी कर्ज और महत्वाकांक्षी पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए राजपक्षे का जवाब हमेशा हां रहा। हंबनटोटा पर हुई शोध का भी कहना था कि यह बनने के बाद भी काम नहीं करेगा, लेकिन राजपक्षे का जवाब फिर भी चीन के लिए हां ही रहा। हंबनटोटा पोर्ट का निर्माण चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने किया। यह पोर्ट पूर्व की आशंका के मुताबिक असफल रहा है। इस पोर्ट के नजदीक का समुद्री मार्ग दुनिया का सबसे व्यस्ततम मार्ग है और यहां से दसियों हजार जहाज गुजरते हैं, वहीं 2012 में हंबनटोटा से महज 34 जहाज गुजरे। चीन ने हंबनटोटा बंदरगाह, एक नया एयरपोर्ट, एक कोयला पावर प्लांट और सड़क निर्माण में 4.8 अरब डॉलर का निवेश किया था। 2016 आते-आते यह कर्ज छह अरब डॉलर हो गया। कर्ज नहीं चुकाने के कारण श्रीलंका ने यह बंदरगाह चीन की मर्चेट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड को 99 साल के लिए लीज पर दे दिया था। श्रीलंका को पोर्ट के साथ 15 हजार एकड़ जमीन भी चीन को सौंपनी पड़ी थी। श्रीलंका ने चीन को जो क्षेत्र सौंपा है, वह भारत से केवल 100 मील की दूरी पर है। भारत के लिए यह सामरिक खतरा है। लिहाजा भारत को इन सभी तथ्यों के प्रति सचेत रहना होगा।

श्रीलंका की सियासत में एक वक्त महिंदा राजपक्षे की तूती बोलती थी, लेकिन चीन के प्रति उनके अधिक झुकाव के कारण उनकी राजनीतिक हैसियत एक दौर में कम हो गई थी। समय के साथ उन्होंने चीन की मदद की हकीकत को समझा जिससे वह पहले से कहीं अधिक ताकत से वहां उभरे हैं। हिंद महासागर में श्रीलंका की खास भू-राजनीतिक स्थितियों के कारण भारत के लिए यह देश विशेष महत्व रखता है। हालांकि चीन द्वारा कर्ज देने की मंशा को शायद श्रीलंकाई नेतृत्व समझने लगा है, लिहाजा भारत को भी ज्यादा भरोसे के साथ आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

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