[ दिव्य कुमार सोती ]: अनुच्छेद 370 और धारा 35ए को खत्म करने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में दो केंद्रशासित प्रदेशों को अस्तित्व में आए हुए एक साल होने वाला है। इस अवधि में वहां पिछले 70 वर्षों से जारी मूल अधिकारों के हनन और भेदभाव को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा कई सार्थक और सराहनीय कदम उठाए हैं। जैसे 1947 में पाकिस्तान से भागकर आए हिंदू और सिख शरणार्थियों को अब जाकर मूल निवासी का दर्जा और नागरिकता देना संभव हुआ है।

अनुच्छेद 370 के चलते पाक से आए 1.5 लाख हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता नहीं मिल सकी

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और धारा 35ए के चलते पाक से आए करीब 1.5 लाख हिंदू एवं सिख शरणार्थियों को नागरिकता नहीं मिल सकी। इसके चलते वे मतदान से लेकर सरकारी नौकरी पाने तक के हर अधिकार से वंचित थे। एक दूसरा बड़ा कदम सरकार द्वारा डोमिसाइल या मूल निवासी होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए बनाए गए अर्हता के नए नियम भी हैं। नए मानकों के तहत अब जम्मू-कश्मीर में 15 वर्षों तक निवास करने वाले या फिर सात वर्षों तक वहां शिक्षा प्राप्त करने वाले तथा कक्षा 10 या 12 की परीक्षा दे चुके छात्र-छात्राएं अब मूल निवासी माने जाएंगे। इसके अतिरिक्त दस वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार या उसके उपक्रमों में काम कर चुके कर्मचारियों के बच्चे भी मूल निवासियों की श्रेणी में आएंगे।

तीन लाख से अधिक लोगों को ऑनलाइन प्रक्रिया द्वारा डोमिसाइल दिया गया

नए नियमों के तहत पिछले एक महीने में साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया द्वारा डोमिसाइल दिया गया है। इससे पहले स्थिति यह थी कि जो लोग 14 मई, 1954 को जम्मू-कश्मीर के नागरिक या स्थायी निवासी थे उन्हें और उनकी संतानों को ही डोमिसाइल का दर्जा प्राप्त हो सकता था। शेष भारत के नागरिक चाहे कितने ही समय जम्मू-कश्मीर में रहें उन्हें न तो मूल निवासी का दर्जा मिल सकता था, न ही संपत्ति खरीदने का अधिकार।

कश्मीर के लोगों का भारत के अन्य भागों से न के बराबर संपर्क के चलते पनपा कट्टरपंथ, अलगाववाद

कश्मीर में कट्टरपंथ और अलगाववाद को हवा इसलिए भी मिली, क्योंकि वहां के लोगों का भारत के अन्य भागों और धर्मों के लोगों से न के बराबर संपर्क रहा। 1990 के दशक में कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी पंडितों और सिखों को भगा दिए जाने के बाद होश संभालने वाले अधिकांश कश्मीरी बच्चों को दूसरे धर्मों को मानने वाले लोगों से वास्ता रखने की कोई आदत ही नहीं रह गई। इसी कारण बुरहान वानी और रियाज नायकू जैसे आतंकियों की नई पीढ़ी आजादी नहीं, बल्कि बगदादी के इस्लामिक स्टेट जैसा कुछ बनाना चाहती थी।

दूसरे प्रदेशों के व्यापारी राज्य में निवेश नहीं करना चाहते थे, संपत्ति में मालिकाना हक नहींं था 

संपत्ति में मालिकाना हक न मिल पाने के चलते दूसरे प्रदेशों के व्यापारी राज्य में निवेश नहीं करना चाहते थे। कश्मीर के अधिकांश नेताओं ने भी भारत विरोधी प्रदर्शन भड़काकर दिल्ली से हजारों करोड़ के आर्थिक पैकेज की उगाही को धंधा बना लिया था, जिसे घाटी में बैठा राजनीतिक, प्रशासनिक और अलगाववादी तंत्र मिल-बांटकर खा लिया करता था। अनु. 370 और पूर्ण राज्य के दर्जे की समाप्ति ने फिलहाल इस राजनीति को खत्म कर दिया है।

जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से बहाल करना होगा

यह सही है कि देर-सवेर जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से बहाल करना होगा, पर केंद्र में बैठे नेताओं को इतिहास से सबक लेते हुए ध्यान रखना होगा कि वे सही लोगों को सूबे की राजनीति में आगे बढ़ाएं। जब राजनीतिक प्रक्रियाएं बहाल होंगी तब केंद्र को यह ध्यान रखना होगा कि वैसे राजनीतिक-अलगाववादी और व्यापारिक गठजोड़ फिर जड़ें न जमा पाएं जिन्होंने 70 वर्षों तक कश्मीर को जलाया। दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो कश्मीर में जड़ जमा चुके कट्टरपंथी संगठनों द्वारा संचालित मस्जिदों और मदरसों का पारदर्शी प्रबंधन बेहद जरूरी है।

कट्टरपंथ फैलाने वाले धार्मिक और शिक्षण संस्थानों पर कार्रवाई हो

इसके बिना संभव ही नहीं कि कश्मीरी युवाओं के दिमाग में आतंकवाद के बीज बोए जाने बंद किए जा सकें। हाल में कई आतंकियों के मारे जाने पर यह स्थिति बनी है कि श्रीनगर का कोई युवा फिलहाल किसी आतंकी संगठन में सक्रिय नहीं बचा है। यह स्थिति बनी रहे, इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ फैलाने वाले धार्मिक और शिक्षण संस्थानों पर सतत कार्रवाई हो।

जम्मू-कश्मीर का विभाजन होने के बाद अब गिलगित-बाल्टिस्तान लद्दाख का भाग है

यह समय गुलाम कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान पर भी ध्यान देने का है। जम्मू-कश्मीर का विभाजन होने के बाद भारत सरकार द्वारा जारी मानचित्र में अब गिलगित-बाल्टिस्तान लद्दाख का भाग है। अनु. 370 खत्म कर भारत की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ने पाक और चीन, दोनों को चौंकाया था। इस समय चीनी सेना भारत को दबाव में लेकर यह दिखाना चाहती है कि जो किया सो किया, अब इससे आगे गिलगित-बाल्टिस्तान की ओर बढ़ने की न सोचे। इस रणनीति के तहत चीन ने न सिर्फ लद्दाख में तनाव पैदा किया, बल्कि लिपुलेख दर्रे से लेकर सिक्किम और भूटान तक भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में भारतीय मौसम विभाग द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए मौसम भविष्यवाणी जारी कर देना भर काफी नहीं है।

गुलाम कश्मीर के लोगों को संसद में प्रतिनिधित्व देना चाहिए ताकि वे अपनी आवाज उठा सकें 

हम अगर पाक के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान और चीन द्वारा वहां के संसाधनों की लूट और पाक फौज द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को लेकर वाकई में गंभीर हैं तो हमें वहां के लोगों को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देना चाहिए ताकि वे अपनी आवाज उठा सकें। हाल में आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए लोकसभा में आरक्षित दो सीटों की व्यवस्था समाप्त कर दी गई।

भारत सैन्य दबाव के चलते अपनी नीति की दिशा बदलने वाला नहीं 

यह विचारणीय विषय है कि सात दशक तक अगर हम ब्रिटिश शासन के चलते एक बहुत छोटे समुदाय को लोकसभा में प्रतिनिधित्व दे सकते हैं तो भला पाक के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं देना चाहिए, जिन्हें हमारी संसद सर्वसम्मति से भारत का अभिन्न अंग घोषित कर चुकी है? अगर लोकसभा में नहीं तो राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा गुलाम कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के प्रतिनिधि नामित करने का प्रावधान किए जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। इससे चीन को भी यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि भारत सैन्य दबाव के चलते अपनी नीति की दिशा बदलने वाला नहीं है।

( लेखक काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )

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