[अभिषेक]। वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद से जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत रूचि लेकर उसे आगे बढ़ाया उनमें कौशल विकास महत्वपूर्ण रहा है। प्रधानमंत्री की सोच थी, और जैसा कि उनके कई भाषणों व नीतियों से स्पष्ट होता रहा कि भारत अपने ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ के तहत दुनिया भर का कौशल केंद्र बने जिससे न सिर्फ दुनिया भर की कंपनियां भारत में निवेश को लेकर उत्साहित हों, बल्कि भारतीय युवा विदेशों में उपलब्ध मौकों का फायदा उठा सकें।

इसके पीछे तथ्य यह था कि जहां दुनिया के कई देश युवाओं की कमी से जूझ रहे होंगे, वहीं भारत युवाओं का देश होगा और अगर उनको सही कौशल प्रदान किया जाए तो भारत दुनिया भर की इस कमी को पूरा कर सकता है। लेकिन हाल ही में जारी किए गए ‘वल्र्ड कंपीटीटिवनेस इंडेक्स’ को देखें तो भारत में श्रम कुशल युवाओं की कमी है। कौशल के मानक पर भी हमारा प्रदर्शन हमारे साथ के देशों के मुकाबले कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में कौशल विकास के लिए किए गए प्रयासों पर एक बार फिर से विचार मंथन जरूरी है।

वैसे तो कौशल विकास के संबंध में पूर्व में योजना आयोग ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में पूरा एक अध्याय शामिल किया था और इस दिशा में कई कदम भी उठाए थे, मगर इस दिशा में जो गति वर्तमान मोदी सरकार में दिखी वो अभूतपूर्व है। युवाओं को कुशल बनाकर उनको न सिर्फ नौकरी, बल्कि स्व-रोजगार एवं रोजगार उत्पन्न करने वाला उद्यमी बनाने की दिशा में बढ़ते हुए एक के बाद एक कई कदम उठाए गए।

वर्ष 2009 में लाई गई राष्ट्रीय कौशल विकास नीति को नई परिस्थितियों और नए लक्ष्यों के अनुसार संशोधित किया गया। इसके लिए बाकायदा कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय का गठन हुआ। सरकार के एक वर्ष पूरे होने से पहले ही 20 मार्च 2015 को कैबिनेट ने 1,500 करोड़ रुपये के व्यय निश्चित करते हुए प्रधानमंत्री ने कौशल विकास योजना की स्वीकृति प्रदान की। अगले वर्ष जुलाई में एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में 2016 से 2020 तक में 12,000 करोड़ रुपये के व्यय से एक करोड़ युवाओं को कुशल बनाने का लक्ष्य

निर्धारित किया गया।

कौशल विकास को लेकर राजनीतिक प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2015 में जब प्रधानमंत्री सिंगापुर गए तो वहां के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन से प्रभावित होकर ऐसे संस्थान भारत में हो, इसकी परिकल्पना के साथ वह आए। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए सरकार ने आइआइटी यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और आइआइएम यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की तर्ज पर छह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स बनाने का निश्चय किया। और ऐसे तीन संस्थानों की कानपुर, मुंबई और अहमदाबाद में स्थापना की स्वीकृति भी दी गई है।

पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी के अंतर्गत बनाए जा रहे इन विशिष्ट संस्थानों की आधारशिला रखते हुए कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा, ‘सरकार को उम्मीद है कि भविष्य में ये संस्थान उच्च विशिष्ट क्षेत्रों, अर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग आदि में कौशल प्रदान कर कुशल कार्य बल विकसित करने का करने का कार्य करेंगे जो भविष्य के भारत के लिए जरूरी है।’

मगर जो सबसे महत्वपूर्ण बात इन संस्थानों के स्थापना के पीछे है वो यह कि ये अत्याधुनिक संस्थान व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल को प्रासंगिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के युवाओं में कौशल प्रशिक्षण को लेकर रूचि ना के बराबर रही है। शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ-साथ

बेरोजगारी के बढ़ते प्रतिशत के बावज़ूद जैसा कि संतोष मेहरोत्रा अपनी किताब में लिखते हैं, ‘भारत में हायर सेकेंडरी में दाखिल केवल तीन प्रतिशत युवा ही व्यावसायिक शिक्षा में रूचि रखते हैं, जबकि अनिवार्य स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद डेनमार्क में 30 प्रतिशत युवा व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। अगर स्कूल एवं कार्यस्थल आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण को मिला कर देखा जाए तो हायर सेकेंडरी में दाखिला लेने वाले जर्मनी में 60 प्रतिशत तथा दक्षिण कोरिया में 28 प्रतिशत युवा इसमें रूचि रखते हैं।

व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में रूचि के पीछे कई सामाजिक कारण भी होते हैं और कहा जा सकता है कि सरकार के लिए इनको बदल पाना इतना आसान भी नहीं होता है। मगर जिस प्रकार से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स की ब्रांडिंग हो रही है और सरकार ने जो रूचि दिखाई है, उससे यह स्पष्ट है कि सरकार ना सिर्फ समस्या को समझ चुकी है, बल्कि व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के प्रति लोगों की धारणा बदलने के लिए गंभीर भी हो चुकी है। यह जरूरी भी है, क्योंकि सरकार की अन्य योजनाओं, विशेष तौर पर ‘मेक इन इंडिया’ के लिए कुशल श्रम शक्ति एक पूर्व शर्त है। लेकिन सिर्फ छह संस्थानों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता और अच्छी रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित कर देश की विशाल श्रम शक्ति की गुणवत्ता सुधर जाएगी, ऐसा सोचना बेमानी होगा। इसके लिए सरकार को इन विशिष्ट संस्थानों की स्थापना और ब्रांडिंग के अतिरिक्त अन्य बातों पर भी ध्यान देना होगा।

युवा व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण का विकल्प चुने, इसके लिए जरूरी है कि प्रशिक्षण से मिले कौशल की मांग बाजार में बढ़ भी रही हो। युवा इन पाठ्यक्रमों का चयन तभी करेंगे जब उन्हें यह महसूस होगा कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें नौकरी अवश्य मिलेगी। एक चीज जो हमें समझनी पड़ेगी कि आज अगर अधिक लोग अपेक्षाकृत सामान्य कौशल का विकल्प चुनते हैं तो ना केवल इसलिए कि उनका प्रशिक्षण सस्ता है, बल्कि इस धारणा के कारण कि उनका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों के लिए किया जा सकता है। वह ये समझते हैं कि इन प्रशिक्षणों पर किया गया निवेश, धन और समय जोखिम भरा है। दूसरी बात सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन प्रशिक्षित युवाओं को मिलने वाली नौकरी अप्रशिक्षित युवाओं से अच्छी हो यानी वेतन ज्यादा हो, सुविधाएं बेहतर हो। रोजगार के चयन में सामाजिक कारणों का अपना प्रभाव होता है, पर इसमें महत्वपूर्ण कारक है आर्थिक प्रोत्साहन। अगर यह सुनिश्चित हो कि प्राप्त किए गए कौशल की मांग होगी तो सामाजिक कारणों के बावजूद, भले ही रफ्तार कम हो, व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में रूचि अपने आप बढ़ेगी।

[अध्येता, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,

नई दिल्ली]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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