[डा. ऋतु सारस्वत]। ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि वहां तख्तापलट की आशंका तेज हो गई है। यह सब कथित तौर पर नैतिक तौर-तरीके थोपने वाली ईरानी पुलिस की हिरासत में महाशा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुआ। जहां हिजाब विरोधी इस मुहिम को कई देशों में समर्थन मिल रहा है, वहीं भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी एवं स्त्री समानता का पैरोकार तबका चुप्पी साधे है। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह भलीभांति जानता है कि हिजाब विरोध में दिया गया समर्थन उन्हें हिंदूवादी ठहरा देगा, जो एक बड़े वर्ग के लिए अपशब्द के समान है। इससे भी अधिक उनके राजनीतिक समीकरणों, तुष्टीकरण और अन्य स्वार्थों का भी सवाल है।

करवा चौथ को पिछड़ापन घोषित करने वाली जिह्वाएं कुतर्कों की बाढ़ लगा देती हैं और यह सिद्ध करने में जुट जाती हैं कि विश्व में यदि कोई संस्कृति स्त्री समानता की विरोधी है तो वह भारतीय संस्कृति है। अधकचरी जानकारियों को एकत्र करना, धर्म ग्रंथों में उल्लिखित श्लोकों की मनमानी व्याख्या करना और अपने स्वार्थ अनुरूप परिवर्तित कर उन्हें आमजन तक पहुंचाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, परंतु ऐसा क्यों किया गया इस पर कहीं कोई गंभीर चर्चा नहीं की गई।

गौरवशाली इतिहास मनुष्य के भीतर आत्मबल को सुदृढ़ करता है। यही आत्मबल सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास के सुदृढ़ मार्ग प्रशस्त करता है। अगर किसी देश के विकास को बाधित करना है तो सर्वप्रथम वहां के नागरिकों के आत्मबल को विखंडित करना होगा। यही भारत के साथ भी किया गया। वर्ण व्यवस्था के तार्किक आधार कब जाति व्यवस्था की कठोर और संकीर्ण जकड़न में परिवर्तित हो गए, यह आज भी गंभीर शोध का विषय है।

इससे भी अधिक विचारणीय यह है कि जहां मां दुर्गा शक्ति स्वरूपा के रूप में पूजी जाती हैं, उस संस्कृति में कैसे कोई स्त्री दोयम स्थान रख सकती है? वह संस्कृति कैसे स्त्री समानता विरोधी हो सकती है? क्या वाकई भारतीय वैदिक संस्कृति स्त्री विरोधी है? इस प्रश्न के उत्तर में अनेक उदाहरणों को सामने रखकर यह सिद्ध करने को तत्पर विमर्श तुरंत दिख जाएगा, क्योंकि बड़े सुनियोजित तरीके से विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों को विस्मृत करने एवं करवाने का प्रयास उनके द्वारा होता आया है और अभी भी जारी है।

विश्व भर में व्याप्त धर्म-मत-पंथ अपने अनुयायियों को जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं। धर्म विशेष को स्वीकार करने वालों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे धार्मिक ग्रंथों का बिना किसी तर्क के अनुसरण करें। वैदिक संस्कृति इसमें अपवाद है, जहां प्रश्न पूछने और उसके निराकरण के मार्ग सर्वदा खुले रहे हैं। अगर धरातल पर विद्यमान समस्त धर्मग्रंथों का बिना किसी पूर्वाग्रह के तार्किक विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होगा कि वेदों ने स्त्री को जो स्थान दिया, वह अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। उसकी परिधि मां, बेटी और बहू के भीतर नहीं सीमित नहीं की गई, अपितु उसे पुरुषों की भांति सेनानी, सभापति और अर्थप्रदाता माना गया।

यजुर्वेद के अध्याय 17 के मंत्र 45 में उल्लेख है कि सभापति को चाहिए कि जैसे युद्ध विद्या में पुरुषों को शिक्षित किया जाता है, वैसे ही स्त्रियां भी शिक्षित हों। जैसे वीर पुरुष युद्ध करें, वैसे ही स्त्रियां भी युद्ध करें। इसी वेद के अध्याय 10 के मंत्र 28 में उल्लेख है कि जैसे पुरुष सभी दिशाओं में कीर्ति युक्त वेदों को जानने, धनुर्वेद और अथर्ववेद की विद्या में प्रवीण हों, तो उसी भांति स्त्रियां भी हों।

स्त्री शिक्षा का समर्थन, पुरुषों के बहुविवाह को उचित न समझने वाले वेद स्त्री वैधव्य के कटु आलोचक थे। ऋग्वेद और अथर्ववेद में विधवा स्त्री को शोक मनाने के स्थान पर पुनर्विवाह करने के आदेश हैं। फिर कैसे भारत में विधवा विवाह वर्जित हो गए? कैसे बाल विवाह ने अपनी जड़ें जमाईं? जिस सती प्रथा का उल्लेख करते हुए भारतीय संस्कृति को विश्व भर में निम्न एवं हीन सिद्ध करने का प्रयास किया गया, वह तो कभी वेदों में उल्लिखित ही नहीं थी। वेदों के बाद जिन ग्रंथों को रचा गया, उनमें स्त्री असमानता के स्वर उच्चारित होने लगे, परंतु यह गंभीरतापूर्वक विचारने का प्रयास क्यों नहीं किया गया कि यह किस रणनीति की परिणति है।

एक तथ्य स्पष्ट है कि परिस्थितिजन्य परिवर्तनों के बीच जब भी कोई एक पक्ष कुछ पलों के लिए असक्षम होता है तो सशक्त पक्ष उसे संभलने का अवसर नहीं देता, क्योंकि स्त्री देह को देशकाल की सीमा से परे संवेदनशील माना गया है। इसीलिए उसके संरक्षण की आड़ में शनै: शनै: उसकी स्वतंत्रता के विरुद्ध नवीन अध्याय रचे जाने लगे, जो नितांत स्वार्थ जनित थे। उससे भी दुखद स्थिति तब उत्पन्न हुई जब विदेशी आक्रांताओं ने धर्म ग्रंथों के साथ छेड़छाड़ कर उनमें न केवल असमानता के बीज बोए, अपितु स्त्री शोषण को न्यायोचित भी ठहराया। अन्यथा भारतीय सभ्यता की निर्माण भूमि जो वेद हैं, उनमें स्त्री को यज्ञीय माना गया अर्थात यज्ञ समान पूजनीय।

एक प्रश्न यह भी उठता है कि चाहे कोई भी मत-पंथ हो, कैसे कोई स्त्री स्वयं उन मार्गों पर चलने की सहर्ष अनुमति दे देती है,जो किसी भी मानव के लिए सहज नहीं। स्त्रियों को सदियों से यही बताया जाता है कि धर्मगुरुओं के बताए मार्ग को अगर वे बिना किसी तर्क के स्वीकार करेंगी, तभी उन्हें आदर प्राप्त होगा। आदरणीय होने का भाव सम्मोहन का वह भ्रमजाल बुनता है कि स्त्री स्वयं उससे बाहर नहीं आना चाहती। अगर ऐसा नहीं है तो क्या कोई स्त्री बहुपत्नी विवाह को उचित ठहरा सकती है या फिर हिजाब का समर्थन करते हुए अपनी शिक्षा और स्वतंत्रता की तिलांजलि देने को भी तत्पर हो सकती है?

(लेखिका समाजशास्त्र की प्राध्यापक हैं)

Edited By: Arun kumar Singh

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