प्रदीप शुक्ला। खरमास खत्म हो चुका है। मकर संक्रांति भी गुजर गई, लेकिन अभी हेमंत सोरेन के नेतृत्व की गठबंधन सरकार की तस्वीर साफ नहीं हुई है। गठबंधन दलों में मंत्रिपद और विभागों के बंटवारे को लेकर रस्साकसी चल रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दिल्ली के कई चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन झामुमो-कांग्रेस किसी सर्वमान्य फार्मूले पर नहीं पहुंच सके हैं, ऊपर से स्थानीय नीति का जिन्न और बाहर आ गया है। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति तय करने की बात कहकर नई सरकार के लिए एक संकट खड़ा कर दिया है। फिलहाल मुख्यमंत्री ने टिप्पणी नहीं की है, पर जिस तरह से भाजपा सहित गठबंधन सहयोगी कांग्रेस में इस पर चर्चा शुरू हुई है उससे भविष्य में यह मुद्दा गठबंधन दलों के ही गले की फांस बन सकता है।

मंत्रिमंडल में पेच 

29 दिसंबर को हेमंत सोरेन ने झामुमो- कांग्रेस- राजद गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते ही घोषणा की थी कि खरमास खत्म होते ही मंत्रिमंडल का पूर्ण गठन कर लिया जाएगा। मुख्यमंत्री के साथ उस दिन कांग्रेस के दो और राजद के एक मंत्री ने भी शपथ ली थी। करीब तीन सप्ताह खत्म होने वाले हैं, लेकिन अभी तक कांग्रेस और झामुमो में पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है। दरअसल झामुमो कांग्रेस को चार से ज्यादा मंत्रिपद नहीं देना चाहती है और कांग्रेस पांच से कम पर मानने को तैयार नहीं है। इसके अलावा बोर्ड और निगमों पर भी कांग्रेस की नजर है। कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा विधायकों को सरकार में शामिल करवाना चाहती है। वह इतने पर भी संतुष्ट होती नहीं दिख रही है। पद के साथ उसे मलाई वाले विभाग भी चाहिए और यही सब मंत्रिमंडल गठन में बाधक बना हुआ है।

आलाकमान से सीधे संपर्क में सोरेन

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद ही कांग्रेस आलाकमान से सीधे संपर्क में हैं। वह लगातार दिल्ली आ-जा रहे हैं। पूर्ण मंत्रिमंडल का गठन न होने से अब गठबंधन में भी बेचैनी महसूस की जा रही है। जनता में भी गलत संदेश जा रहा है। खैर, मुख्यमंत्री यह कह रहे हैं कि 19 जनवरी तक सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। आशंका यह भी जताई जा रही है कि मंत्रिपद और विभागों के बंटवारे के बाद झारखंड में भी महाराष्ट्र जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। महाराष्ट्र में मंत्रिपद और विभागों को लेकर गठबंधन के तीनों दलों- शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा में विरोध के स्वर उठ चुके हैं। झारखंड में गठबंधन सरकारों के इतिहास से तो सभी भलीभांति वाकिफ हैं ही।

बाबूलाल की घरवापसी

पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा प्रमुख बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी तय हो चुकी है। करीब एक सप्ताह विदेश में बिताकर वह लौट आए हैं। भाजपा ने भी खरमास के बाद ही नेता प्रतिपक्ष चुनने का एलान किया था। रघुवर दास के हारने, आदिवासियों में भाजपा के प्रति नाराजगी सहित कई अन्य ऐसे कारण हैं जिनके चलते भाजपा और बाबूलाल मरांडी एक-दूसरे के करीब आने को मजबूर हुए हैं। पूरी झाविमो, भाजपा में विलय को तैयार है, लेकिन पार्टी के विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की के सुर इससे इतर हैं। विलय में कोई कानूनी अड़चन न आए, इन्हें दूर करने में ही बाबूलाल मरांडी लगे हुए हैं।

मजबूत आदिवासी चेहरा 

बाबूलाल मरांडी के आने से जहां झारखंड में भाजपा को एक मजबूत आदिवासी चेहरा मिल जाएगा, वहीं उन्हें सही ठिकाना। भाजपा से अलग होने के बाद उनका कद बढ़ा तो कतई नहीं। झाविमो की ताकत भी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में घरवापसी उन्हें नई ताकत दे सकती है। वह लगातार कह रहे हैं कि उन्हें किसी पद की चाहत नहीं है। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि नेता प्रतिपक्ष अथवा प्रदेश अध्यक्ष से इतर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी मिल सकती है। आदिवासियों के बीच उनकी काफी स्वीकार्यता है और भाजपा इसे देश भर में भुना सकती है।

स्थानीय नीति का निकला जिन्न

राज्य बनने के बाद से ही स्थानीय नीति को लेकर राज्य में कई बार बखेड़ा हो चुका है। रघुवर दास सरकार ने वर्ष 2014 में पहली बार स्थानीय नीति को परिभाषित किया। इसमें 1985 से झारखंड में रहने वालों को स्थानीय माना गया, लेकिन अब झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाने की बात कहकर नया विवाद शुरू कर दिया है। झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन फिलहाल इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह मुद्दा राज्य की राजनीति में बड़ी हलचल पैदा करेगा।

क्या होंगे बदलाव?

झामुमो और कांग्रेस यह कहते रहे हैं कि रघुवर दास की स्थानीय नीति से राज्य के लोगों के अवसर कम हुए हैं और वह इसमें बदलाव करेंगे। बदलाव क्या होंगे? क्या 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनेगी? इस पर अभी सब मौन हैं। झामुमो सुप्रीमो के बयान के बाद कांग्रेस में हलचल है। स्थानीय बनाम बाहरी में उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे राज्य में नए तरीके की समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल कांग्रेस नेता कह रहे हैं मंत्रिमंडल के गठन के बाद सहयोगी दल न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर उस पर काम करेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा, झामुमो का क्या रुख रहता है। हेमंत सरकार पार्टी सुप्रीमो के साथ रहती है अथवा कोई बीच का रास्ता निकालती है।

(लेखक झारखंड के स्थानीय संपादक हैं)

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Posted By: Kamal Verma

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