अवधेश कुमार। भाजपा के विरुद्ध एकता की बात करने वाले दलों के बीच चुनावी एकता संभव नहीं हो पा रही। कुछ माह पहले ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई थी मानो भाजपा के खिलाफ पूरा विपक्ष एकजुट होकर लड़ेगा। हालांकि यह कल्पना अव्यावहारिक लग रही थी, फिर भी उम्मीद थी कि कुछ दल अवश्य चुनावी गठबंधनों की एकता प्रदर्शित करेंगे। नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसका परीक्षण होना था। गठबंधन का चुनाव परिणाम से ज्यादा महत्व इससे निकलने वाले संदेश का था जो 2019 के लिए मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकता था। बसपा प्रमुख मायावती ने तीन राज्यों में गठबंधन न होने के बाद जैसी तीखी टिप्पणी कांग्रेस पर की उससे भावी परिदृश्य स्पष्ट हो जाता है। 

उन्होंने कांग्रेस के बारे में टिप्पणी की है कि रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठन नहीं गई। कहा कि लोकसभा चुनाव में समझौते के लिए वह गिड़गिड़ाएंगी नहीं, सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं तो अकेले लड़ेंगी। इसके मायने बहुत गंभीर है। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में सीट जीतने के मामले में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा हो, किंतु एक निश्चित जनाधार प्रदेश में दोनों चुनावों में व्याप्त रहा। उत्तर प्रदेश में वह एक प्रमुख ताकत है। 2019 में यह राज्य भाजपा का मुख्य भाग्य निर्धारक होगा इसलिए सबकी नजर यहां होने वाले गठबंधन पर है। इस बीच अखिलेश यादव के बयानों से भी ऐसा महसूस होता है कि इन तीनों राज्यों में सपा और बसपा के साथ कांग्रेस की खटास का असर उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व गठबंधन पर पड़ेगा।

इसके अलावा इन समीकरणों का विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव दोनों के लिए मायने रखता है। राजस्थान में बसपा को केवल तीन सीट मिली थी, लेकिन उसे 10,41,241 मत मिले थे। कांग्रेस और भाजपा के बीच करीब 37 लाख मतों का अंतर था। उसमें बसपा के मत का योगदान हो सकता था। यहां गठबंधन होता तो यह मत कांग्रेस गठबंधन में जुड़ सकता था। बसपा अलग लड़ती है या वहां की दो छोटी पार्टियों- नेशनल पीपुल्स पार्टी और नेशनल यूनियनिस्ट जमींदार पार्टी तथा सपा से समझौता करती है तो उसका असर जरूर होगा। इन दोनों पार्टियों को पांच सीटें मिलीं थीं। नेशनल पीपुल्स पार्टी को भी 13,13,402 मत प्राप्त हुए थे। नेशनल यूनियनिस्ट जमींदार पाटी को 3,12,653 मत मिले थे। सपा को केवल 1,18,911 मत ही मिले थे।

ये सभी वोट मिला कर मायने रखते हैं। मध्य प्रदेश में भी बसपा को चार सीट ही मिली, लेकिन उसे 21,28,333 मत मिला था। सपा को भी चार लाख से अधिक मत प्राप्त हुआ था। छत्तीसगढ़ में भी बसपा को एक ही सीट मिली थी, पर उसे मत 5,58,424 प्राप्त हुए थे। छत्तीसगढ़ में भाजपा को कांग्रेस पर केवल 97,584 मतों की ही बढ़त थी। यह आसानी से कल्पना की जा सकती है कि बसपा का साथ कांग्रेस को मजबूत कर सकता था। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और बसपा के गठबंधन के बाद कांग्रेस के लिए चुनौतियां भाजपा से ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में कांग्रेस का अतिआत्मविश्वास उसकी नैया डुबो सकता है। कांग्रेस कह रही है कि उसे हर हाल में भाजपा को हराना है। जाहिर है, इसके लिए तो उसे ही पहल करके दूसरे दलों को साथ जोड़ना चाहिए था। पिछले चुनाव का अंकगणित भी उसे आईना दिखा रहे थे।

लोकसभा चुनाव का अंकगणित तो कांग्रेस के लिए और भी बुरा था। अगर वह विपक्षी एकता की बात करती है तो उसे इन पार्टियों के साथ गठबंधन में उदारता दिखानी चाहिए थी। ऐसा न करके उसने विधानसभा चुनावों में तो जोखिम लिया ही है लोकसभा के संभावित गठबंधन पर भी कुठाराघात कर दिया है। कांग्रेस की हैसियत उत्तर प्रदेश में कुछ नहीं है। अगर सपा बसपा ने वहां से उसे बाहर कर दिया तो फिर सत्ता में आने का उसका सपना धरा रह जाएगा। आज की स्थिति में इसकी संभावना बढ़ गई है। बसपा एवं सपा को पता है कि उत्तर प्रदेश में उन्हें कांग्रेस की आवश्यकता नहीं है, कांग्रेस को इनकी आवश्यकता है। जाहिर है, चुनाव परिणाम जो भी हो तत्काल यह स्थिति भाजपा को राहत पहुंचाने वाली है। सबसे बड़ी बात कि 2019 का एकजुट विपक्षी गठबंधन पैदा होने के पहले ही मरनासन्न हो गया। अब कांग्रेस किस मुंह से दूसरे दलों को साथ आने के लिए कहेगी?

देश की पूरी राजनीतिक स्थिति को देखते हुए ही आगमी चुनावों की रणनीति तय करने के लिए आयोजित माकपा की तीन दिवसीय केंद्रीय समिति की बैठक में यह मान लिया गया है कि महागठबंधन संभव नहीं है। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि राज्यों में स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी की केंद्रीय समिति ने अलग-अलग राज्यों में धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ आपसी समझ के आधार पर चुनावी सहयोग कायम करने का फैसला किया है। माकपा केंद्रीय समिति ने आगामी लोकसभा और पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए तीन मुख्य लक्ष्य तय किए हैं। पहला भाजपा को हराना, दूसरा माकपा को मजबूत करना और तीसरा चुनाव के बाद वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन करना।

येचुरी कह रहे हैं कि प्रत्येक राज्य में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले वाली ऐसी सीटों पर माकपा अपने प्रत्याशी नहीं उतारेगी और भाजपा उम्मीदवार को हराने में सक्षम दल का समर्थन करेगी। जब गठबंधन हो नहीं सकता तो यही एकमात्र विकल्प रह गया है। वस्तुत: केवल भाजपा और मोदी विरोध कोई राजनीतिक सिद्धांत नहीं हो सकता। यह केवल सत्ता पाने का नारा है और जब लक्ष्य सत्ता पाना है तो फिर सबकी महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं। इसलिए कोई दिल से नहीं चाहता कि उसकी सीटें कम हों। उनको लगता है कि जिसके पास जितनी ज्यादा सीटें होंगी सत्ता के मोलभाव में उसकी ताकत उतनी ही होगी।

शरद पवार ने तो पहले ही कह दिया था कि चुनाव पूर्व कोई एक महागठबंधन संभव नहीं है। इस मामले में सबसे तेजी से आगे आने वाली ममता बनर्जी ही पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एवं वामदलों के साथ सीट समझौता को तैयार नहीं हैं। टीआरएस के एन चंद्रशेखर राव ने गैर कांग्रेस एवं गैर भाजपा मोर्चा की बात की है। तेलंगाना में तेलुगू देशम ने कांग्रेस के साथ जो सीट समझौता किया है वह तो टीआरएस के ही खिलाफ है। कुल मिलाकर विपक्ष ने महागठबंधन की गर्जना तो की, लेकिन इसे सीटों के सामान्य समझौते में भी साकार नहीं कर सकी। इससे वर्तमान विधानसभा तथा 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रभावित होना तय है।

राजनीतिक विश्लेषक

Posted By: Kamal Verma