[ हर्ष वी पंत ]: आखिर में यह बिना किसी खास बात के बेवजह का हंगामा साबित हुआ और भारतीय कूटनीतिक बिरादरी की अतिरेक भरी प्रतिक्रिया व्यर्थ रही। जब इस बारे में तमाम अनुमान लगाए जा रहे थे कि ट्रंप प्रशासन ने भारत और अमेरिका के बीच 6 जुलाई को प्रस्तावित टू प्लस टू संवाद को क्यों स्थगित कर दिया तब यह सामने आया कि इस संवाद का स्थगन अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो के अचानक उत्तर कोरिया दौर के चलते हुआ। माइक पोंपियो के सामने ट्रंप और किम के रिश्तों की संवेदनशील कड़ी को जोड़ने की बड़ी चुनौती है।

उत्तर कोरिया को साधने की पहल ट्रंप का अभी तक का सबसे बड़ा दांव है और वह किसी भी सूरत में नहीं चाहेंगे कि यह कवायद पटरी से उतर जाए। ऐसे में हैरानी नहीं कि भारत को कुछ इंतजार करने के लिए कहा गया। माना जाता है कि पिछले हफ्ते निक्की हेली का भारत दौरा अकस्मात नहीं था। इस दौरे का मकसद यही संदेश देना था कि भले ही टू प्लस टू को स्थगित किया गया हो, लेकिन भारत अमेरिका के लिए अहम साझेदार बना रहेगा। अमेरिका के साथ भारत के बहुत दिलचस्प रिश्ते हैं। जहां भारत में तमाम लोग यह दलील देंगे कि नई दिल्ली वाशिंगटन को लेकर निश्चिंत नहीं हो सकती वहीं वाशिंगटन से मिले प्रत्येक संकेत का कुछ जरूरत से ज्यादा ही विश्लेषण किया जाता है।

यदि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत का उल्लेख नहीं करते या कोई आधिकारिक वार्ता स्थगित हो जाए तो इसे इस रूप में प्रचारित किया जाता है कि भारत और अमेरिका के रिश्तों में ठहराव आने जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते अब कहीं अधिक परिपक्व हो गए हैं।

भारत और अमेरिका में चाहे जिस दल की सरकारें रही हों, लेकिन उन्होंने दलगत भावना से ऊपर उठकर द्विपक्षीय रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने के काफी प्रयास किए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने एकाध अवसरों को छोड़कर भारत को लेकर अमूमन अच्छी बातें ही बोली हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहा कि ओबामा प्रशासन के दौर में भारत और अमेरिका अतीत के हिचक भरे दौर को पीछे छोड़ चुके हैं तो ट्रंप के साथ शुरुआती मुलाकातों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि नए भारत के निर्माण को लेकर मेरा दृष्टिकोण और अमेरिका को फिर से महान बनाने का राष्ट्रपति ट्रंप का नजरिया हमारे सहयोग में नए आयाम जोड़ेगा।

उन्होंने ट्रंप का ध्यान उस बुनियादी हकीकत की ओर आकृष्ट किया जिसने जॉर्ज डब्लू बुश के दौर से भारत-अमेरिका संबंधों को नई तेजी दी। तब बुश ने एलान किया था कि भारत को एक वैश्विक शक्ति के तौर पर उभारने में अमेरिका पूरी मदद करेगा। ट्रंप की दक्षिण एशिया रणनीति में भी भारतीय चिंताओं को ध्यान में रखा गया है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर उनका रवैया भारतीय दृष्टिकोण के ही अनुरूप है। वास्तव में कोई रिश्ता भारत-अमेरिका संबंधों जितना व्यापक होगा तो उसमें कुछ परेशानियों का भाव स्वाभाविक ही है। इसमें ईरान का पेंच लगातार फंसा हुआ है।

अमेरिका ने भारत सहित सभी देशों से कहा है कि वे 4 नवंबर तक ईरान से अपना तेल आयात बंद करें। अगर भारत इसका पालन नहीं करता तो देसी कंपनियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। ईरान को लेकर ट्रंप प्रशासन ने अतिवादी रुख अख्तियार कर लिया है और इस मोर्चे पर वह कोई ढील देने को तैयार नहीं। वहीं ईरान भी इस मामले में तीखे तेवर दिखा रहा है। उसने भारत को हिदायत दी है कि ईरान के साथ तेल आयात कम करने का असर दोनों देशों के रिश्तों पर पड़ेगा।

रूस के साथ भारत के रक्षा सौदों पर भी अमेरिका की टेढ़ी नजर है। भारत रूस से सतह से हवा में मार करने वाली एस 400 मिसाइल खरीदने की प्रक्रिया में है जिस पर अब अमेरिकी ग्रहण लग गया है। असल में अमेरिका ने उन देशों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया है जो उसके द्वारा काली सूची में डाली गई 39 रूसी कंपनियों से किसी भी प्रकार का वित्तीय लेनदेन करेंगे। रूस के साथ भारत के मजबूत रक्षा संबंध हैं और भारतीय सुरक्षा बल रक्षा उपकरणों के कलपुर्जों से लेकर उनके रखरखाव और मरम्मत के लिए रूसी सहयोग पर बहुत निर्भर हैं।

ईरान और रूस से जुड़े मसलों के अलावा व्यापार भी भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव बढ़ा रहा है। ट्रंप प्रशासन नई दिल्ली पर आयात शुल्क घटाने का दबाव बढ़ा रहा है। ट्रंप ने भारत सहित कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर आरोप लगाया है कि वे कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर 100 प्रतिशत तक आयात कर वसूलते हैं। इस आधार पर उन्होंने इन देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म करने की धमकी तक दे डाली।

भारतीय इस्पात एवं एल्युमीनियम पर अमेरिका द्वारा एकतरफा आयात शुल्क बढ़ाने पर भारत ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए 23.5 करोड़ डॉलर के 29 अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। इन मसलों की प्रेतछाया भारत-अमेरिकी रिश्तों को अतीत के असहज वाले दौर में ले जा रही है। कई लोगों ने इसका उपहास उड़ाते हुए स्वागत भी किया है कि उन्होंने पहले ही चेताया था कि एक साझेदार के रूप में अमेरिका पर भरोसा न किया जाए, लेकिन हमेशा ही ऐसे मसले रहे हैं जब भारत और अमेरिका विपरीत ध्रुवों पर रहे हों। जब भारत और अमेरिका के बीच परमाणु करार पर वार्ता परवान चढ़ रही थी तब भी उसे पटरी से उतारने वाली लॉबी उसमें भारत-ईरान संबंधों की दुहाई दे रही थी।

आज जब ईरान का मसला फिर छाया है तो वाशिंगटन द्वारा केवल भारत को ही निशाना नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि अमेरिका बाकी देशों को भी आड़े हाथों ले रहा है यानी भारत अकेला भुक्तभोगी नहीं।

भारत प्रतिबंधों से राहत पाने की कोशिश के साथ ही वैकल्पिक भुगतान तंत्र तलाशने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि ईरान से लेनदेन जारी रहे। यह तय है कि निजी क्षेत्र ईरान से कन्नी ही काटेगा, भले ही सरकार की मंशा वहां उसकी सक्रियता में ही हो। अंदेशा यही है कि निजी क्षेत्र की भारतीय कंपनियां ईरान से अपना बोरिया बिस्तर समेट लेंगी।

रूस का मामला जरा अलग है और खुद ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्र्रेस में इसे लेकर भारत को रियायत देने की दलील दी है। ट्रंप प्रशासन को लगता है कि अगर उसके कानूनी प्रतिबंध लागू हुए तो इससे भारत-अमेरिकी रक्षा संबंधों को भी झटका लगेगा। उसने यह भी संकेत दिए हैं कि ईरान में चाबहार बंदरगाह के विकास को देखते हुए भारत को कुछ छूट दी जा सकती है।

ट्रंप प्रशासन के दौर में भारत-अमेरिकी संबंधों में कुछ अस्थिरता का भाव तो पैदा हुआ है, लेकिन इससे अविचलित हुए बिना नई दिल्ली आपसी संबंधों की मजबूत बुनियाद को लेकर आश्वस्त है। आत्मविश्वास से ओतप्रोत एक उभरती शक्ति के तौर पर भारत को बेवजह के कोलाहल से प्रभावित हुए बिना अमेरिका के साथ साझेदारी का पैमाना अपने लिहाज से तय करना चाहिए।

[ लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर हैं ]

By Bhupendra Singh