संजय दुबे। देश के बंद पड़ी आर्थिक गतिविधियों को फिर से तेजी देने के प्रयास तेज हो गए हैं। कोरोना संकट की सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र पर पड़ी है। कहने को यह क्षेत्र असंगठित जरूर है, किंतु अर्थव्यवस्था में इनका योगदान 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इस समय बेरोजगारी की दर 27 फीसद के आसपास हो गई है। इस कारण केंद्र सरकार काफी चिंतित भी है। उसके तमाम उपक्रम अपने-अपने हिसाब से कोविड के कारण उपजे हालात में फिर से देश की आर्थिक धुरी चलाने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसे ही ग्रामीण विकास मंत्रलय ने भी एक योजना शुरू की है जिससे काफी उम्मीदें हैं।

सरस कलेक्शन नामक इस योजना के तहत ग्रामीण इलाकों के स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों को केंद्र व राज्य सरकारों के खरीदारों को बेचा जाना है। इसमें हस्तशिल्प, हथकरघा और वस्त्र, कार्यालय प्रयोग के सामान, रसोई के सामान, राशन, व्यक्तिगत देखभाल और स्वच्छता संबंधी सामान को शामिल किया गया है। इस योजना के पहले चरण में 11 राज्यों के 913 स्वयं सहायता समूहों ने 442 सामानों को बेचने के लिए पंजीकरण कराया है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में चलने वाले स्वयं सहायता समूह को इनसे फायदा हो सकता है। इन समूहों का संचालन महिलाओं के हाथ में होने से इसमें बचत की प्रवृत्ति शुरू से ही रही है। ग्रामीण अंचलों में महिलाओं को इसने आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है।

दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना के तहत पहले से ही साढ़े चार करोड़ महिलाओं को शामिल किया जा चुका है। इसमें कृषि आधारित और गैर कृषि आधारित योजनाएं भी शामिल हैं। पहले से ही सरकारी तौर पर इस ग्रामीण आजीविका मिशन में शामिल होने के साथ साथ ‘सरस’ के आने से इन समूहों को एक और नया प्लेटफॉर्म मिल गया है। साथ ही इसको हाट बाजार जैसी जगहों पर ले जाने और खरीदार खोजने के नाम पर दलालों से मुक्ति मिलेगी।

अक्सर यह देखा जाता है कि राज्य सरकारों की तरफ से ऐसे समूहों के कारोबार के लिए हर वर्ष जिला स्तर पर एक निश्चित स्थान और समय पर इनके बाजार लगाए जाते हैं जिसमें राज्य सरकारें जनता को सीधे माल बेचने का इनको मौका मुहैया कराती हैं। फिर भी इनमें शामिल होने वाले कुछ स्वयं सहायता समूह हर जगह नहीं जा पाते हैं। किसी एक छोटे से उद्यम का हर जिले में लगने वाले इस तरह के मेले में शामिल हो पाना व्यावहारिक तौर पर आसान नहीं है। इन सारी असुविधाओं से बचने का सरस में बखूबी इंतजाम है, क्योंकि यहां एक बार रजिस्टर्ड हो जाने के बाद इनको उत्पादन और आपूर्ति पर पूरा ध्यान देने का मौका मिलेगा। सबसे खास बात अनिश्चितता की समाप्ति की है। इन्हें पहले से ही यह पता नहीं चल पाता कि इनका कौन सा उत्पाद कब और कितना बिकेगा? जबकि यहां इस तरह की कोई बात नहीं होगी।

पहले से ही जीईएम के ई मार्केट में अपने उत्पाद को जब ये अनुसूचित कर लेंगे तब उसके ऑर्डर प्राप्ति से उनको पता चल जाएगा कि उन्हें कौन सा माल बनाना है, कौन सा नहीं। किसकी मांग ज्यादा है, किसकी कम। बिकने के बाद ऑनलाइन स्वयं सहायता समूह के खाते में पैसा पहुंच जाएगा, तब जाहिर है इसका फायदा इनको मिलना तय है। उल्लेखनीय है कि जीईएम एक सरकारी ई मार्केट प्लेस है। इसको बनाने के पीछे सरकार की मंशा स्टार्टअप को बढ़ावा देने की है। इससे 25 फीसद सरकारी कंपनियों को माल खरीदने की अनिवार्य शर्त केंद्र सरकार ने रखी है। इसका फायदा यहां रजिस्टर्ड सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को खूब मिला। आज इस प्लेटफॉर्म पर 37 हजार से ज्यादा खरीदार और ढाई लाख के करीब विक्रेता और सर्विस प्रदाता हैं। अगर वास्तव में इसे कारोबारी तरीके से संचालित किया जाता रहा तो इनसे आत्मनिर्भरता का रास्ता खुलना तय है। यदि ऐसा होता है तो इसका कई स्तरों पर लाभ मिलेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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