[पुष्पेंद्र सिंह]। अमेरिका द्वारा ईरान के एक सैनिक जनरल को मारे जाने और ईरान की फिलहाल सीमित जवाबी कार्रवाई के बाद खाड़ी क्षेत्र में एक तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। हमारा देश अपनी मांग के लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है। 2018-19 में हमने लगभग 8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 22.6 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था जिसमें से लगभग आधा खाड़ी देशों से आया था। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर हमारी तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है। यदि कलह बढ़ी तो कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने से हमारा आयात महंगा होगा। डीजल, पेट्रोल, गैस आदि की महंगाई का असर किसान की लागत पर सीधा पड़ता है, क्योंकि ट्रैक्टर, डीजल इंजन और अन्य मशीनों को चलाने की लागत बढ़ेगी।

कच्चे तेल के महंगा होने से खाद के दाम बढ़ेंगे

महंगाई दर बढ़ने के कारण अपने इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं किसान को और महंगी खरीदनी होंगी। रुपये की कीमत गिरने से आयातित खाद के दाम भी बढ़ेंगे। कच्चे तेल से प्राप्त कई उत्पादों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों को बनाने में भी होता है। इस कारण खाद और कच्चे तेल के दाम एक दिशा में चलते हैं। अत: कच्चे तेल के महंगा होने से देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह के खाद के दाम बढ़ेंगे और खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल भी बढ़ेगा।

रोजगार और आमदनी पर भी पड़ेगा असर

तेल के दाम यदि ज्यादा बढ़ गए तो देश का राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा। खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख भारतीय रह रहे हैं जो 4,000 करोड़ डॉलर (लगभग 285,000 करोड़ रुपये) सालाना भारत भेजते हैं। यदि अशांति फैली तो उनके रोजगार और आमदनी पर भी असर पड़ेगा जिससे देश में आने वाली यह विदेशी मुद्रा भी खतरे में पड़ जाएगी। अत: सरकार के हाथ में संसाधन कम होंगे जिससे कृषि, ग्रामीण योजनाओं के बजट और कृषि निवेश में कटौती हो सकती है। पहले ही मंदी से जूझ रही हमारी अर्थव्यवस्था और कमजोर हो जाएगी, जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। इस अशांत माहौल का प्रभाव इन देशों में हो रहे हमारी कृषि जिंसों के निर्यात पर भी पड़ेगा।

किसानों की आय पर कैसे पड़ेगा असर?

इसे हमारे चावल के निर्यात से समझा जा सकता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। हम 120 से 130 लाख टन चावल का निर्यात प्रति वर्ष करते हैं। 2018-19 में हमने 471 करोड़ डॉलर मूल्य के बासमती चावल और 304 करोड़ डॉलर मूल्य के गैर-बासमती चावल का निर्यात किया था। इस प्रकार कुल मिलाकर 2018-19 में हमने लगभग 55,000 करोड़ रुपये मूल्य के चावल का निर्यात किया था। पिछले साल लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के बासमती चावल के निर्यात में से लगभग 11,000 करोड़ रुपये यानी एकतिहाई हिस्सेदारी ईरान की थी।

भारतीय चावल की मांग घट रही 

2018-19 में हमने ईरान से लगभग 2.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था, परंतु ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण मई 2019 से हमें भी ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद करना पड़ा। इस कारण ईरान को होने वाले हमारे निर्यात के भुगतान की समस्या खड़ी हो गई जिससे इस निर्यात पर बहुत ही नकारात्मक असर पड़ा। इसका प्रभाव बासमती चावल की कीमतों पर भी पड़ रहा है। 1121 प्रीमियम किस्म के बासमती चावल का निर्यात भाव छह-सात महीने पहले लगभग 1200 डॉलर प्रति टन था। अब यह गिरकर लगभग 900 डॉलर प्रति टन के आसपास आ गया है जो पिछले पांच साल का सबसे कम दाम है। ईरान से तेल ना खरीदने के कारण पहले ही भारतीय चावल की मांग वहां घट रही थी। अब खाड़ी देशों में अस्थिरता को देखते हुए हमारे बासमती चावल की मांग और कीमतों के और नीचे जाने की आशंका है।

देशों में तनाव से चावल की कीमतों पर दबाव

देश पहले ही गेहूं-चावल के अत्यधिक मात्रा में भंडार होने से परेशान है। दिसंबर 2019 में भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में लगभग 213 लाख टन चावल और 352 लाख टन गेहूं थे। यानी कुल मिलाकर इन दोनों खाद्यान्नों का स्टॉक 565 लाख टन था, जबकि एक जनवरी को यह बफर स्टॉक 214 लाख टन होना चाहिए। इसके अलावा 260 लाख टन धान भी गोदामों में पड़ी है, परंतु अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण निर्यात घटने और खाड़ी देशों में तनाव से चावल की कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा। इस साल पंजाब में किसानों को 1121 किस्म की बासमती धान का भाव 2800 से 3000 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, जो पिछले साल ईरान से अच्छी मांग के चलते 3600-3800 रुपये प्रति क्विंटल था।

भारत ने 2013-14 में 4,325 करोड़ डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, जो 2016-17 में गिरकर 3,370 करोड़ डॉलर पर आ गया था। इसके बाद के वर्षों में इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई, परंतु 2019-20 में अप्रैल से सितंबर की पहली छमाही में यह केवल 1,730 करोड़ डॉलर के स्तर पर है। खाड़ी देशों में अशांति और अनिश्चितता के कारण 2019-20 की दूसरी छमाही में इसमें और गिरावट आ सकती है। कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी को बढ़ाने में भी मददगार होता है, लेकिन 2020 की शुरुआत में ही पश्चिम एशिया पर छाए अशांति के बादल हमारे देश के लिए, वहां रह रहे भारतीयों और विशेषकर हमारे किसानों के लिए अच्छी खबर नहीं है।

[अध्यक्ष, किसान शक्ति संघ]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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