[ सूर्यकुमार पांडेय ]: यह विशुद्ध शॉर्टकट का दौर है। संक्षिप्तता ही सामान्य दस्तूर बन गई है। वही चलन में है। मसलन सीएफएल, एटीएम, सिम, जीएसएम, सीडीएमए आदि-इत्यादि। जो लोग इनका प्रयोग कर रहे हैं वे तक नहीं जानते हैं कि इन शब्दों की फुलफॉर्म क्या हैं? यदि छोटे रास्ते से काम बन रहा है तो लंबी राह कोई भी नहीं चुनना चाहता है। अब तो लोगों के नामों तक का संक्षिप्तीकरण होने लग गया है। हमारे क्षेत्र के एक निवर्तमान सांसद बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह को ही देख लीजिए। एक जमाने में क्या ही लंबा-चौड़ा नाम हुआ करता था। भारी-भरकम रुतबा भी था, इसीलिए सांसद भी बने थे, लेकिन बनने के तत्काल बाद ही किसी समर्थक ने सुझाव दिया था-भैया जी, अब आप माननीय हो गए हैं। कल को आप मंत्री भी हो सकते हैं। तब आपके नाम के आगे बाबू लगा होने से लोगों को भ्रम हो सकता है कि आप पहले किसी सरकारी कार्यालय में लगे रहे होंगे, तो इसको हटाइए। बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह बोले- वाकई तुमने उचित परामर्श दिया है। अब तो बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी भी मेरे सामने कुर्सी छोड़कर खड़े होते हैं। इसलिए मैं आज से ही अपने नाम के आगे न बाबू लगाऊंगा और न ही किसी को लगाने दूंगा। इस तरह वह बाबू का परित्याग कर अब मात्र विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह ही रह गए।

विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह के सांसद बनने के लगभग दो महीने बाद एक और वाकया हुआ। किसी नवोदित सजातीय चमचे ने फरमाया, ‘सर, चुनाव में धनबल, गनबल और जनबल के चलते ही आपकी विजय हुई थी। अब आप जीतकर निश्चिंत हो लिए हैं। दिन-रात अपने लोगों के ही विकास की बातें सोचते रहते हैं। उधर आपके विपक्षी दल आप पर आरोप लगाने लगे हैं। वे सब कहने लग गए हैं कि आप जन-जन के नेता नहीं हैं। आप तो बस अपनी जाति के लोगों की तरक्की की ही बातें सोचते हैं। इसलिए मेरा सुझाव मानिए और अपने जातिनाम का परित्याग कर दीजिए। विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह को यह सुझाव भी सार्थक और सामयिक लगा था। हालांकि चुनाव जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण और अपने लोगों की मेहनत के बल पर ही जीते जाते हैं तथापि अन्य जाति-धर्म के मतदाताओं में गलत संदेश नहीं जाना चाहिए। आगे भी तो जनता के बीच वोट मांगने जाना ही पड़ेगा। उस दिन के बाद से विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह घट-घटाकर विश्वमोहन प्रताप नारायण ही तक सिमटकर रह गए।

एक बार विश्वमोहन प्रताप नारायण अपनी पार्टी के आलाकमान से मिलने पहुंचे। आलाकमान ने कहा-विश्वमोहन प्रताप नारायण जी, आपका यह नाम जरूरत से कुछ अधिक लंबा है। आज के समय में यह नहीं चलेगा। आज की राजनीति को समझिए। अब पार्टियां तक भाजपा, सपा, बसपा, रालोद, सीपीआइ, सीपीएम, जदयू, आप और हम तक बोली जाती हैं। लंबे नाम पहले भी हुआ करते थे। मसलन जयप्रकाश नारायण और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता भी जेपी और वीपी नामों से ही पहचाने गए। अब आप भी अपने नाम को तनिक छोटा कर लें तो उचित रहेगा। अब विश्वमोहन प्रताप नारायण किस मुंह से कहते कि पहले ही अपने मूल नाम का आगा-पीछा कटवा चुके हैं। आलाकमान के सामने न किसी का कोई तर्क चलता है और न मुंह खोलने की जुर्रत होती है। वे बाहर निकले और तुरंत घोषणा कर दी कि आज से अब मेरा नाम विश्वमोहन हो गया है। मुझे भविष्य में इसी नाम से जाना जाए।

कहते हैं, वोटर की स्मरणशक्ति कमजोर होती है। वह अपने नेताओं के पिछले कृत्य भुला देती है तो भला बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह के नाम की क्या ही औकात थी? सो वे भी अपने निर्वाचन क्षेत्र में विश्वमोहन जी के नाम से लोकप्रिय हो गए। बहुतों को तो यह तक याद नहीं रहा कि ये वाले वो ही हैं! इस बीच बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह ने नाम के बाद अपना दल-बदल भी कर लिया था। चेहरा-मोहरा, स्वास्थ्य, पहनावा, रहन-सहन सब बदल चुके थे। लोग तो यहां तक कहने लग गए थे कि उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी करा ली है। इस बार भी विश्वमोहन जी चुनाव में खड़े हैं।

अब विश्वमोहन का नाम और भी संक्षिप्त होकर वीएम रह गया है। इस छोटे से नाम के साथ वह चुनावी तकदीर का फैसला करने वाली ईवीएम के दूर के रिश्तेदार भी लगने लगते हैं। ऐसे में अगर ईवीएम की कृपा हो गई तो वह फिर से एमपी बनेंगे। यदि पीएम की कृपा हो गई तो वीएम जी मंत्रिपद की शपथ भी खा लेंगे। तब डीएम, एडीएम, एसडीएम, सीजीएम, जीएम, डीजीएम, एजीएम एएम से पीएम तक चौबीसों घंटे उनकी सेवा में तत्पर पाए जाएंगे।

[ लेखक हास्य-व्यंग्यकार हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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