चुनाव आयोग द्वारा अखिलेश यादव गुट को समाजवादी पार्टी की मान्यता देने और साइकिल चुनाव चिन्ह आवंटित करने के बाद मुलायम सिंह की ओर से अपने प्रत्याशी न खड़ा करने और कांग्रेस द्वारा सपा के साथ गठबंधन को हरी झंडी देने से अखिलेश और उनके समर्थकों के हौसले बुलंद हैं। उनका मानना है कि अब उत्तर प्रदेश में आगामी सरकार सपा-कांग्रेस की ही बनेगी और भाजपा का पत्ता साफ होगा। अखिलेश समर्थकों का यह भी मानना है कि अगर सपा-कांग्रेस का भावी गठबंधन बिहार की तर्ज पर कई पार्टियों के महागठबंधन का रूप लेता है तो उत्तर प्रदेश में भी वैसे ही परिणाम आएंगे जैसे जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन से आए थे, लेकिन ऐसा सोचना अभी जल्दबाजी होगी। अनेक प्रश्न हैं जो अभी अनुत्तरित हैं। आखिर ऐसी क्या बात थी कि अखिलेश यादव कांग्रेस से गठबंधन को लेकर इतने उतावले थे? वह कौन सी गणित है जिसके बलबूते वह यह सोचते हैं कि कांग्रेस-सपा गठबंधन तीन सौ से ज्यादा सीटें पाएगा? सवाल यह भी है कि क्या अभी कल तक सपा में मचे घमासान का पार्टी के प्रदर्शन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? अगर 2012 विधानसभा चुनावों के नतीजों पर गौर करें तो 224 सीटें जीतने के बावजूद सपा को केवल 29.15 फीसद मत मिले थे जो स्वतंत्रता के बाद से किसी भी सत्तारूढ़ दल को मिलने वाले मतों में सबसे कम थे। यहां तक कि 2007 में जब केवल 206 सीटें जीत कर मायावती की सरकार बनी तब भी बसपा को 30.43 प्रतिशत मत मिले थे। कुछ जातियां जैसे यादव, ठाकुर और मुस्लिम सपा के परंपरागत मतदाता हैं, लेकिन जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनावों में 77 फीसद ठाकुरों, 27 फीसद यादवों और 10 फीसद मुसलमानों ने भाजपा के पक्ष में वोट किया उससे सपा न केवल पांच लोकसभा सीटों पर सिमट गई, वरन यह भी स्पष्ट हो गया कि उसका अपने वोट-बैंक पर एकाधिकार नहीं रहा।
लोकसभा के चुनाव नतीजों ने अखिलेश को संकेत दे दिया था कि उनके पिता और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का जलवा अब एक ‘मिथक’ है जिससे उनको बाहर निकलना है और राजनीति की वास्तविकता से रूबरू होना है। शायद इसी के बाद उन्होंने अपने को सरकार और पार्टी दोनों में सक्रिय करना शुरू कर दिया और साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों की छवि तोड़कर एक मात्र मुख्यमंत्री बन बैठे। दरअसल इसीलिए सपा में घमासान देखने को मिला। इसमें दो राय नहीं कि पार्टी में घमासान के बाद अखिलेश सपा के युवा सुप्रीमो के रूप में उभर आए हैं, लेकिन उन्हें यह जरूर पता होगा कि सपा का सिमटता जनाधार उनको विजय से वंचित कर सकता है और इसकी भरपाई करने के लिए किसी ऐसे दल से गठबंधन करना ठीक रहेगा जिसकी पहचान हो, जिसकी पूरे प्रदेश में उपस्थिति हो और जो उनके नेतृत्व को चुनौती भी न दे सके। इसके लिए कांग्रेस सबसे सटीक पार्टी है, क्योंकि वह भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपने पुराने जनाधार-ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम की तलाश में है। चूंकि कांग्रेस का ब्राह्मण-दलित जनाधार सपा के ठाकुर-यादव जनाधार का प्रतिस्पर्धी नहीं इसलिए अगर कांग्रेस-सपा गठबंधन होता है तो दोनों को एक-दूसरे के जनाधार का लाभ मिल सकेगा।
कांग्रेस को 2007 में 14 प्रतिशत, 2009 में 25 प्रतिशत और 2012 में 18 प्रतिशत मुस्लिम मत मिले थे। जाहिर है कि सपा को एकमुश्त मुस्लिम मत तो नहीं मिलेंगे, लेकिन कांग्रेस से गठबंधन के कारण वे बिखरेंगे नहीं और उन्हें गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने में आसानी रहेगी। इस गणित से यदि पिछले चुनावों में सपा के 29 फीसद मतों में कांग्रेस के 12 फीसद मत जोड़ दें तो सपा बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर सकती है। इसमें एक छिपी हुई परिकल्पना यह है कि सपा और कांग्रेस अपने-अपने मतों को एक-दूसरे के पक्ष में हस्तांतरित करा सकेंगे। मुस्लिम मतों के साथ ऐसा संभव है, क्योंकि वे भाजपा के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि ये पार्टियां गैर-मुस्लिम मतों का भी हस्तांतरण करा पाएंगी। इसके अलावा अगर मुस्लिम मतों की गोलबंदी सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में हुई तो प्रतिक्रियास्वरूप हिंदू मतों का धु्रवीकरण भाजपा के पक्ष में संभव है, जो अखिलेश की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। मायावती नई सोशल इंजीनियरिंग के चलते लगभग 97 मुस्लिमों को टिकट दे रही हैं। ओवैसी की पार्टी मजलिस-ए-इत्तिहादुल-मुसलमीन भी कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है। वह भी मुस्लिम मतों की दरकार रखती है। जाहिर है कि इससे मुस्लिम मतों का विभाजन होगा जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विकास के लिए ख्याति अर्जित की है, लेकिन ख्याति अर्जित करने और वोट अर्जित करने में फर्क है। विगत कुछ समय से पार्टी और सरकार में मचे घमासान से सरकारी कामकाज दुष्प्रभावित हुआ है, विकास की गति धीमी हुई है, अपराध बढ़े हैं और अधिकारी बेलगाम हुए हैं। आखिर इसकी भरपाई कौन करेगा? समाज का एक बड़ा वर्ग अखिलेश के साथ हो लिया था, लेकिन उसमें से एक महत्वपूर्ण घटक उनसे छिटक गया है। आम लोग सपा में लंबी लड़ाई से ऊब गए और दूसरी पार्टियों की ओर देखने लगे, क्योंकि उन्हें लगा कि सपा नेता तो आपस में ही उलझे हैं और उनको जनता की सुध कहां? सपा-कांग्रेस गठबंधन से इन दोनों दलों को एक और समस्या होने वाली है। पिछले चुनावों में कांग्रेस का रालोद से गठबंधन था और कांग्रेस 355 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। कांग्रेस-सपा गठबंधन से उसे लगभग 100 के आसपास सीटें ही मिलेंगी। ऐसी स्थिति में जिन तमाम निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस अपने उम्मीदवार नहीं उतार पाएगी वहां तो कांग्रेस संगठन ही विलुप्त हो सकता है। खबरों के अनुसार ऐसे कुछ क्षेत्रों के कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा में सम्मिलित हुए हैं। ऐसे लोगों को टिकट और अपना जनाधार देकर भाजपा सीट अपने खाते में डाल सकती है। इसी तरह सपा यदि 100-125 सीटें गठबंधन के सभी घटक दलों को देती है तो उतनी ही सीटों पर तैयारी कर रहे सपा प्रत्याशियों का क्या होगा? वे किधर जाएंगे? यदि वे स्थानीय स्तर पर गठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी का विरोध करेंगे तो सपा के मतों का कांग्रेस के पक्ष में हस्तांतरण कैसे होगा? ये कुछ ऐसी गुत्थियां हैं जिनको हल किए बिना कांग्रेस-सपा गठबंधन के परिणामों का आकलन करना भ्रामक होगा।
अभी तक यही माना जाता रहा है कि केवल मायावती ही अपने दलित मतदाता के मतों का हस्तांतरण करा पाती हैं, लेकिन हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि दलितों में भी अब उनके प्रति उतनी प्रतिबद्धता नहीं रही। पढ़े-लिखे और सोशल-मीडिया से जुड़े युवा दलितों में अन्य पार्टियों खासकर भाजपा के प्रति रुझान बढ़ा है। 2014 के चुनावों में 45 फीसद गैर-जाटव दलितों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। अति दलितों को मायावती से नाराजगी है कि वे जाटव जाति को ज्यादा तरजीह देती हैं। ऐसा मानने वालों का भी रुझान भाजपा की ओर है। कुछ दलितों का यह भी मानना है कि यदि इस बार मायावती मजबूती से चुनाव नहीं लड़तीं तो वे सपा को रोकने के लिए भाजपा को वोट देंगे। इस प्रकार सपा-कांग्रेस-गठबंधन, भाजपा और बसपा के त्रिकोणीय संघर्ष में अनेक कारक हैं जो चुनावी नतीजों को बेहद रोमांचक बनाएंगे।
[ लेखक डॉ. एके वर्मा, राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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