[ संजय गुप्त ]: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों द्वारा दिल्ली को घेर कर कृषि कानूनों को हटाने के लिए जो आंदोलन चलाया जा रहा है, वह अब एक जिद में तब्दील हो गया दिखता है। किसान नेताओं ने सरकार के उस प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें इन कानूनों को डेढ़ साल तक रोकने को कहा गया था। इससे यही लगता है कि किसान नेताओं का मकसद सरकार को नीचा दिखाना है। किसान नेता उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाई गई कमेटी के सामने भी अपनी बात कहने को तैयार नहीं। वे कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी को कानूनी रूप देने पर अड़े हैं। किसान नेताओं के इसी रवैये को देखते हुए सरकार को यह कहना पड़ा कि अब उसके पास उनके लिए कोई प्रस्ताव नहीं। वास्तव में इसका कोई औचित्य नहीं कि सरकार तो लगातार नरमी दिखाए, लेकिन किसान नेता टस से मस न हों।

कांग्रेस एवं वाम दलों की दिलचस्पी किसानों को उकसाने में अधिक

नि:संदेह भारत का किसान गरीब है, लेकिन सारे किसान गरीब नहीं हैं और जो किसान करीब दो महीने से दिल्ली में डेरा डाले हैं, वे तो खास तौर पर अपनी समृद्धि के लिए जाने जाते हैं। इसकी पुष्टि पंजाब, हरियाणा से लाखों ट्रैक्टर दिल्ली लाने की तैयारी से भी होती है। किसान ये ट्रैक्टर अपने खर्चे से लाएंगे और ले जाएंगे। संपन्नता के चलते ही यहां के किसान आमतौर पर दिहाड़ी मजदूरों से खेती कराते हैं। इसी कारण वे अपना काम-धाम छोड़कर इतने दिन से दिल्ली में डटे हैं। चूंकि किसान संगठनों को समर्थन दे रहे कांग्रेस एवं वाम दलों की दिलचस्पी किसानों को उकसाने में अधिक है इसलिए वे यह कहने को तैयार नहीं कि किसान गणतंत्र दिवस की गरिमा का ध्यान रखें। अपेक्षाकृत समृद्ध किसान तो दिल्ली में डेरा डाले हैं, लेकिन आम किसान उनके आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं। वे इस आंदोलन में अपना हित नहीं देख रहे हैं।

पंजाब और हरियाणा के किसानों का एमएसपी पर एकाधिकार

कई किसान संगठन तो कृषि कानूनों को अपने लिए जरूरी मान रहे हैं। इसका कारण यह भी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का अधिकतर लाभ पंजाब और हरियाणा के किसान उठाते हैं। एक तरह से एमएसपी पर उनका एकाधिकार है। एमएसपी का लाभ उठाने वाले किसान उसे कानूनी रूप देने की मांग करने के साथ यह भी चाह रहे हैं कि उन्हेंं पराली जलाने से रोका न जाए और न ही बिजली की सब्सिडी में कटौती की जाए। पंजाब और हरियाणा के किसान यह समझने को तैयार नहीं कि धान की जरूरत से ज्यादा खेती के चलते भूजल का स्तर नीचे जा रहा है। इसके कारण उपजी समस्याएं गंभीर रूप लेती जा रही हैं। एक आकलन के अनुसार अगर दक्षिणी पंजाब में भूजल दोहन बंद नहीं हुआ तो वह रेगिस्तान में बदल सकता है। इस खतरे से पंजाब सरकार के साथ किसान भी अवगत हैं, लेकिन वे धान की खेती कम करने को तैयार नहीं। दरअसल एमएसपी के लालच में धान की खेती की जा रही है।

एमएसपी जिस मकसद के लिए शुरू की गई थी, वह पूरा हो गया

देश में सबसे पहले 1966-67 में गेहूं के लिए एमएसपी की घोषणा की गई थी। तब अनाज की तंगी से जूझ रहे देश में कृषि उत्पादन बढ़ाना और गरीबों के लिए अन्न का प्रबंध करना प्रमुख लक्ष्य था। एमएसपी जिस मकसद के लिए शुरू की गई थी, वह पूरा हो गया है। अब एमएसपी के दायरे वाली कई फसलों और खासकर गेहूं और धान का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो रहा है, लेकिन राजनीतिक कारणों से उनकी भी सरकारी खरीद करनी पड़ती है।

एमएसपी अधिक उपज वाली फसलों के लिए नहीं थी और न ही होनी चाहिए

एमएसपी अधिक उपज वाली फसलों के लिए नहीं थी और न ही होनी चाहिए। एमएसपी तो उन्हीं फसलों के लिए होनी चाहिए, जिनकी पैदावर कम है और जिनका आयात करना पड़ता है। एमएसपी पर अनाज की खरीद सरकारी मंडियों से होती हैं और यह एक हकीकत है कि उनमें भ्रष्टाचार पनप गया है। यह भ्रष्टाचार अफसरों और बिचौलियों की मिलीभगत से होता है। हैरानी की बात है कि किसान नेता इस भ्रष्टाचार पर कुछ कहने के लिए तैयार नहीं। वे यह देखने को भी नहीं तैयार कि गैर जरूरी फसलें उगाना न तो उनके हित में है और न ही देश के।

तमाम देशों के किसान आय के मामले में देश के किसानों से कहीं अधिक आगे निकल गए हैं।

भारतीय किसानों के पिछड़ेपन के लिए सरकारी नीतियां उत्तरदायी

भारतीय किसानों के पिछड़ेपन के लिए सरकारी नीतियां भी उत्तरदायी रहीं और परंपरागत खेती का प्रचलन भी। आजादी के बाद भारत में अन्न की कमी थी और उसके चलते उसका आयात करना पड़ता था। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। बदली हुई स्थितियों में यह आवश्यक है कि किसान मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाएं यानी बाजार के साथ तालमेल करें। 1990 के दशक में जैसे उद्योग-व्यापार जगत को मुक्त अर्थव्यवस्था के दायरे में लाया गया, वैसे ही कृषि को भी लाने की जरूरत है। किसान नेता इस जरूरत को समझने से इन्कार कर रहे हैं। ऐसा करके वे आम किसानों का अहित ही कर रहे हैं। उन्हेंं यह देखना चाहिए कि आज देश के तमाम किसान अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में आकर ठीक-ठीक कमाई कर रहे हैं। किसानों के लिए यह जरूरी है कि वे परंपरागत फसलें उगाने के बजाय आय के अन्य स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करें।

कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल मोदी सरकार को नीचा दिखाने की रणनीति पर चल रहे हैं

किसान नेताओं की तरह कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल भी किसान आंदोलन की आड़ में मोदी सरकार को नीचा दिखाने की रणनीति पर चल रहे हैं। विपक्षी दल यह जानते हैं कि किसानों की हालत में सुधार लाने की जरूरत है और यह सुधार खेती को बाजार आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़ने से होगा। इसी कारण कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वैसे कानूनों की वकालत की थी, जैसे कानून मोदी सरकार ने बनाए हैं, लेकिन आज राहुल गांधी किसानों को बरगलाने के साथ मोदी को किसानों का दुश्मन बता रहे हैं।

नकारात्मक रवैये से कभी कुछ हासिल नहीं किया जा सकता

कांग्रेस सरीखे दलों को तो किसानों की परवाह नहीं, लेकिन किसान नेताओं को यह समझना चाहिए कि पुरानी व्यवस्था और खेती के तौर-तरीकों से चिपके रहने से किसानों को कुछ हासिल नहीं होने वाला। किसान नेताओं के कहने पर दिल्ली आए किसानों को भी यह समझना चाहिए कि वे संकीर्ण राजनीति का मोहरा बनाए जा रहे हैं। अभी भी समय है, किसान हित की वास्तव में चिंता कर रहे किसान नेताओं को कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक रोकने के सरकार के प्रस्ताव पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। किसी समस्या का समाधान सकारात्मक रवैये के साथ बातचीत करने से ही निकलेगा। नकारात्मक रवैये से कभी कुछ हासिल नहीं किया जा सकता।

[ लेखक दैनिक जागरएा के प्रधान संपादक हैं ]

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