[ हृदयनारायण दीक्षित ]: झूठ का अस्तित्व नहीं होता। स्वार्थी तत्व अपने हित साधन में झूठ का प्रचार करते हैं, लेकिन सत्य बार-बार अपना अस्तित्व प्रकट करता है। ऐसा ही एक झूठ ब्रिटिश सत्ता के समर्थक इतिहासकारों द्वारा फैलाया गया कि आर्य विदेशी थे, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया। इन झूठ प्रचारकों के अनुसार भारत का अपना कोई इतिहास, सभ्यता और संस्कृति ही नहीं है। भारत का संपूर्ण इतिहास पराजय का इतिहास है, लेकिन इस महाझूठ का लगातार पर्दाफाश हो रहा है। हरियाणा के राखीगढ़ी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआइ की खोदाई से हाल में नमस्कार की मुद्रा वाली एक सुंदर मूर्ति मिली है। यह लगभग छह से आठ हजार वर्ष प्राचीन है। यह भारत की हजारों वर्ष प्राचीन सभ्यता का एक और साक्ष्य है। इससे एक बार फिर आर्यों को विदेशी बताने का षड्यंत्र अनावृत्त हो गया है।

सिनौली में 2000-1800 ईसापूर्व के समय का ताम्र मूर्तियों से सुसज्जित रथ मिला था

नमस्कार वैदिक काल से आधुनिक काल तक भारत का अभिवादन है। ऋग्वेद में सूर्य, पृथ्वी, नदी, वरिष्ठों, कनिष्ठों पूर्वजों को नमस्कार के विवरण हैं। दिलचस्प यह है कि ऋग्वेद में नमस्कार भी एक देवता हैं। भारतीय संस्कृति का ऐसा सत्य बार-बार प्रकट हो रहा है। कुछ समय पहले इसी राखीगढ़ी और बागपत के सिनौली में भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्री मिली थी। सिनौली में 2000-1800 ईसापूर्व के समय का ताम्र मूर्तियों से सुसज्जित रथ मिला था। रथ का ऋग्वेद में कई स्थलों पर उल्लेख है। यह महाभारत और रामायण में भी है।

राखीगढ़ी में प्राप्त रथ वेद और महाकाव्यों के रथ उल्लेख को सही ठहराता है

राखीगढ़ी में प्राप्त रथ वेद और महाकाव्यों के रथ उल्लेख को सही ठहराता है। रथ सुमेरी सभ्यता में भी थे, पर उनके पहियों में आरे नहीं थे। बागपत में खोदाई से प्राप्त दो हजार वर्ष पुराना रथ वैदिक सभ्यता का मुख्य साक्ष्य है। राखीगढ़ी में पांच हजार वर्ष पुराने नर कंकाल के डीएनए परीक्षण में ऐसे ही निष्कर्ष मिले थे। डेक्कन कॉलेज, पुणे के कुलपति वसंत सिंधे व बीरबल साहनी प्रयोगशाला, लखनऊ के प्रमुख डॉ. नीरज के नेतृत्व में डीएनए विश्लेषण हुए थे। इस अध्ययन के अनुसार शव संस्कार की पद्धति वैदिक काल से मिलती-जुलती है।

कृषि का विकास भारत में ही हुआ था, ईरान से खेती की तकनीक आने की बात गलत 

डॉ. नीरज के अनुसार कृषि का विकास भी भारत में ही हुआ था। ईरान से खेती की तकनीक आने की बात गलत है। निष्कर्ष ऋग्वेद व हड़प्पा सभ्यता से मिलते-जुलते हैं। कृषि विकास के प्रमाण ऋग्वेद में है। ऋग्वेद में र्विणत कृषि व्यापार व सभ्यता के सूत्र हड़प्पा और राखीगढ़ी से प्राचीन हैं। आर्यो का मुख्य व्यवसाय कृषि और व्यापार भी था। ऋग्वेद में एक जुआरी का उल्लेख है। वह जुआ खेलता है। पश्चाताप करता है। ऋषि कहते हैं कि, ‘जुआ छोड़ो, कृषि करो।’

ऋग्वेद में हल, हसिया, सूप और अनाज भरने वाले कोठे के उल्लेख हैं

ऋग्वेद में हल, हसिया, सूप और अनाज भरने वाले कोठे के भी उल्लेख हैं। सभी देश अपनी संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करते हैं, लेकिन भारत में पूर्वज आर्यों को भी विदेशी सिद्ध करने का अभियान है। वैदिक काल में यहां भौतिकवादी, यथार्थवादी, सर्वात्मवादी, भाववादी विचारों का प्रवाह है। वैदिक काल से लेकर अब तक प्राचीन ग्रंथों और श्रुति-स्मृति में आर्य आक्रमण का उल्लेख नहीं है। ऐसे उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र व आयुर्वेद के ग्रंथ चरक संहिता में भी नहीं हैं। ह्वेनसांग, फाह्यान की यात्राओं के विवरण सहित किसी प्रमुख ग्रंथ, लोकगीत या लोककथा में भी आर्य आक्रमण के कोई संकेत नहीं हैं। पुरातात्विक सामग्री व अभिलेखों में भी आर्य आक्रमण पर कोई सामग्री नहीं है।

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का क्षेत्र व केंद्र भारत था, हड़प्पा सभ्यता वैदिक सभ्यता का विस्तार है

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का क्षेत्र व केंद्र भारत था। ऋग्वेद इसका साक्ष्य है। हड़प्पा सभ्यता वैदिक सभ्यता का विस्तार है। जॉन मार्शल ने इस सभ्यता का विस्तार गंगा, यमुना, नर्मदा और ताप्ती की घाटियों तक माना था। उत्तर पूर्व में इसके अवशेष पंजाब के रोपड़ तक मिले थे। अफगान सीमा तक इस सभ्यता का विस्तार था। बक्सर की गंगा घाटी और बंगाल में भी प्रागैतिहासिक काल की पुरातात्विक सामग्री मिली है। पश्चिम में कलात स्टेट और बलूचिस्तान के पूर्वी भाग में आर्य सभ्यता का विस्तार था। सिंधु और पंजाब में यह सभ्यता एक जैसी प्रवाहमान रही। गुजरात के लोथल से भी उपयोगी अवशेष मिल चुके हैं और राजस्थान के काली बंगन से भी। काठियावाड़ से मकरान तक और सौराष्ट्र से पूर्वी राजस्थान व पंजाब तक इस सभ्यता का विस्तार था। हड़प्पा सभ्यता सिंधु घाटी तक ही न सीमित रहकर मेरठ, रोपड़, अंबाला और दक्षिण में सूरत, राजस्थान के घग्घर क्षेत्र सहित सौराष्ट्र, उत्तरी गुजरात और कच्छ में सूर्य कोटडा तक विस्तृत थी। इसके नगरों का वास्तु मिस्न और बेबीलोन से उच्च कोटि का था।

सुमेरी, मिनौवन, मितन्नी और हित्ती सभ्यताएं ऋग्वेद के रचना काल के बाद की हैं

राखीगढ़ी में 8,000 साल पुरानी सभ्यता के साक्ष्य कथित वामपंथी प्रगतिशील तत्वों के लिए एक सबक भी है। उन्हें सच स्वीकार करना चाहिए। पश्चाताप भी करना चाहिए। सुमेरी, मिनौवन, मितन्नी और हित्ती सभ्यताएं ऋग्वेद के रचना काल के बाद की हैं। यह मूर्ति और इसके पहले उत्खनन से प्राप्त रथ, तलवार और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुएं वैदिक सभ्यता का दीर्घकाल बता रही हैं। यदि ऐसी ही प्राचीन पुरातात्विक सामग्री किसी यूरोपीय देश में मिलती तो पूरी दुनिया में उसे बड़ी उपलब्धि माना जाता, मगर भारत में राष्ट्रीय गौरव बोध की ऐसी सामग्री पर कोई हलचल नहीं हुई, क्योंकि हम उसके प्रति सजग नहीं हैं, जबकि यह राष्ट्रीय गौरव बोध के स्मारक जैसी हैं।

भारत में विश्व धरोहरों की सूची में केवल 35 स्थल हैं, जो कई देशों से अधिक हैं

भारत में विश्व धरोहरों की सूची में केवल 35 स्थल हैं, जो कई देशों से अधिक हैं। मध्यकाल में विदेशी हमलावरों ने यहां लाखों मंदिर ध्वस्त किए थे। वे राष्ट्र जीवन के उल्लास का आकर्षण थे। उत्खनन से प्राप्त सामग्री का अध्ययन ऋग्वेद के तथ्यों के आधार पर भी किए जाने की आवश्यकता है।

उत्खनन से प्राप्त ताजा सामग्री ने भारतीय धर्म संस्कृति परंपरा के प्रति गौरव बोध बढ़ाया

सिंधु सभ्यता की अध्ययन समिति ने 2018 में हरियाणा के भिराना व राखीगढ़ी की खोदाई के अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया था। तब इस क्षेत्र में कार्बन डेटिंग के अनुसार ईसापूर्व 7000-6000 वर्ष की सभ्यता का आकलन किया गया था। समिति ने 8000-9000 साल पीछे की अवधि को वैदिक सभ्यता से जोड़कर जांचने पर बल दिया था। उसने अध्ययन के नतीजों को ऋग्वेद, रामायण व महाभारत के समय से जोड़कर विवेचन करने का आग्रह किया था। उत्खनन से प्राप्त ताजा सामग्री ने भारतीय धर्म संस्कृति परंपरा के प्रति गौरव बोध बढ़ाया है।

भारत की संस्कृति व सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है

सिद्ध हो गया है कि ऋग्वेद, उत्तर वैदिक काल, हड़प्पा व राखीगढ़ी सहित वृहत्तर भारत की संस्कृति व सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है। आर्य सभ्यता का विस्तार ही राखीगढ़ी व हड़प्पा सभ्यता है। हम सभी को इस उपलब्धि का अभिनंदन कर उसका प्रचार प्रसार करना चाहिए।

( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं )

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