मोदी सरकार के दो वर्ष का मूल्यांकन करने के कई चश्मे हो सकते हैं। मोदी समर्थकों को सरकार का हर काम अच्छा और विरोधियों को नागवार और हास्यास्पद लगेगा, लेकिन निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए मोदी सरकार को उसके चुनावी वायदों के प्रति ईमानदारी, विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों, पिछली सरकारों और प्रधानमंत्रियों से तुलना, देश-विदेश में छवि एवं राजनीतिक संस्कृति, कार्यशैली और प्रशासन में गुणात्मक परिवर्तनों के आधार पर जांचा-परखा जाना चाहिए। चूंकि मोदी सरकार अपने दो वर्ष की उपलब्धियां खुद ही गिना रही है इसलिए उनका उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं। क्या उसका उद्देश्य लोकप्रियता हासिल करने का है या वास्तव में उसने देश के व्यापक हित में कुछ गंभीर नीतिगत पहल भी की है जिसके परिणाम चाहे देर से ही क्यों न आएं? क्या प्रधानमंत्री मोदी ने पांच-साल के एजेंडे को पूरा करने की कोई रणनीति बनाई थी? इस सवाल के जवाब में कहा जा सकता है कि संभवत: मोदी ने लोक-लुभावन निर्णयों से हटकर देश के दूरगामी हितों को साधने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने का मन बनाया था और अपने निर्णयों की स्वीकार्यता के लिए विभिन्न देशों, संघीय-इकाइयों और जनता से संवाद का रास्ता चुना। मोदी ने अब तक लगभग 40 देशों की यात्रा की है और इन देशों के राष्ट्रपतियों-प्रधानमंत्रियों से मधुर संबंध बनाए, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से संपर्क में रह कर सीएम-पीएम टीम बनाने की कोशिश की और प्रगति कार्यक्रम द्वारा राज्यों के मुख्य-सचिवों से जन-समस्याओं और केंद्र-राज्य सरकारों के कार्यक्रमों की समीक्षा की। इसके अलावा वह हर महीने रेडियो पर मन की बात कार्यक्रम द्वारा जनता से रूबरू होते रहे। यह एक नई रणनीति है।

मोदी सरकार के मूल्यांकन का अर्थ है भारतीय लोक-प्रशासन का मूल्यांकन। अकादमिक दृष्टि से लोक-प्रशासन को दक्षता, प्रभावशीलता, मितव्ययिता, उत्तरदायित्व एवं संवेदनशीलता के मानकों पर जांचा जा सकता है। क्या मोदी सरकार इन पर खरी उतरी है? सरकारी मशीनरी, उसकी कार्य-शैली और राजनीतिक-प्रशासनिक-संस्कृति में गुणात्मक परिवर्तन किए बिना इन्हें हासिल करना संभव नहीं। यूपीए-2 मंत्रिमंडल में 71 मंत्रियों के मुकाबले मोदी मंत्रिमंडल में कम मंत्री हैं जिससे न केवल जनता के पैसे की बचत हो रही है वरन प्रति-मंत्री काम की मात्रा में भी वृद्धि हुई है और वह भी बिना दक्षता एवं गुणवत्ता से समझौता किए। मोदी को राष्ट्रीय प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था और उसके तंत्र से भी वह बहुत वाकिफ नहीं थे, फिर भी वह कुछ हद तक पूरी मशीनरी को अपने ढंग से संचालित करने में सफल रहे हैं। केंद्र सरकार के दफ्तरों की कार्यशैली में सुखद बदलाव आया है। विभिन्न मंत्रालयों में कार्यों को निपटाने की समय सीमा में कमी एवं कार्य उत्पादकता में बढ़ोतरी आदि ऐसे पहलू हैं जो जनता को दिखाई तो नहीं दे रहे, लेकिन धीरे-धीरे जाने जाएंगे। सबसे प्रभावी परिवर्तन सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार से संबंधित है। केंद्रीय कार्यालयों में भ्रष्टाचार काफी घटा है, लेकिन राज्यों के स्तर पर इतना भ्रष्टाचार है कि लगता नहीं कि निकट भविष्य में जनता को उससे कोई निजात मिलेगी। मोदी-सरकार ने संचार और प्रौद्योगिकी के प्रयोग से उपरोक्त सभी मानकों पर गंभीरता दिखाने की कोशिश की है। हालांकि राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण नीतिगत निर्णयों में वांछित गति नहीं मिली है।

मोदी सरकार के प्रतिरक्षा, वित्त, विदेश, ऊर्जा-कोयला, रेलवे, परमाणु-ऊर्जा एवं अंतरिक्ष आदि मंत्रालयों को तो प्रशंसा मिली ही है। इसके साथ ही सड़क और जहाजरानी, दूरसंचार एवं सूचना-प्रौद्योगिक, स्वास्थ्य एवं परिवार-कल्याण, खनन एवं कृषि-मंत्रालय आदि भी अच्छा काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की नजर सभी मंत्रालयों पर रहती है। कुछ मंत्रियों और नौकरशाहों को इससे कष्ट है, लेकिन प्रधानमंत्री स्वयं इतनी मेहनत करते हैं कि किसी को शिकायत करने का अवसर नहीं मिलता। लोक-प्रशासन के विद्वान एफडब्ल्यू रिग्स ने विकासशील देशों की विकास अवस्था का मूल्यांकन करने के लिए एक मॉडल बनाया था। उसमें इस बात का उल्लेख है कि विकसित समाजों में सरकार की संरचनाएं और उनके कार्य न केवल स्पष्ट और स्वायत्त होते हैं, वरन उनमें जबरदस्त तालमेल भी होता है। मोदी सरकार ने देश में व्यापार करने और नागरिकों को सरकार से संपर्क करने और काम करवाने में सुविधा दिलाने के क्षेत्र में जो पहल की है, वह एक तरह से रिग्स-मॉडल को भारत में लागू करने का प्रयास है। मोदी को 68 वर्षों पुराना प्रशासनिक-ढांचा, प्रक्रियाएं और कार्य-संस्कृति विरासत में मिली जिससे रिग्स-मॉडल के आधार पर देश को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने में समय लगेगा, लेकिन अंतरिक्ष, प्रतिरक्षा, ऊर्जा आर्थिक-विकास और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जो काम हुआ है उससे अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की साख एक विकसित देश के रूप में निखरी है।

मोदी ने चुनावों में समावेशी-राजनीति और समग्र-विकास का वायदा किया था जिसे उन्होंने सबका साथ-सबका विकास के नारे से व्यक्त किया था। जाहिर है कि अच्छे-दिन की कोई भी परिकल्पना इसी के तहत हो सकती है। कुछ दल और मोदी-विरोधी प्राय: अच्छे-दिन को लेकर मजाक करते हैं, लेकिन उन्हें दो बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक, क्या वे केवल अपने लिए ही अच्छे दिन चाहते हैं या उन तबकों के लिए भी जो गरीब और हाशिये पर हैं, जिनको एलपीजी गैस नहीं मिल रही थी, जिनके खेतों में पैदावार नहीं हो रही थी, जिन्हें काम नहीं मिल रहा था, किसी प्रकार की स्वास्थ्य-संबंधी सुरक्षा नहीं थी, बैंक के दर्शन दुर्लभ थे, कोई पहचान नहीं थी और जो आधारहीन थे? दूसरा, भारतीय जनता झूठे आरोप पसंद नहीं करती। उनका उल्टा ही असर होता है। इसका प्रमाण हम लोग लोकसभा चुनाव में देख चुके हैं, जिसमें पिछले 12 वर्षों से मोदी के खिलाफ झूठे आरोप लगने के बावजूद जनता ने उन्हें पूर्ण बहुमत दे दिया।

नेहरु, शास्त्री और इंदिरा-तीन प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जो विभिन्न व्यक्तित्वों के प्रतिनिधि रहे। जवाहरलाल दार्शनिक और मिश्रित विचारधारा वाले, शास्त्री जी सरल, कुशल एवं कठोर प्रशासक और इंदिरा गांधी चाणक्यवादी व्यक्तित्व की धनी रहीं। मोदी में संभवत: इन तीनों का समावेश है, लेकिन वे तीनों प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों पर वैसा नियंत्रण नहीं रख पाए जैसा मोदी ने रखा है। उन्होंने शुरू में ही भाई-भतीजावाद के संदर्भ में कठोर फैसले लेकर भ्रष्टाचार की आशंका को जड़ से खत्म कर स्पष्ट संदेश दे दिया। तब से आज तक किसी भी मंत्री या सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार का कोई प्रकरण सुनने में नहीं आया है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह निहायत अप्रत्याशित है और मोदी सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल की यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। भारत में सरकार का इस तरह से पहली बार संचालन हो रहा है और इसे लोकतांत्रिक-शैली के कॉरपोरेटाईजेशन की संज्ञा दी जा सकती है। इसमें पार्टी और सरकार के सामूहिक नेतृत्व का स्थान प्रधानमंत्री एक मुख्य-कार्यकारी के रूप में ले रहा है।

[ लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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