संजय गुप्‍त। आखिरकार दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आंदोलन समाप्त हो गया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसान संगठनों ने अपनी हठधर्मिता में मोदी सरकार को इसके लिए विवश कर दिया कि कृषि और किसानों के लिए व्यापक रूप से लाभकारी उन तीन कानूनों को वापस ले लिया जाए जो सुधार के लिहाज से क्रांतिकारी माने गए थे। यह आंदोलन आवश्यकता से अधिक लंबा खिंचा और इसने संसद, लोकतंत्र और शासन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए।

चंद समूहों की ओर से इस आंदोलन का इस्तेमाल मोदी सरकार की किरकिरी कराने के अस्त्र के रूप में किया गया। यह किसान संगठनों की जिद ही थी कि उन्होंने तब भी अपना आंदोलन जारी रखा जब केंद्र सरकार ने नए कृषि कानूनों के क्रियान्वयन को डेढ़ वर्ष के लिए स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन पर रोक लगा दी थी। किसान संगठन इन तीनों कानूनों की वापसी पर अड़े रहे। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले महीने कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया और किसान संगठनों से यह अपील की कि वे वापस घर चले जाएं तब भी आंदोलन समाप्त नहीं किया गया।

इसके बजाय किसान संगठनों ने पांच नई मांगें जोड़ दीं, जिनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर समिति का गठन, आंदोलन के दौरान कथित रूप से जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी, बिजली संशोधन बिल पर आगे न बढ़ने और प्रदूषण कानून के तहत पराली जलाने को लेकर किसानों पर कोई सख्त कदम न उठाने की बात शामिल थी। इनमें एमएसपी का संबंध तो रद किए गए कानूनों से है, लेकिन शेष मांगें जोर-जबरदस्ती का ही प्रतीक हैं।

इन संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर जैसा रवैया दिखाया है वह कुल मिलाकर किसानों का अहित करने वाला ही है। एमएसपी पर लगभग हर विशेषज्ञ ने यही कहा है कि अगर इसकी कानूनी गारंटी दी गई तो सरकार पूरे देश में किसानों की फसल खरीदने के लिए बाध्य होगी और इसका अत्यंत विपरीत प्रभाव सरकार के खजाने पर पड़ेगा। इसी तरह बिजली संशोधन बिल को प्रभावहीन कर देने की मांग भी उचित नहीं कही जा सकती, क्योंकि पंजाब और हरियाणा में ट्यूबवेल चलाकर धान की खेती की जा रही है। इसके चलते भूजल स्तर चिंताजनक तरीके से नीचे जा रहा है। इसका सबसे अधिक खामियाजा यह क्षेत्र ही भुगतेगा। मुफ्त बिजली का फायदा उठा रहे किसान यह बड़ी और डराने वाली तस्वीर देखने के लिए तैयार नहीं।

प्रदूषण की रोकथाम वाले कानून में संशोधन की मांग और किसानों को इस चुनौती से पूरी तरह मुक्त कर देने की अपेक्षा का भी कोई औचित्य नहीं। पराली जलाने की समस्या अत्यंत गंभीर है। इसके चलते उत्तर भारत के रूप में एक बड़ा इलाका हर साल सर्दियां आरंभ होते ही खतरनाक प्रदूषण की चपेट में आ जाता है। प्रदूषण के इस बड़े कारण से किसान भलीभांति परिचित हैं और स्वयं भी इससे प्रभावित हैं, लेकिन दुर्भाग्य से वे इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि प्रदूषण की रोकथाम के लिए पराली जलाने पर रोक लगाना जरूरी है।

इसके लिए तो खुद किसानों को आगे आना होगा, लेकिन इसके आसार कम ही हैं, क्योंकि अपनी जिद को सर्वाधिक महत्व दे रहे किसान संगठन खुले मन से न तो समस्या पर विचार के लिए तैयार हैं और न समाधान के लिए तत्पर। अच्छा तो यह होता कि पूरे देश के किसानों के प्रतिनिधित्व का दावा कर रह संगठन इस पर विचार के लिए आगे आते कि वैश्विक पटल पर देश की कृषि को किस तरह स्थापित किया जाए। किसानों का स्वावलंबन, कृषि का आधुनिकीकरण और इसके ढांचे का अंतरराष्ट्रीय मानकों के समीप जाना समय की आवश्यकता है।

किसानों की आत्मनिर्भरता तो तब सुनिश्चित होगी जब वे आढ़तियों के चंगुल से मुक्त होंगे। जो कृषि कानून रद करने पड़े वे इसकी राह बनाने वाले थे। यह संभव है कि समय के साथ वास्तविक किसानों को यह अनुभूति हो कि उनके हाथ से बड़ा अवसर चला गया है। आखिर यह एक तथ्य है कि पंजाब और हरियाणा के ही किसान आढ़तियों से मुक्ति के लिए कानूनी प्रविधानों की वकालत करते रहे हैं।

अब जब कृषि कानूनों की वापसी के साथ किसानों का आंदोलन समाप्त हो गया है तब मोदी सरकार के लिए भी यह सीख है कि अनुचित धरना-प्रदर्शन संसदीय परंपरा के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं और इनका सामना करने के लिए नया दृष्टिकोण आवश्यक है। देश ने अच्छी तरह देखा कि भीड़तंत्र के सहारे लोकतंत्र की राह कठिन कर दी गई। ऐसे में यह आवश्यक है कि बड़े सुधार कार्यक्रम सुविचारित राजनीतिक विमर्श और सहमति से ही आगे बढ़ाए जाएं। तीनों कृषि कानूनों के संदर्भ में विपक्ष ने यह प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि इन पर संसद में पर्याप्त बहस नहीं हुई। किसान संगठनों के मोदी विरोधी रुख का सियासी फायदा उठाकर विपक्षी दलों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। सुधार के कार्यक्रमों पर नकारात्मक राजनीति देश के लिए ठीक नहीं।

लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार के कदमों पर सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन यदि सुधार भी संकीर्ण राजनीति और मुट्ठी भर संगठनों की जिद के आगे रुकेंगे तो इससे राष्ट्र का ही नुकसान होगा। बेहतर हो कि केंद्र सरकार विपक्ष को इसके लिए नए सिरे से भरोसे में लेने की पहल करे कि तमाम कानूनों में सुधार आवश्यक है और यह यथास्थिति में बदलाव के बिना संभव नहीं। कांग्रेस को यह नहीं विस्मृत करना चाहिए कि कृषि में जिन सुधारों की पहल मोदी सरकार ने की थी वैसा ही वादा कभी उसने भी किया था।

देश में आर्थिक और व्यवस्थागत सुधारों का सिलसिला पिछले तीन दशकों से चल रहा है। सुधारवादी कदमों का राजनीतिक कारणों से विरोध भी स्वाभाविक है, लेकिन एक दृढ़ निश्चयी सरकार देर-सबेर ऐसे विरोध से उबरकर साहसिक फैसले लेती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली पिछली और मौजूदा सरकार ने तमाम चुनौतियों के बावजूद दूरगामी महत्व वाले कई सुधारों का सूत्रपात किया है।

राजनीतिक कारणों से भले ही कृषि कानूनों की वापसी हो गई हो, लेकिन यह सरकार अपनी इच्छाशक्ति के सहारे मौजूदा ढांचे में ही कृषि और किसानों की दशा में सुधार करने में सक्षम है। उसके पास समय भी है और बदलाव का संकल्प भी। विकास और सुविधाओं में उत्थान के उद्देश्य से किए जाने वाले नीतिगत बदलाव व सुधार अकेले केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं। यह राज्यों का भी दायित्व है कि वे सियासी संकीर्णता को परे रखकर हर तरह के सुधारों के सिलसिले को आगे बढ़ाएं और केंद्र का सहयोग करें।

(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं) 

Edited By: Kamal Verma