[रविशंकर प्रसाद]। सर्वोच्च न्यायालय ने 24 जून, 2022 को अपने एक निर्णय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दो दशक पहले हुए गुजरात दंगों के व्यापक षड्यंत्रकर्ता के रूप में दोषी ठहराने से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पिछले कई वर्षों से जारी मामले का उद्देश्य गैरकानूनी और राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने में शामिल लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि गुजरात के दंगे दुर्भाग्यपूर्ण थे। दंगे कहीं भी हो, उनके खिलाफ पुलिस और न्यायिक स्तर पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन गुजरात दंगों की जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करने वाले बड़े एनजीओ और कथित मानवाधिकार संगठनों और मोदी विरोधी मीडिया का मुख्य उद्देश्य यही था कि किसी न किसी तरीके से मोदी को दोषी सिद्ध किया जाए। इन तमाम संगठनों ने पिछले 20 वर्षों के दौरान मीडिया से लेकर, अंतरराष्ट्रीय मंचों और अदालतों में एक अभियान चला रखा था कि किसी तरह यह प्रचारित करने का मौका मिल जाए कि दंगा सरकार प्रायोजित था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पूर्वाग्र्रह से ग्र्रसित यह अभियान पहले मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए और बाद में प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी चलता रहा।

यह कोई दबा-छिपा तथ्य नहीं कि गुजरात में भड़के दंगे साबरमती एक्सप्रेस में अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों पर गोधरा में हुए हमले की प्रतिक्रिया का परिणाम थे। इसमें जिंदा जला दिए गए 59 लोगों की हत्या से देश भर में आक्रोश व्याप्त था। यह घटना 27 फरवरी, 2002 की है। अगले दिन दंगे की आशंका के चलते मोदी ने सेना बुलाने का आदेश दिया। यह भी एक तथ्य है कि गोधरा के कारसेवकों पर हमले और बाद के दंगों में आरोपित लोगों के खिलाफ कानूनी ट्रायल में सैकड़ों लोग दोषी करार दिए गए, जो न्याय की प्रक्रिया के अनुसार होना भी चाहिए।

वहीं करीब 60 एनजीओ, अन्य संगठनों और मीडिया ट्रायल द्वारा विभिन्न स्तरों पर मोदी को इन दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा। इनमें स्वयंभू समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ ने मोदी को येन-केन-प्रकारेण फंसाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। इसमें कई बार झूठ का सहारा भी लिया और फर्जी दस्तावेज तक बनाए गए। उनके तमाम सहयोगी भी अब स्वीकार कर रहे है कि दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर तीस्ता दुनिया भर से मिले आर्थिक सहयोग के साथ ही मोदी को बदनाम करने का षड्यंत्र करती रहीं। उनके सहयोगी ने ही बताया है कि शपथ पत्र जानबूझकर अंग्रेजी में बनाया जाता था और बिना तथ्य बताए पीड़ितों के अंगूठे का निशान लिया जाता था। पूर्वाग्रह से ग्रसित कई अधिकारियों ने भी झूठे दस्तावेज और गवाही दिलाने में मदद की।

यह ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से ही गुजरात दंगों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल यानी एसआइटी का गठन किया गया था। सीबीआइ के पूर्व निदेशक आरके राघवन को उसकी कमान सौंपी गई, जिसकी निगरानी स्वयं शीर्ष न्यायालय कर रहा था। इसी एसआइटी ने जाकिया जाफरी की शिकायत वाले मामले की भी गहन जांच की थी। एसआइटी ने एक बार नरेन्द्र मोदी से नौ घंटे तक लगातार पूछताछ की। उन्होंने धैर्यपूर्वक सवालों का जवाब दिया। भाजपा ने इसे लेकर कोई हंगामा नहीं किया। इसके विपरीत बीते दिनों नेशनल हेराल्ड मामले में राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ को लेकर कांग्र्रेस ने आक्रामक विरोध-प्रदर्शन किया।

गहन जांच के बाद एसआइटी ने पाया कि मोदी के विरुद्ध सभी आरोप बेबुनियाद हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने एसआइटी की रिपोर्ट पर मुहर लगाई, लेकिन तीस्ता के वकीलों के बार-बार आग्रह करने पर उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने प्रोटेस्ट पिटिशन देने का अधिकार दिया। जब यह रिपोर्ट गुजरात के मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत की गई तो उन्होंने भी गवाहों को अविश्वसनीय और एसआइटी की रिपोर्ट को सही माना। तीस्ता फिर भी संतुष्ट नहीं हुईं और उन्होंने पुन: मामले को सुप्रीम कोर्ट में दायर किया, जिसका निर्णय गत 24 जून को हुआ।

यह उल्लेखनीय है कि एसआइटी का गठन और रिपोर्ट संप्रग सरकार के दौरान ही आई थी। इसी तरह इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संप्रग सरकार अपने स्तर पर मोदी को फंसाने के तमाम प्रयास कर रही थी। इसी कड़ी में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद के दबाव में जस्टिस यूसी बनर्जी आयोग ने एक बहुत शर्मनाक रिपोर्ट दी थी कि गोधरा में कोई हमला नहीं हुआ, बल्कि ट्रेन में कारसेवकों की लापरवाही से ही आग लगी थी। बाद में कोर्ट ने इस रिपोर्ट को रद कर दिया। कांग्र्रेस ने तीस्ता सहित कई अन्य संगठनों, वामपंथी तत्वों और प्रायोजित पत्रकारों के एक विशेष समूह का ढांचा खड़ा किया था। सोनिया गांधी ने 'मौत का सौदागर' जैसी बात कही थी। संप्रग सरकार में ही सोहराबुद्दीन प्रकरण में भी मोदी के खिलाफ कार्रवाई का दवाब बनाया गया।

वास्तव में 20 वर्षों से नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विरोध की जो दुकान चल रही थी, उसका एकमात्र उद्देश्य यही था कि उन्हें फंसाओ और उनकी लोकप्रियता घटाओ। इस पूरी मुहिम को कांग्र्रेस का समर्थन हासिल था। संप्रग सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ को उपकृत करने में कोई कोर-कसर भी नहीं छोड़ी। इस मामले में सर्वोच्च न्यायलय का यह निष्कर्ष बहुत ही प्रासंगिक है कि अगर किसी बड़े तनाव के कारण सांप्रदायिक उन्माद में दंगे होते हैं और कुछ समय के लिए उचित कार्रवाई का अभाव दिखता है तो उसका यह अर्थ न निकाला जाए कि उच्च स्तर पर षड्यंत्र रचा गया और दंगे सरकार प्रायोजित हैं।

कोरोना की दूसरे लहर की त्रासदी का उदाहरण देते हुए न्यायालय ने कहा कि उससे उपजी स्थिति को कई विकसित देश भी नहीं संभाल पाए और लाखों लोगों की मौत हो गई। इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाए कि उन देशों की सरकारों ने उच्च स्तर पर षड्यंत्र किया था, जिससे लोग कोरोना से मर जाएं। ऐसे में कांग्रेस द्वारा न्यायालय के निर्णय पर अशोभनीय टिप्पणी कर नैतिकता की बात करना हास्यास्पद है। एक लोकप्रिय नेता के रूप में मोदी निरंतर चुनाव जीत रहे हैं। इस यात्रा में उन्हें 20 वर्षों से अधिक समय से एक प्रायोजित कुत्सित अभियान की अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा, लेकिन वह तपकर और निखर कर निकले। अंतत: सत्य की ही जीत होती है। सत्यमेव जयते।

(लेखक भाजपा के लोकसभा सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री है)

Edited By: Arun Kumar Singh