[ राजीव कुमार ]: एक वायरस के कारण ठहराव की शिकार हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सभी देश प्रयास में लगे हैं। इस सिलसिले में आर्थिक गतिविधियों को तेजी देने के लिए सरकारें प्रोत्साहन पैकेज दे रही हैं। हर देश अपने संसाधनों और सीमा देखकर यह काम कर रहा है। यही सही भी है, क्योंकि पैर उतने ही पसारने चाहिए जितनी चादर हो। इसमें भारत ने बिल्कुल सही रणनीति अपनाई है। हमारे पास अमेरिका जितने संसाधन नहीं और न ही डॉलर जैसी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कि हम अपने बुनियादी हालात की परवाह किए बिना कितना ही ऋण जारी कर सकें।

कई मोर्चों पर बंधे हाथों के बावजूद मोदी सरकार ने दिया प्रोत्साहन पैकेज

ऐसे ही कई मोर्चों पर बंधे हाथों के बावजूद मोदी सरकार ने अपनी सीमाओं के दायरे में प्रोत्साहन पैकेज दिया है। इसमें पहली प्राथमिकता तो यही सुनिश्चित करने में रही कि इस आपदा की न्यूनतम मानवीय कीमत चुकानी पड़े। खासतौर से उनका ख्याल रखने की कोशिश हुई है जो समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं। इसका दूसरा पहलू इस संकट को अवसर में बदलने से जुड़ा है। इसके लिए उन क्रांतिकारी सुधारों का एलान किया गया जो लंबे अर्से से लंबित थे। इन दो प्राथमिकताओं से प्रेरित पैकेज को बहुत करीने से तैयार किया गया है। यह संतुलित पहल यकीनन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगी।

मौजूदा संकट ने अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया

मौजूदा संकट ने अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में यह प्रोत्साहन पैकेज इन दोनों पहलुओं को साधेगा। इसमें शामिल तमार्म ंबदु मांग को बढ़ावा देने में मददगार होंगे। यहां यह बताना जरूरी होगा कि कुल प्रभावी मांग उपभोग, निवेश और मध्यवर्ती वस्तुओं की कुल मांग के योग से मिलकर बनती है। वे लोग अवश्य इस पहलू पर गौर करें जो यह समझते हैं कि केवल लोगों के हाथ में नकदी पकड़ाकर ही अर्थव्यवस्था में गिरती मांग की कायापलट हो सकती है। इस दिशा में एमएसएमई, रेहड़ी-पटरी वालों और किसानों के लिए अतिरिक्त ऋण उपलब्ध कराने से मांग में व्यापक रूप से इजाफा होगा।

लोगों के हाथ में सीधे नकदी पहुंचाने के लिए भी कदम उठाए गए

वैसे ऐसा भी नहीं है कि लोगों के हाथ में सीधे नकदी पहुंचाने के लिए कदम नहीं उठाए गए। जरा 1.73 लाख करोड़ रुपये के शुरुआती राहत पैकेज पर गौर कीजिए जो देश के सबसे वंचित वर्ग को ध्यान में रखकर दिया गया। उसमें प्रावधान किया गया कि 20 करोड़ महिला जन-धन खाताधारकों को हर महीने उनके बैंक खाते में रकम भेजी जाएगी। टीडीएस और टीसीएस में 25 प्रतिशत की कटौती से वेतनभोगियों के हाथ में 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि मुहैया कराई गई। मनरेगा के लिए अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये के आवंटन से गांवों में उन लोगों के लिए रोजी-रोजगार की व्यवस्था करने में मदद मिलेगी जो इस संकट के दौरान शहरों से पलायन कर अपने गांव पहुंचे हुए हैं।

कंस्ट्रक्शन क्षेत्र के कामगारों के लिए 30,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था

कंस्ट्रक्शन क्षेत्र के कामगारों के लिए भी 30,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। इसी तरह 12 करोड़ किसानों के खातों में 17,800 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए गए हैं। विस्थापित कामगारों के लिए क्वारंटाइन सेवाओं के संचालन के लिए राज्यों को 13,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं। इन कदमों से मांग को बल मिलेगा जो आर्थिक गतिविधियों को तेजी देने के लिए आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त है।

सरकार ने अपनाई चतुष्कोणीय रणनीति

जहां तक आपूर्ति के मोर्चे की बात है तो सरकार ने चतुष्कोणीय रणनीति अपनाई है। पहले तो यह सुनिश्चित करना है कि खाद्य सुरक्षा के साथ किसानों की आमदनी इससे प्रभावित न हो। यही वजह रही कि देश में लॉकडाउन के दौरान कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों को आवश्यक सेवाओं की सूची में रखा गया। इससे रबी की महत्वपूर्ण फसल की कटाई और उसकी पर्याप्त खरीद संभव हो सकी। खरीद प्रक्रिया ने किसानों के हाथ में 78,000 करोड़ रुपये पहुंचाए।

एमएसएमई को तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज मिलेगा 

दूसरी रणनीति नकदी तरलता के कारण उपजने वाले संकट को रोकने से जुड़ी थी। ऐसे संकट से दिवालियेपन-इनसॉल्वेंसी के मामलों की आशंका बढ़ जाती। इसके लिए बैंक ऋण किस्तों की अदायगी में मोहलत दी गई जिसका दायरा और बढ़ा दिया गया है। एमएसएमई को भी तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज मिलेगा जिसके लिए उन्हें कोई नई जमानत नहीं देनी होगी। इससे पूंजी तक उनकी पहुंच सुगम बनेगी। एमएसएमई 50,000 करोड़ रुपये के नए कोष से भी मदद ले सकते हैं। इन कदमों से आतिथ्य सेवा, मनोरंजन और खुदरा जैसे उन क्षेत्रों को खासी मदद मिलेगी जिन्हें लॉकडाउन का सबसे अधिक दंश झेलना पड़ा। राज्यों के बिजली बोर्डों को भी 90,000 करोड़ रुपये का ऋण पैकेज दिया जा रहा है ताकि वे निजी आपूर्तिकर्ताओं का बकाया चुका सकें।

किसानों को अपनी पसंद के ग्राहक चुनने की  मिली आजादी

रणनीति का तीसरा पहलू विनिर्माण और कृषि जैसे क्षेत्र में निजी क्षेत्र और निवेशकों के लिए उचित परिवेश बनाने के लिए की गई घोषणाओं से जुड़ा है। किसानों को अब अपनी पसंद के ग्राहक चुनने की जरूरी आजादी मिल गई है। उन्हें पुराने जमाने के आवश्यक वस्तु अधिनियम के मकड़जाल से मुक्ति मिल गई है। कृषि उत्पादों के व्यापारी एवं निर्यातक भी अपनी निर्यात आवश्यकता के लिहाज से पर्याप्त भंडार रख सकते हैं।

भारत न केवल हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर होगा, बल्कि निर्यातक के रूप में भी उभरेगा

वहीं रक्षा उत्पादन क्षेत्र में और उदारता बढ़ाकर भारत न केवल हथियारों के मामले में अधिक आत्मनिर्भर होगा, बल्कि एक निर्यातक के रूप में भी उभरेगा। निजी क्षेत्र के दिग्गज भी अभी तक सार्वजनिक उपक्रमों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में हाथ आजमा सकते हैं। इस कड़ी में रेहड़ी-पटरी वालों के लिए प्रत्येक को दस हजार रुपये के ऋण की खिड़की अवश्य राहत की हवा देगी। करीब 50 लाख परिवारों को इससे लाभ पहुंचेगा। इस प्रकार यह पैकेज न केवल मौजूदा उत्पादन क्षमताओं को सहारा देता है, बल्कि ऊंची वृद्धि के लिए नए निवेश को आकर्षित करने की आधारशिला रखने वाला भी है।

आर्थिक पैकेज 20.97 लाख करोड़ रुपये का है

वास्तव में यह पैकेज 20.97 लाख करोड़ रुपये का है जो प्रधानमंत्री की 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा से अधिक ही है। हमारी जीडीपी के 10 प्रतिशत से अधिक वाले इस पैकेज की विकसित देशों के पैकेजों से सहज तुलना की जा सकती है। कोरोना संकट के बाद भारत के आर्थिक कायाकल्प को मजबूती देने के लिए किसानों को बेहद आवश्यक आजादी, लचीलापन और वित्तीय शक्ति मिल सकेगी। वहीं इस प्रोत्साहन से तैयार होने वाले परिवेश से देसी कंपनियों को वैश्विक बनने में भी मदद मिलेगी। इससे भारतीय ब्रांडों को विश्व बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिलेगी और वे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में सफलतापूर्वक शिरकत कर सकेंगे।

( लेखक नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं )

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