पंजाब और गोवा में चुनाव प्रचार थम जाने के बाद अब निगाहें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मणिपुर में हो रहे चुनाव प्रचार पर केंद्रित हैं। यह स्वाभाविक है कि सभी की दिलचस्पी उत्तर प्रदेश में अधिक है। बजट के बाद माहौल का आकलन अभी शेष है, लेकिन यह स्पष्ट है कि उसके पहले यानी नवंबर-दिसंबर 2016 में चारों ओर केवल मोदी और उनके साहसिक कदम की ही चर्चा हो रही थी। कोई तारीफ में कसीदे पढ़ता तो कोई मुखर आलोचना करता। शायद उस समय चुनाव हो जाते तो भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपने 2014 के लोकसभा प्रदर्शन को दोहरा सकती थी। अन्य पार्टियों के मुकाबले तब भाजपा का प्रचार जमीन पर भी दिखाई दे रहा था। इसके बाद अचानक सपा मुखिया मुलायम सिंह और उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश में सत्ता-संघर्ष शुरू हो गया। जिस तरह अखिलेश सपा के नए सुप्रीमो के रूप में उभरे उसने पूरी तस्वीर ही बदल दी। चारों ओर केवल अखिलेश, मुलायम और सपा की ही चर्चा होने लगी और चुनावी प्रचार में सपा के मुकाबले भाजपा पिछड़ती दिखाई देनी लगी। चुनाव में दो तरह के मतदाता होते हैं। एक तो वे जो किसी पार्टी को वोट देने का मन बना चुके होते हैं और दूसरे वे जो अनिर्णय की स्थिति में होते हैं और मत देने से कुछ समय पूर्व ही यह तय करते हैं कि किस पार्टी या प्रत्याशी को मत देना है। ऐसे मतदाताओं को ‘फ्लोटिंग वोटर’ कहते हैं और वे कुल मतदाताओं का सात-आठ फीसद होते हैं। ये किसी भी पार्टी की ओर जा सकते हैं और सच कहें तो वे ही विजय-पराजय में निर्णायक मतदाता की भूमिका निभाते हैं। पार्टियों का चुनाव प्रचार ऐसे ही मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए होता है। ये मतदाता तीन बातों से प्रभावित होते हैं। एक, किस पार्टी का प्रचार जोरों पर चल रहा है। दो, किस पार्टी द्वारा सबसे प्रभावी मुद्दे उठाए गए हैं और सबसे आकर्षक वायदे किए गए हैं। तीन, किस पार्टी का नेतृत्व आकर्षक और प्रभावशाली है जो जनता से सीधे संवाद स्थापित कर पा रहा है। इन तीनों के मिले-जुले प्रभाव से ही ‘फ्लोटिंग मतदाता’ अपना मन बनाते हैं। इसीलिए सपा के रणनीतिकार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग और कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ऐसे मतदाताओं को लुभाने के लिए कई चरणों वाली व्यापक चुनाव-प्रचार की रणनीति बनाई है। यह रणनीति मूलत: ऐसी है जिससे मुफ्त प्रचार प्राप्त किया जा सके और जनता के बीच बराबर चर्चा में रहा जाए। इसी रणनीति के तहत प्रथम चरण में सपा में पारिवारिक और पार्टी कलह को मुद्दा बना कर पेश किया गया और दिसंबर 2016 आते-आते सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर अखिलेश-मुलायम-शिवपाल विवाद और चुनाव आयोग द्वारा अखिलेश को ही असली सपा मान कर उनके गुट को साइकिल चुनाव-चिन्ह देने को जैसे एकमात्र राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में पेश किया गया। इससे हवा अखिलेश और सपा के पक्ष में बन गई और विमुद्रीकरण, मोदी और भाजपा हाशिये पर चली गई।
रणनीति के दूसरे चरण में सपा-कांग्रेस गठबंधन को चर्चा का मुद्दा बनाया गया। इससे मीडिया बहसों और खबरों ने अखिलेश की सपा को जनमानस में जीवंत रखा। इसे इतना नाटकीय बनाया गया कि हर आदमी की दिलचस्पी यह जानने में हो गई कि गठबंधन हो रहा है या नहीं, होगा तो कांग्रेस और सपा को कितनी-कितनी सीटें मिलेंगी। इस मोल-तोल में राहुल और अखिलेश के साथ डिंपल यादव और प्रियंका को भी सम्मिलित कर लोगों की उत्सुकता को और बढ़ाया गया और अंत में उसे अंजाम तक पहुंचा कर जनता के दिमाग में अखिलेश और सपा के विचार को और ताजा किया गया।
तीसरे चरण की रणनीति में अखिलेश और राहुल की संयुक्त प्रेस-वार्ता और रोड-शो को मीडिया में मसाले के रूप में परोसा गया और ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ की थीम पेश की गई। जहां राहुल ने इसे गंगा-जमुना का मिलन बताया वहीं अखिलेश ने कहा कि सपा की साइकिल में एक पहिया कांग्रेस का लग गया है जिससे विकास की सरस्वती बहेगी। इसके निहितार्थ तो वे दोनों ही जानें, लेकिन इतना जरूर है कि इस प्रयोग से युवाओं को रिझाने का काम किया गया, क्योंकि युवा नौकरियों में होने वाले भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से वाकई बहुत त्रस्त हैं और उसे प्रदेश में अपने भविष्य की कोई सुरक्षा दिखाई नहीं देती। राहुल और अखिलेश की जोड़ी युवा नेतृत्व का प्रतीक बन सकती है।
इस रणनीति का चौथा चरण संभवत: तब शुरू होगा जिस दिन प्रियंका और डिंपल यादव एक मंच साझा करेंगी। जाहिर है दोनों ही युवा महिलाएं आकर्षण, कौतूहल और महिला सशक्तीकरण का केंद्र बन जाएंगी जिसे मीडिया जोर-शोर से कवर करेगा। इस रणनीति के अंतिम चरण में संभवत: मुलायम स्वयं अखिलेश के प्रचार में कूद पड़ें जो मीडिया में एक ‘बिग-हिट’ के रूप में देखा जाएगा। उनके रणनीतिकारों का ऐसा मानना हो सकता है कि इससे दोनों पार्टियों और गठबंधन के प्रत्याशियों को लाभ पहुंचेगा। यह रणनीति सफल होगी या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा, पर ताज्जुब यह है कि इसकी काट का प्रयास बसपा कर रही है और न ही भाजपा। मायावती की समस्या है कि वे पार्टी की एकमात्र प्रचारक हैं और उनको अन्य राज्यों में भी प्रचार करने जाना है, पर भाजपा के पास तो ऐसी कोई समस्या नहीं। लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित सफलता के बाद भाजपा ने प्रधानमंत्री का राज्य के विधानसभा चुनावों में आवश्यकता से अधिक प्रयोग किया है। भाजपा को लगने लगा है कि मोदी आएंगे और उनके लिए प्रचार करेंगे। राष्ट्रीय नेताओं का न तो प्रचार में उपयोग हो रहा है, न ही वे प्रभावी हैं। यह स्थिति भाजपा के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। आश्चर्य की बात है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पार्टी का न तो सर्वमान्य नेता है, न ही कोई स्थापित चेहरा। इसके अलावा भाजपा ने देर से प्रचार शुरू किया है। पार्टी अपनी सोशल इंजीनियरिंग में इतनी डूबी रही कि उसे प्रचार की सुध ही नहीं रही। उसके पास जार्डिग और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार भी नहीं। फिलहाल ऐसा लगता है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के विरुद्ध शिवपाल ने जैसा रुख दिखाया है उससे ही भाजपा को कुछ राहत मिल सकती है। शिवपाल के गुट के लोग गठबंधन को हराने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन इन नकारात्मक कारकों के बलबूते चुनाव नहीं जीते जा सकते। यदि अखिलेश-राहुल और प्रियंका-डिंपल ने मिलकर चुनाव प्रचार की चमक चुरा ली और युवा-महिलाएं उनके साथ हो चले तो भाजपा-बसपा को चुनाव प्रचार में पिछड़ना भारी पड़ सकता है।
[ लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के डायरेक्टर हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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